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बजट 2026-27: राजकोषीय मजबूती के आंकड़ों के पीछे की कहानी और बाकी बड़े सवाल

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बजट ने बड़े पैमाने पर राजनीतिक लोकलुभावनवाद से परहेज किया है, जबकि आने वाले महीनों में कई राज्यों में विधान सभा चुनाव होने वाले हैं। विस्तार से बता रहे हैं एके भट्टाचार्य

Last Updated- February 02, 2026 | 10:26 PM IST
Budget 2026

वर्ष 2026 के बजट के राजकोषीय आंकड़े उम्मीदों के साथ-साथ कई सवाल भी पैदा करते हैं। जैसा कि चालू वित्त वर्ष के संशोधित अनुमान में दर्शाया गया है, सकल राजकोषीय घाटे का आंकड़ा सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का 4.4 फीसदी है और इसी में आशाएं निहित हैं। सराहनीय बात यह है कि यह लक्ष्य उस वर्ष की उथलपुथल के बावजूद हासिल किया गया है, जब सकल कर संग्रह बजट अनुमान से 4.5 फीसदी कम रहा। परंतु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह उपलब्धि व्यय में तीव्र कटौती के माध्यम से हासिल की गई है (राजस्व व्यय बजट अनुमान की तुलना में 1.9 फीसदी घटा और पूंजीगत व्यय 2.2 फीसदी कम हुआ) तथा गैर-कर राजस्व में 14.6 फीसदी की अच्छी वृद्धि हुई, जिसका मुख्य कारण भारतीय रिजर्व बैंक और सरकारी बैंकों से प्राप्त अधिक लाभांश है।

ऐसे में सवाल तब पैदा होंगे जब आप2025-26 में सरकारी की प्राप्तियों और व्यय के घटकों पर करीबी नजर डालेंगे। रक्षा, रेल और सड़क जैसे कुछ क्षेत्रों को छोड़ दिया जाए तो सरकार चालू वर्ष के दौरान बजट आवंटन का बड़ा हिस्सा खर्च करने में विफल रही है। 100 फीसदी से लेकर 25 फीसदी तक की कमी चिंताजनक है, विशेष रूप से तब जब प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य अवसंरचना, शहरी और ग्रामीण आवास, सिंचाई, नदियों का परस्पर जोड़, पेयजल मिशन, ग्रामीण सड़कें, ग्रामीण आजीविका योजनाएं, परमाणु ऊर्जा परियोजनाएं, दूरसंचार अवसंरचना, आर्टिफिशल इंटेलिजेंस मिशन, सेमीकंडक्टर विकास परियोजना, उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन योजनाएं, निवेश और अवसंरचना कोष, अनुसंधान, विकास और नवाचार योजना, तथा सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के लिए आपातकालीन ऋण सुविधाएं शामिल हैं।

राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को हासिल करना हमेशा वांछित रहता है। परंतु इस वर्ष कई अहम योजनाओं और क्षेत्रों के व्यय में कटौती की गई है जिससे यह सवाल उठता है कि क्या योजनाएं सही ढंग से डिजाइन की गई थीं? अगर हां तो सरकार देश के आर्थिक विकास के लिए अहम मानी जाने वाली परियोजनाओं के लिए आवंटित धन को खर्च करने में क्यों विफल रही? दिसंबर 2025 के अंत तक, राज्यों के पास 53 योजनाओं के करीब 69,000 करोड़ रुपये बिना इस्तेमाल किए पड़े थे।

इनका कुल आवंटन करीब 5 लाख करोड़ रुपये था। इन योजनाओं के लिए 2025-26 के संशोधित अनुमान में आवंटन को 25 फीसदी से अधिक घटाकर 3.76 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया है। ऐसी योजनाओं के अंतर्गत राज्यों द्वारा धन का उपयोग न किया जाना, उनमें खर्च की कमी का एक कारण हो सकता है। लेकिन निश्चित रूप से एक अधिक विस्तृत मूल्यांकन आवश्यक है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि योजनाएं केवल कागज पर अच्छी दिखने के लिए घोषित न की जाएं और बजट में वित्तीय आवंटन पर ही जोर न हो बल्कि वास्तव में जमीनी स्तर पर फर्क पैदा करें।

गैर-कर राजस्व में वृद्धि के स्रोतों की गहन जांच आवश्यक है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ऐसी बढ़ोतरी टिकाऊ बने। सरकार के कुल गैर-कर राजस्व का लगभग 45 फीसदी केवल एक मद से आता है जो है रिजर्व बैंक और सरकारी बैंकों से प्राप्त लाभांश। सरकार की सकल प्राप्तियों को मजबूत करने के लिए गैर-कर राजस्व पर बढ़ती निर्भरता एक स्वस्थ प्रवृत्ति है, लेकिन यह वृद्धि केवल एक क्षेत्र, रिजर्व बैंक या कुछ सरकारी बैंकों पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। गैर-कर राजस्व में वृद्धि विभिन्न सरकारी सेवाओं से प्राप्त शुल्क और आय तथा गैर-वित्तीय क्षेत्र की सार्वजनिक उपक्रमों से भी होनी चाहिए।

2026-27 के लिए राजकोषीय आंकड़े कैसे दिखते हैं? आने वाले वर्ष के सकल कर राजस्व के आंकड़े सतर्क प्रतीत होते हैं, यदि सरकार के अर्थव्यवस्था की नॉमिनल वृद्धि के 10 फीसदी अनुमान को ध्यान में रखा जाए। वर्ष 2025-26 में 8 फीसदी नॉमिनल वृद्धि के साथ, सरकार का सकल कर संग्रह 7.46 फीसदी बढ़ने या जीडीपी के 11.4 फीसदी पर रहने का अनुमान है। 2026-27 के लिए 10 फीसदी नॉमिनल वृद्धि के अनुमान के साथ, सरकार सकल कर संग्रह में 8 फीसदी से कम वृद्धि हासिल करने की उम्मीद करती है, जो जीडीपी का 11.2 फीसदी होगा। राजस्व संबंधी अनुमान यथार्थवादी प्रतीत होते हैं। या फिर क्या उनमें उन संभावित व्यवधानों या वृद्धि में मंदी को ध्यान में रखा गया है जो आने वाले वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती हैं?

स्वाभाविक रूप से, सरकार को उम्मीद है कि 2026-27 में उत्पाद शुल्क लगभग 16 फीसदी बढ़ेगा, संभवतः 1 फरवरी से लागू सिगरेट करों में भारी वृद्धि और पेट्रोलियम उत्पादों पर करों में संभावित बढ़ोतरी के आधार पर यह उम्मीद जताई गई है। सीमा शुल्क राजस्व में करीब 5 फीसदी वृद्धि अनुमानित है, जो 2025-26 में देखी गई वृद्धि के करीब आधी है। यह कई वस्तुओं पर सीमा शुल्क दरों को युक्तिसंगत बनाए जाने को दर्शाता है। यद्यपि जिन वस्तुओं पर आयात शुल्क घटाया गया है उनकी संख्या पिछले बजट में घोषित वस्तुओं से कम है।

आगामी वर्ष के राजस्व अनुमानों में चिंताजनक प्रवृत्ति वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह में है, जो बजट के अनुसार 2025-26 में दर्ज 1.32 फीसदी की गिरावट के बाद और 2.58 फीसदी का संकुचन दिखाएगा। सितंबर 2025 में जीएसटी को युक्तिसंगत बनाए जाने से अपेक्षित उत्साह अभी तक नजर नहीं आया है। इसके विपरीत, व्यक्तिगत आयकर संग्रह, जो 2025-26 में 10.9 फीसदी बढ़ा था, उसमें 2026-27 में लगभग 11.74 फीसदी इजाफे का अनुमान है।

गैर-कर राजस्व के मोर्चे पर, सरकार अब अपनी प्राप्तियों को बढ़ाने के लिए रिजर्व बैंक या सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से मिलने वाले लाभांश पर कम निर्भर दिखाई देती है। वास्तव में, 2026-27 में सरकार के गैर-कर राजस्व लगभग अपरिवर्तित रहेंगे, यद्यपि रिजर्व बैंक लाभांश में मामूली वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। लेकिन 2026-27 में लगभग 80,000 करोड़ रुपये का विनिवेश या परिसंपत्ति मुद्रीकरण में बड़ी वृद्धि हासिल करना इस पर निर्भर करेगा कि सरकार अपनी परिसंपत्ति बिक्री रणनीति कितनी अच्छी तरह तैयार करती है और संख्याएं जितनी आक्रामक रणनीति का संकेत देती हैं, उसके खिलाफ राजनीतिक प्रतिरोध को कैसे संभालती है।

वर्ष 2026-27 के लिए पूंजीगत व्यय का अनुमान भी यथार्थवादी बना हुआ है। कोविड के बाद 2025-26 में 4.2 फीसदी की न्यूनतम वृद्धि देखने के बाद, इसमें 2026-27 में 11.5 फीसदी की वृद्धि के साथ उछाल की उम्मीद है, लेकिन यह वृद्धि राज्यों को दिए जाने वाले ऋणों के बढ़ते हिस्से (लगभग 15 फीसदी अनुमानित) की वजह से होगी।

क्या वित्त मंत्री 2026-27 के लिए और कम राजकोषीय घाटे या ऋण स्तर का अनुमान पेश कर सकती थीं? राजकोषीय घाटा 2025-26 में जीडीपी के 4.4 फीसदी से घटकर 2026-27 में 4.3 फीसदी होने का अनुमान है, जो कोविड के बाद से सबसे धीमी राजकोषीय मजबूती की दर होगी। इसी तरह, जीडीपी के 55.6 फीसदी पर ऋण का लक्ष्य केवल एक वर्ष में 0.5 फीसदी अंक घट रहा है, जबकि चार वर्षों बाद का लक्ष्य 49 से 51 फीसदी है। राजकोषीय मजबूती के लक्ष्य को पीछे धकेलने का विचार संभवतः सरकार की इस इच्छा से प्रेरित है कि आने वाले वर्ष में किसी भी प्रतिकूल परिस्थिति के लिए तैयार रहा जाए। लेकिन इसके परिणामस्वरूप अगले चार वर्षों में राजकोषीय एकीकरण का कार्य कुछ अधिक कठिन हो जाएगा।

राजकोषीय आंकड़े से परे देखें तो, बजट 2026 ने बड़े पैमाने पर राजनीतिक लोकलुभावनवाद से परहेज किया है, जबकि आने वाले महीनों में कई राज्यों में विधान सभा चुनाव होने वाले हैं। इसमें भारत के महत्त्वाकांक्षी मध्यम वर्ग की चिंताओं को दूर करने के लिए कर अनुपालन से जुड़ी छूट योजना और विदेशों में रहने वाले गैर-भारतीय मूल के व्यक्तियों को भारतीय कंपनियों में इक्विटी निवेश तक अधिक पहुंच देने जैसे उपाय शामिल हैं। लेकिन 29 जनवरी को प्रस्तुत आर्थिक समीक्षा की भावना इस बजट में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। चाहे वह सेवा क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करना हो, विनिर्माण क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मकता हो, या विधायी बदलाव के माध्यम से विनिवेश को बड़ा प्रोत्साहन देना हो। बजट में विनिवेश के आंकड़े तो हैं, कानूनी बदलाव बाद में आ सकते हैं!

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First Published - February 2, 2026 | 10:20 PM IST

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