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बदलता चुनावी मिजाज: क्या भारतीय राजनीति में अब मुस्लिम वोट अपनी अहमियत खो रहा है?

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हालिया चुनावों ने भाजपा और धर्मनिरपेक्ष दलों के अंतर को हिंदू-मुसलमान का अंतर बना दिया है। भाजपा के प्रतिद्वंद्वी मुसलमानों की पार्टी लग रहे हैं, भले ही उनके नेता हिंदू हों

Last Updated- May 10, 2026 | 9:53 PM IST
Muslim women voter
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

करीब सात वर्ष पहले मैंने आलेख लिखा था जिसका शीर्षक था: ‘क्या भारतीय मुस्लिम अहमियत रखते हैं?’ उस सवाल को दोबारा उठाने का यह सही समय है।

हालिया विधान सभा चुनावों के नतीजे, खासकर पश्चिम बंगाल और असम के जहां मुस्लिम मतदाताओं की आबादी 30 फीसदी से ज्यादा है, दिखाते हैं कि यह मुद्दा अब भी मौजूद है बल्कि शायद और बड़ा हो गया है। जवाब कहीं ज्यादा उलझे हुए हैं। राजनीतिक नजरिये से निष्कर्ष यह होगा कि मोदी-शाह और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए आज मुसलमानों की अहमियत 2019 से भी कम है।

पश्चिम बंगाल और असम में भाजपा ने इस बार एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया मगर दो तिहाई सीटों पर जीत हासिल कर ली। लेकिन असम में विपक्ष को देखें तो जीतने वाले 24 उम्मीदवारों में से 22 मुसलमान हैं। इसमें 18 कांग्रेस के हैं, जिसने कुल 19 मुसलमान उम्मीदवार खड़े किए थे।

पश्चिम बंगाल में 293 नवनिर्वाचित विधायकों में से 40 मुसलमान हैं। इनमें से 34 तृणमूल कांग्रेस से हैं और पार्टी द्वारा जीती कुल 80 सीटों में 45 प्रतिशत हिस्सेदारी रखते हैं। इस तरह मुसलनाम उन दो राज्यों में (जम्मू-कश्मीर राज्य नहीं है) सत्ता व्यवस्था से बाहर हैं, जहां उनकी सबसे बड़ी आबादी है। वे पूरी तरह हाशिये पर धकेल दिए गए हैं और भाजपा के इकलौते विपक्ष बनकर रह गए हैं। विडंबना या विरोधाभास यह है कि उनके नेता अब भी हिंदू हैं और भाजपा के खिलाफ लड़ाई में वे सभी हार गए हैं।

इन चुनावों ने भाजपा और धर्मनिरपेक्ष दलों के अंतर को पूरी तरह हिंदू और मुसलमान का अंतर बना दिया है। उदाहरण के लिए केरल में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के 102 नवनिर्वाचित विधायकों में से 30 मुसलमान और 29 ईसाई हैं। धर्मनिरपेक्ष दलों को इस बात से राहत है कि कम से कम केरल में मुसलमानों को जगह मिली हुई है। लेकिन यह समझना भी जरूरी है कि भाजपा अब इसे अल्पसंख्यक शासन का प्रमाण बताकर हिंदू वोट एकजुट करेगी और केरल के ईसाइयों को विभाजित करने की कोशिश करेगी।

राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो 18वीं लोकसभा में 24 यानी केवल 4.42 प्रतिशत सांसद मुसलमान हैं, जबकि राष्ट्रीय मतदाता सूची में 15 प्रतिशत से ज्यादा मुसलमान शामिल हैं। 16वीं लोकसभा में 22 और 17वीं लोकसभा में 27 मुसलमान सांसद थे। हालांकि यह बात उतनी हैरान करने वाली नहीं है, जितनी पहली नजर में करती है। मुसलमानों ने 1980 में 49 यानी 9 प्रतिशत और 1984 में 45 यानी 8.3 प्रतिशत सीट जीती थीं। इन दो मौकों को छोड़ दें तो लोकसभा में मुसलमान सांसद 5 प्रतिशत के आसपास ही रहे हैं। लेकिन केंद्रीय मंत्रिमंडल में उन्हें हमेशा अच्छा प्रतिनिधित्व मिलता रहा है। यहां तक कि वाजपेयी के मंत्रिमंडल में भी सिकंदर बख्त थे।

मुसलमान राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लोक सभा उपाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पदों पर और कई दफा तो सशस्त्र बलों और खुफिया एजेंसियों के मुखिया जैसे पदों पर भी रहते थे। आज ऐसा नहीं है। देश में किसी भी राज्य का मुख्यमंत्री मुसलमान नहीं है, जम्मू-कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश है। केवल बिहार में लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन मुस्लिम राज्यपाल हैं। केंद्र सरकार के करीब 100 सचिवों में कामरान रिजवी (भारी उद्योग) इकलौते मुसलमान हैं। न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह सर्वोच्च न्यायालय के 32 न्यायाधीशों में अभी इकलौते मुसलमान न्यायाधीश हैं। देश के मुख्य न्यायाधीश के पद पर रहने वाले अंतिम मुसलमान न्यायमूर्ति एएम अहमदी थे, जो 24 मार्च 1997 को सेवानिवृत्त हुए थे।

इस सूची से भले ही ऐसा लगता हो कि भारत में मुसलमानों को हाशिये पर धकेला जा रहा है लेकिन इस पर पुनर्विचार करना होगा। बहुत बड़ी तादाद में मुसलमान चिकित्सा, विधि, शिक्षा, विज्ञान, सॉफ्टवेयर, बैंकिंग और मनोरंजन या समाचार जगत में प्रवेश कर रहे हैं। सिविल सेवा और सशस्त्र बलों (ऑफिसर्स अकादमी सहित) में मुसलमानों का चयन बढ़ रहा है। इसलिए हकीकत यही है कि प्रतिनिधित्व केवल राजनीति में कम हो रहा है।

2019 में मैंने अपने पहले स्तंभ का शीर्षक भाजपा नेता, बौद्धिक/विचारक प्रवक्ता और पूर्व राज्य सभा सांसद बलबीर पुंज के साथ 1999 में हुई एक बातचीत से लिया था। उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस समूह में कुछ समय तक मेरे साथ काम भी किया था। वह द फाइनैंशियल एक्सप्रेस के लिए लिखा करते थे। पुंज का गत माह निधन हो गया। 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली दूसरी सरकार के एक वोट से गिर जाने पर वह बहुत नाराज थे। इससे पहले 1996 में वाजपेयी की सरकार 13 दिन चली थी। 

वह इस बात से हताश थे कि मुस्लिम मतों के भरोसे रहने वाला कोई दल भाजपा को स्वीकार करने को तैयार नहीं था। इस तरह मुसलमान ही तय कर रहे थे कि भारत पर किसका शासन होगा। मोदी-शाह के दौर में सब कुछ बदल गया।

ये तथ्य तीन अहम नतीजों की ओर संकेत करते हैं:

  1. भाजपा के प्रतिद्वंद्वी या तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल बहुत हद तक मुसलमानों की पार्टी लगने लगे हैं, जबकि उनके नेता हिंदू हैं। भाजपा भी यही चाहती है। 80 फीसदी हिंदू और 20 फीसदी अन्य के साथ हिंदू बनाम अन्य का यह समीकरण उसके पक्ष में जाता है। वे चुनिंदा इलाकों में ईसाइयों पर काम करना जारी रखेंगे। पार्टी गोवा में जीत चुकी है और केरल में शुरुआत हो चुकी है। भाजपा के पास धैर्य और समय है। पूर्वोत्तर में उसने ईसाई जनजातियों के साथ सहज रिश्ता कायम किया है। भाजपा ने इनमें से किसी भी राज्य में बीफ पर प्रतिबंध की मांग नहीं की है। यही वजह है कि असदुद्दीन ओवैसी इसे पाखंड बताते हुए ताना कसते हैं, ‘यूपी की गाय मम्मी, नॉर्थईस्ट में गाय यम्मी।’ कुछ धर्मनिरपेक्ष दल अब भी मुसलमानों के वोट पर निर्भर हैं, लेकिन वे मुसलमानों के समर्थन में खुलकर बोलने से भी बचते हैं। जैसे दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार ने शाहीन बाग आंदोलन और उसके बाद हुए दंगों के दौरान चुप्पी बनाए रखी। मुस्लिम समर्थक कहलाने के भय ने ही उन्हें दूर रखा।
  1. ऐसे में भारतीय धर्मनिरपेक्षता को बचाने का बोझ मुसलमानों पर ही आ जाता है। यह मुश्किल और अव्यावहारिक तो है ही गलत भी है। मुसलमान समुदाय बंटा हुआ है और अहम चुनावी क्षेत्रों में उसके पास बहुमत नहीं है। आज उनसे कहा जा रहा है कि उस उम्मीदवार को वोट दें जिसके भाजपा को हराने की सबसे अधिक उम्मीद है ताकि उनका बचाव हो सके।
  1. ओवैसी ने एक और विचार दिया है: मुसलमान अपने राजनीतिक दल बनाएं और अपने नेता चुनें। यह विचार टिकाऊ नहीं है क्योंकि पूरा भारत पुराना हैदराबाद नहीं है। अगर मुस्लिम अपने राजनीतिक दल बना लेते हैं तो उनसे भाजपा की ताकत ही कई गुना बढ़ेगी। सच तो यह है कि जिन्ना के बाद भारतीय मुसलमानों ने कभी किसी मुसलमान को अपना नेता नहीं माना। चाहे नेहरू-गांधी परिवार हो या उत्तर प्रदेश तथा बिहार में यादव और दूसरी जगहों पर वाम एवं ममता बनर्जी, मुसलमानों ने हिंदू नेताओं पर भरोसा किया। पता नहीं यह उनके कितने काम आया लेकिन वे सत्ता संरचना से इतने बाहर कभी नहीं थे जितने आज हैं।

भारतीय मुसलमानों, हिंदुओं और धर्मनिरपेक्षों को नए ढंग से सोचने की जरूरत है। अल्पसंख्यक होने का डर सर सैयद अहमद के दौर में था, जिसने आखिरकार पाकिस्तान को जन्म दे दिया। इससे किसे लाभ हुआ या नहीं हुआ, यह बहस कभी और सही। हालांकि पाकिस्तान और इजरायल को एक श्रेणी में रखना अजीब लगता है मगर हमारी समझ के लिए उन पर विचार कीजिए। एक इस्लामी गणराज्य है और दूसरा यहूदीवादी। दोनों में अनुपातिक प्रतिनिधित्व है और भले ही यह अलग ढंग से काम करता हो मगर इसमें अल्पसंख्यकों को कुछ सीटें मिलने की गारंटी है। यानी जितनी जनसंख्या, उतना हक। 

धर्मनिरपेक्ष गणराज्य भारत में चुनावों में फर्स्ट पास्ट द पोस्ट प्रणाली अपनाई जाती है। इसलिए हमारे यहां निर्वाचन में अनुपात के हिसाब से प्रतिनिधित्व की अपेक्षा करना बेमानी है। लेकिन यहां एक अंतर और असंतुलन मौजूद है। इसका समाधान केवल तभी संभव है जब कोई प्रबुद्ध नेतृत्व उभरे और हिंदुओं के पर्याप्त बड़े हिस्से के साथ गठबंधन बनाए। भारतीय हिंदुओं ने संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता को चुना था और इसे बनाए रखने की जिम्मेदारी उन्हीं पर है। भाजपा को चुनौती देने वाला कोई भी विश्वसनीय दल उनके साथ विश्वास कायम किए बिना सफल नहीं हो सकता।

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First Published - May 10, 2026 | 9:50 PM IST

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