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ट्रंप का ‘अपमान युग’ और भारत की चुनौती: क्या मोदी की चुप्पी और विनम्रता ही सबसे बड़ा हथियार है?

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ट्रंप ने अपमान के युग की शुरुआत की है। उनका तरीका है अमेरिका के मित्र देशों के साथ रूखा व्यवहार और उन्हें झिड़कना

Last Updated- March 08, 2026 | 10:13 PM IST
Donald Trump on Middle East Crisis
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप | फाइल फोटो

अमेरिकी नौसेना द्वारा ईरानी युद्धपोत आईआरआईएस देना को डुबाए जाने के बाद उभरे आक्रोश को एक सुर्खी से समझा जा सकता है। वह यह कि डॉनल्ड ट्रंप ने अपमान के युग की शुरुआत कर दी है। यह उनके मित्रों, सहयोगियों और साझेदारों पर विशेष रूप से लागू होता है। हमारे लिए यानी भारत में इसका उत्तर एक और शब्द से निकलता है जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे।

इसे समझने का एक आसान तरीका भी है और वह है भारत के ट्रक चालकों के तर्क का इस्तेमाल। आपको विभिन्न राजमार्गों पर दौड़ते ट्रकों के पीछे अक्सर ऐसी पंक्तियां लिखी हुई नजर आएंगी: ऐसा कोई सगा नहीं, जिसको हमने ठगा नहीं।

यहां सगा में आप रिश्तेदारों की जगह साझेदार, सहयोगी, मित्र आदि को शामिल कर लीजिए और ठगने की जगह अपमानित करना रख लीजिए। ट्रंप का तरीका यही है- अमेरिका के मित्रों के साथ रुखाई से पेश आना और सार्वजनिक रूप से उन्हें लताड़ना। उनको पता है कि उनमें से कोई टकराव की क्षमता नहीं रखता क्योंकि वे अमेरिका पर निर्भर हैं। यूरोप इसका उदाहरण है। भारत के साथ हालिया व्यवहार को भी इसमें शामिल किया जा सकता है।

उन्होंने अक्सर इन देशों के नेताओं को अपमानित किया है। इस सप्ताह के आरंभ में उन्होंने किअर स्टार्मर के साथ ऐसा किया। इससे पहले वह स्पेन, डेनमार्क, नॉर्वे, कनाडा, यूक्रेन, दक्षिण अफ्रीका, फ्रांस, स्विट्जरलैंड आदि देशों के नेताओं के साथ ऐसा कर चुके हैं। स्पेन द्वारा ईरान युद्ध में अपने बेस का इस्तेमाल करने से नकारे जाने के बाद उन्होंने कहा कि अमेरिका पूछेगा नहीं। डेनमार्क और नॉर्वे की बात करें तो उनका आग्रह ग्रीनलैंड और नोबेल का है। दक्षिण अफ्रीका के संदर्भ में, उन्होंने ईलॉन मस्क के उस मिथक को मान लिया जिसमें ‘श्वेत’ नरसंहार की बात कही जाती है, और जेलेंस्की के प्रति उनका ‘प्यार’ तो हम अच्छी तरह जानते हैं। लेकिन इस बात ने उन्हें अब ईरान के ड्रोन झुंडों के खिलाफ यूक्रेन से मदद मांगने से नहीं रोका है। 

आप दो बातें देख सकते हैं। पहली, कि ट्रंप व्यावहारिक हो सकते हैं। वह अपने मित्रों के लिए किए गए अपमान को दिल पर नहीं लेते। यह भी कि वह उनसे उम्मीद करते हैं कि वे भी इसे दिल पर न लें। लेकिन यह समस्या पैदा कर सकता है। यूरोप उन पर इतना निर्भर है कि शिकायत नहीं कर सकता। यदि आप अपनी रक्षा नहीं कर सकते, तो आपको उस व्यक्ति से अपमान सहना पड़ता है जिसके हाथों आपने अपनी सुरक्षा सौंप दी है। अन्य लोकतंत्रों के लिए, जिनके पास लोकप्रिय नेता और अपनी रक्षा करने की क्षमता है, यह उसी तरह काम नहीं कर सकता। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण भारत है। नरेंद्र मोदी के बारे में ट्रंप ने कैमरे पर एक सहज बातचीत के दौरान कहा था, ‘मैं उनके राजनीतिक करियर को नष्ट नहीं करना चाहता।’

इसे एक उलझे हुए संदर्भ में इस्तेमाल किया गया था जो व्याख्या के लिए खुला था। व्यापार और रूसी तेल से लेकर समलैंगिकता-विरोध तक। ट्रंप दर्जनों बार दावा कर चुके हैं कि उन्होंने व्यापार रोकने की धमकी देकर लड़ाई को रोक दिया। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान उन्होंने अनेक विमानों को गिराए जाने का दावा किया। बेशक, वह यह नहीं बताते कि किसके विमान गिरे। ट्रंप को सुर्खियां तैयार करना पसंद है। किसी दिन जब उन्हें लगे कि कोई सुर्खी गायब है, तो वह एक कैबिनेट सदस्य को बर्खास्त कर देंगे।

आंतरिक सुरक्षा मंत्री क्रिस्टी नोएम की उनकी बर्खास्तगी और उसके बाद लिखा गया अविश्वसनीय पोस्ट देखें, जिसमें उन्होंने एक सामंती प्रमुख की तरह भद्दे अंदाज में यह बताया कि ‘उनके द्वारा बनाए गए बड़े फार्म’ पर नोएम का क्या भविष्य हो सकता है। 

दूसरी बात, ट्रंप केवल उन्हीं पर हमला करने में सहज और आत्मविश्वासी महसूस करते हैं जो उन पर निर्भर हैं। अमेरिका के संप्रभु मित्र या उनकी अपनी टीम के सदस्य। वह शी चिनफिंग के प्रति नरम रहते हैं, व्लादीमिर पुतिन को लाड़-प्यार करते हैं और यहां तक कि किम जोंग उन के साथ भी। नोएम इस कार्यकाल में दूसरी प्रमुख हस्ती हैं जिन्हें उन्होंने हटाया है। पहले थे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार माइकल वाल्ट्ज। लेकिन अभी बहुत कुछ बाकी है। 

अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने सात कैबिनेट-स्तरीय अधिकारियों को बर्खास्त किया और लगभग उतने को ही बाहर करने पर मजबूर किया। आज भी वह कुछ से युद्धरत हैं। पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन और सलाहकार स्टीव बैनन के बारे में सोचिए। कई मौकों पर ट्रंप अपने लोगों के लिए ऐसी बातें कह चुके हैं जिन्हें हमारी संस्कृतियों में अपमानजनक माना जाता है।

इससे साबित होता है कि ट्रंप की विशेष ‘मोहब्बतें’ केवल उनके मित्रों और साथियों तक सीमित हैं। यही कारण है कि जब वह किसी को ‘मेरा बहुत अच्छा दोस्त’ कहते हैं, तब वास्तव में चिंता करने का समय होता है। यही वह क्षण होता है जब उन्होंने आपके लिए अपनी तलवार तेज कर ली होती है। वह स्कूल के उस गुंडे की तरह हैं जिसे बार-बार अपने गिरोह में शामिल लोगों को याद दिलाना पड़ता है कि वही बॉस है, और प्रतिद्वंद्वी गुंडों से दूर रहना है।

भारत और मोदी इस पर कैसे प्रतिक्रिया देते हैं? यह यूरोप नहीं है और मोदी स्टार्मर, मैर्त्स या यहां तक कि मैक्रों भी नहीं हैं। अब तक उन्होंने ट्रंप को समझदारी से संभाला है। भारत चुप रहा, भले ही उसे ‘दंडात्मक’ शुल्क के लिए अलग से निशाना बनाया गया। मुझे नहीं लगता कि विपक्ष में बैठी भाजपा किसी कांग्रेस सरकार को वह जगह देती। कांग्रेस जब विपक्ष में होती है तो अधिकतर सोशल मीडिया पोस्ट से ही संतुष्ट रहती है। वे इतने आलसी हैं कि इस ‘राष्ट्रीय अपमान’ पर विरोध करने के लिए 10,000 लोग भी इकट्ठा नहीं कर पाते। लेकिन देखना यह है कि दबाव बढ़ने पर मोदी सरकार या भाजपा कितने समय तक इस शांति को बनाए रख सकती है? ट्रंप पर मौनव्रत रखना समझदारी है। इस बात को भुला देना होगा कि उन्होंने मनमोहन सिह को ‘मौनी बाबा’ कहा था क्योंकि वे विदेश मामलों में मामूली उकसावे पर नहीं बोलते थे। देवयानी खोबरागड़े का तथाकथित ‘अपमान’ इसका उदाहरण है।

अमेरिका-विरोध भारतीय जनमत का स्वाभाविक विकल्प है और दोनों पक्षों के लिए काम करता है। दूसरा क्षेत्र जिसमें वे समझदारी दिखा रहे हैं, वह है अन्य मित्रों की तलाश। मार्क कार्नी का अत्यधिक गर्मजोशी भरा स्वागत इसका अच्छा उदाहरण है। आखिरकार, कनाडा अमेरिका का सबसे करीबी सहयोगी रहा है और इसलिए ‘51वां राज्य’ जैसी सबसे बुरी गालियों का शिकार भी हुआ है। ट्रंप अपने पीड़ितों के लिए और अवसर भी बना रहे हैं। मझोली शक्तियां एक-दूसरे की गोद में सांत्वना खोज रही हैं।

अब तक किसी ने भारत को यह नहीं बताया कि मोदी इजरायल क्यों गए जबकि यह उनकी बारी भी नहीं थी बल्कि नेतन्याहू की भारत आने की बारी थी। मोदी ने यह यात्रा तब की जबकि उन्हें पता था कि ईरान पर युद्ध मंडरा रहा है।

मेरी एकमात्र अटकल यह है कि ऑपरेशन सिंदूर सैन्य क्षेत्र की कमियों और उन्हें तुरंत दूर करने की आवश्यकता पर एक कठोर चेतावनी थी। लगातार दो पीएसएलवी प्रक्षेपण विफलताएं, अमूल्य सैन्य- सक्षम उपग्रहों का नुकसान, अपने आईएसआर (खुफिया, निगरानी, टोही) संसाधनों की अपर्याप्तता, को दूर करने के साथ ही हथियारों, ड्रोन, सेंसर और वायु रक्षा की जरूरत होगी।

यह भी स्पष्ट है कि पश्चिम एशिया में भारत ने एक पक्ष चुन लिया है। और वह है इजरायल-यूएई गठबंधन। यह यूएई शासक शेख मोहम्मद बिन जायेद की अचानक और रहस्यमयी यात्रा को भी परिप्रेक्ष्य में रखता है। तीसरी समझदारी की बात है चीन को व्यापार में जगह देना। आखिर इस वैश्विक असुरक्षा के युग में, सीमित प्रभाव और अपनी कमजोरियों के साथ भारत कितने ‘पंगे’ ले सकता है?

मोदी सरकार जो चौथी समझदारी दिखा सकती थी, लेकिन शायद नहीं दिखाएगी, वह है विपक्ष (यानी कांग्रेस) के साथ अपने संबंधों को सुधारना। भारत में यह स्वस्थ परंपरा रही है कि सरकार राष्ट्रीय हित में विपक्ष को विश्वास में लेती थी। लेकिन आप यह कैसे करेंगे जब आप विपक्ष को कीट-पतंगा समझते हैं और उसके नेता को मसखरा?

मैं समझता हूं कि आज की राजनीति रूखी और कठोर है, लेकिन ट्रंप के अपमान से रुकने वाले नहीं हैं। इस सप्ताह उन्होंने आपके औपचारिक बेड़े की रीव्यू से निकलते हुए एक जहाज डुबो दिया, कल यह और भी बुरा होगा। जैसे-जैसे विपक्ष का दबाव बढ़ेगा, आपकी चाल चलने की गुंजाइश और कम होती जाएगी। रणनीतिक स्वायत्तता की एक खिड़की घरेलू राजनीति में भी होती है। उसे बंद करना आपके विकल्पों को सीमित कर देता है।

संक्षेप में, हमने खुद को वैश्विक कद मानने में जल्दबाजी कर दी।

अब समय है गहरी सांस लेने का, आत्म-श्लाघा को स्थगित करने का, और अपनी अर्थव्यवस्था, रक्षा, सामाजिक एकता को मजबूत करने, घरेलू राजनीति को पुनः संतुलित करने और द्विदलीय राष्ट्रीय एकता को फिर से बनाने का। कठिन है? लेकिन ट्रंप के कार्यकाल के बाकी तीन सालों को पार करने के लिए हममें थोड़ी विनम्रता की आवश्यकता है।

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First Published - March 8, 2026 | 10:12 PM IST

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