तेल संकट ने यह साफ कर दिया है कि ऊर्जा सुरक्षा अब बहुत जरूरी हो गई है। भारत को इस संकट से निपटने के लिए तुरंत कदम उठाने होंगे क्योंकि आने वाले समय में स्थिति और भी खराब हो सकती है। ऐसे में सवाल यह है कि हमारे पास विकल्प क्या हैं? भारत अपनी पेट्रोलियम जरूरतों को लगभग 85 फीसदी कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। ऐसे में सबसे सीधा उपाय है कि पेट्रोलियम उत्पादों की खपत कम की जाए।
वर्ष 2025-26 में भारत की कुल खपत लगभग 27 करोड़ टन रहने का अनुमान है। इसमें से 13.2 करोड़ टन (करीब 54 फीसदी) केवल परिवहन क्षेत्र में इस्तेमाल होता है। परिवहन ईंधन में लगभग 6 करोड़ टन हाई-स्पीड डीजल भारी और हल्के व्यावसायिक ट्रकों में लगता है, 2.2 करोड़ टन डीजल अन्य वाहनों में, 4 करोड़ टन पेट्रोल वाहनों में और लगभग 1 करोड़ टन हवाई ईंधन में उपयोग होता है।
वर्ष 2025-26 में कच्चे तेल का आयात लगभग 22.5 करोड़ टन रहेगा। यदि कच्चे तेल की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल होती है, तो कच्चे तेल के लिए सालाना आयात बिल लगभग 160 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा जबकि 60 डॉलर प्रति बैरल पर यह लगभग 80 अरब डॉलर होता। इस बढ़ते खर्च का असर यह हुआ है कि भारतीय रुपया भी गिरकर लगभग 95 रुपये प्रति डॉलर तक पहुंच गया है। इस स्थिति से निपटने के लिए कुछ जरूरी कदम उठाने होंगे।
देश में 6 करोड़ टन हाई-स्पीड डीजल में से करीब 5 करोड़ टन डीजल, भारी ट्रकों द्वारा लंबी दूरी तक माल ढुलाई में इस्तेमाल होता है। यदि कुछ सुधार किए जाएं तब इस माल परिवहन को रेल मार्ग पर स्थानांतरित किया जा सकता है। जिस तरह आधुनिक रेल परियोजनाओं पर ध्यान दिया गया है, उसी तरह माल ढुलाई को तेज, भरोसेमंद, समय पर चलने और शहर के भीतर डिलीवरी के लिए भी निवेश करना होगा।
आज सामानों की ढुलाई के लिए ट्रकों को रेल की तुलना में ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है क्योंकि रेल महंगी पड़ती है। वहीं ट्रक समय पर पहुंचने वाले और भरोसेमंद होते हैं, घर-घर डिलीवरी करते हैं, सामान सुरक्षित रहता है और रेल में कई बार लदान करने और उसे उतारने की जरूरत होती है। लेकिन रेलवे इन सभी समस्याओं का समाधान कर सकता है।
उदाहरण के लिए, गुजरात के पालनपुर से हरियाणा के रेवाड़ी तक बना वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर से 630 किलोमीटर की दूरी केवल 12 घंटे में तय हो जाती है। हालांकि, अभी फ्लैट वैगनों की भी कमी है जिन पर ट्रकों को रखा जाता है। इस समस्या का समाधान ‘ट्रक-ऑन-ट्रेन’मॉडल से किया जा सकता है, जिसमें भरे हुए ट्रकों को सीधे ट्रेन पर चढ़ाया जाता है और गंतव्य पर उतार दिया जाता है। इससे समय और लागत दोनों की बचत होती है।
ऐसी व्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए रेलवे को अपने माल भाड़े को कम करना चाहिए क्योंकि अभी यह यात्री किराये को सब्सिडी देने के कारण अधिक है। मौजूदा तेल संकट रेलवे के किराये और माल भाड़े को संतुलित करने का अच्छा अवसर है। साथ ही, रेलवे में फ्लैट वैगनों की संख्या भी जल्द बढ़ाई जानी चाहिए ताकि माल ढुलाई को अधिक प्रभावी बनाया जा सके।
अन्य निर्माणाधीन डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (डीएफसी) परियोजनाओं को तेजी से पूरा किया जाना चाहिए और बड़े शहरों के बीच छोटी दूरी के मार्गों पर भी नियमित मालगाड़ी सेवाएं शुरू की जानी चाहिए। लक्ष्य यह होना चाहिए कि 2030 तक लंबी दूरी के माल परिवहन का 50 फीसदी जो अभी ट्रकों से होता है, उसे रेलवे पर स्थानांतरित किया जाए और 2035 तक इसे 90 फीसदी तक बढ़ाया जाए।
इससे वर्ष 2030 तक ट्रकों में डीजल की खपत लगभग 2.5 करोड़ टन तक कम हो सकती है, जिससे कुल पेट्रोलियम उत्पादों की खपत में लगभग 10 फीसदी की कमी आएगी और 2035 तक यह कमी 20 फीसदी तक पहुंच सकती है। अन्य वाहनों में इस्तेमाल होने वाले 8.2 करोड़ टन पेट्रोलियम उत्पादों को कम करने के भी बड़े अवसर हैं। भारत पहले से ही कार, टैक्सी, थ्री-व्हीलर और बसों में इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) को बढ़ावा दे रहा है। साथ ही, पेट्रोल में 20 फीसदी एथनॉल मिलाने का लक्ष्य भी पूरा किया जा चुका है।
हालांकि, एथनॉल की ऊर्जा दक्षता पेट्रोल की तुलना में लगभग आधी होती है। इसलिए 20 फीसदी एथनॉल मिश्रण से माइलेज लगभग 10 फीसदी कम हो सकता है। अगर लोग उतनी ही दूरी तय करते हैं तब कुल ईंधन खपत लगभग 10 फीसदी बढ़ सकती है लेकिन पेट्रोल की खपत में कमी आएगी।
कुल मिलाकर पेट्रोल की खपत में लगभग 12 फीसदी की कमी हो सकती है। भारत एथनॉल का उत्पादन देश में ही कर रहा है, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा मक्के से बनता है जो सबसे अच्छा विकल्प नहीं है। बेहतर होगा कि इसे फसल के बचे हुए अवशेष से बनाया जाए। नई तकनीकों और एंजाइम्स की मदद से बना सेलुलोसिक एथनॉल अब सस्ता हो गया है।
सरकार ऐसे संयंत्र लगाने के लिए प्रोत्साहन भी दे रही है। पीएम-जी-वन योजना के तहत लगभग 150 करोड़ रुपये तक की सहायता दी जाती है और 5 साल तक ब्याज में 6 फीसदी तक छूट भी मिलती है ताकि ऐसे संयंत्र लगाए जा सकें।
हाल ही में दो बड़े एथनॉल संयंत्र शुरू किए गए हैं मसलन भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड द्वारा बारगढ़ में और दूसरा हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड द्वारा पंजाब के बठिंडा में। इन संयंत्रों की आमदनी को ग्रीन प्लास्टिक और बायोचार के लिए लिग्निन जैसे उप-उत्पाद बेचकर और बढ़ाया जा सकता है।
अमेरिका में तो एथनॉल से विमान ईंधन भी बनाया जा रहा है जिसे स्वच्छ ईंधन प्रोत्साहन के तहत बढ़ावा दिया जा रहा है। हालांकि, भारत में अभी कृषि अपशिष्ट को इकट्ठा करने और उसे संयंत्र तक पहुंचाने की व्यवस्था को और बेहतर बनाना होगा। गांव स्तर पर छोटे-छोटे ब्रिकेट बनाने वाले संयंत्र जिन्हें स्थानीय उद्यमी चलाते हैं, किसान से पराली खरीदकर उसे ब्रिकेट में बदलते हैं। इससे पराली को इकट्ठा करना और उसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाना आसान हो जाता है।
इसके अलावा, इलेक्ट्रिक वाहन सबसे बड़ा अवसर देते हैं। भारत का लक्ष्य है कि वर्ष 2030 तक 30 फीसदी निजी कारें, 70 फीसदी व्यावसायिक वाहन, 40 फीसदी बसें और 80 फीसदी दो/तीन-पहिया वाहन इलेक्ट्रिक हो जाएं। कुल मिलाकर, सड़क पर चलने वाले 30 फीसदी वाहनों को ईवी बनाने का लक्ष्य है। इस लक्ष्य के हिसाब से वर्ष 2030 तक लगभग 8 करोड़ इलेक्ट्रिक वाहन होंगे। इससे ट्रकों की डीजल खपत कम होगी क्योंकि कई हल्के वाणिज्यिक वाहन ईवी हो जाएंगे।
हाल में कई शहरों में पेट्रोल और डीजल पंपों पर लंबी कतारें देखी गई हैं, जिससे ईवी अपनाने की गति और बढ़ सकती है। इससे भारत को अपने जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने में भी मदद मिलेगी जिन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा 25 मार्च 2026 को मंजूरी दी गई थी। इस तरह के बहुआयामी प्रयास भारत को ऊर्जा सुरक्षा के करीब ले जा सकते हैं। मौजूदा तेल संकट एक अवसर है, जिसका सही उपयोग करके भारत अपने विकास के रास्ते को अधिक मजबूत और टिकाऊ बना सकता है।
(लेखक इंटीग्रेटेड रिसर्च ऐंड एक्शन फॉर डेवलपमेंट के अध्यक्ष हैं)