चार राज्यों के चुनाव खत्म होने के बाद अब नवनिर्वाचित सरकारों का ध्यान शासन प्रशासन पर रहेगा। अपने चुनाव घोषणापत्रों में उन्होंने भारी भरकम उपहारों का वादा किया था लेकिन खजाने में इसके लिए बहुत कम गुंजाइश है। इसलिए अब उन्हें बड़ी चिंता इस बात की होगी कि उन वादों को अमली जामा कैसे पहनाया जाए।
इन योजनाओं को लागू करना बड़ी चुनौती होगी क्योंकि ये राज्य पहले से ही वित्तीय दबाव में हैं। साथ ही पश्चिम एशिया में जंग के हालात भी राजस्व पर अच्छा खासा प्रतिकूल प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रभाव डाल सकते हैं। इससे ऊर्जा और अन्य कच्चे माल की कीमतों पर भी असर होगा। जो वादे किए गए हैं उनकी कीमत अब बहुत अधिक होने वाली है क्योंकि ये वृद्धि को बढ़ावा देने वाले और मानव को सशक्त बनाने वाले दीर्घकालिक खर्च की जगह ले सकते हैं।
जिन चार राज्यों में चुनाव हुए उनमें से तीन में सत्ता परिवर्तन हुआ और केवल असम में ही पिछली सरकार बरकरार रही। चारों राज्यों में एक जैसी बात यह रही कि जीतने वाले राजनीतिक दलों ने मतदाताओं को लुभाने के लिए खूब बढ़ चढ़कर वादे किए। अब जब वे इन वादों को पूरा करने चलेंगे तब उनको अहसास होगा कि हालात कैसे हैं? विडंबना है कि चार में से तीन राज्य – केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल काफी समय से राजकोषीय दिक्कतों से जूझ रहे हैं और इस मुश्किल आर्थिक परिस्थिति में मुफ्त की रेवड़ियों के लिए संसाधन जुटाने का कोई आसान रास्ता उनके पास नहीं है।
असम और पश्चिम बंगाल में जिस दल की सरकार बनी है वह केंद्र में भी सत्ता में है। ऐसे में संभव है कि उसे केंद्र सरकार से अधिक सहानुभूति पूर्ण व्यवहार मिल जाए। तमिलनाडु की नई सरकार भी टकराव वाले बयानों से बच रही है। लेकिन खुद केंद्र सरकार पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण गंभीर राजकोषीय संकट से जूझेगी और उसके पास भी खर्च करने की सीमित क्षमता ही होगी। जो भी हो, नवनिर्वाचित राज्य सरकारों के लिए सेवाओं की गुणवत्ता पर प्रतिकूल असर डाले बगैर चुनावी वादे पूरे करना बहुत बड़ी चुनौती होगी।
भारत में चुनाव ‘रेवड़ी’ यानी मुफ्त के तोहफे बढ़ाने की उपजाऊ जमीन बन गए हैं। हर राजनीतिक दल सोचता है कि सत्ता में आने का इकलौता तरीका यही है और सब्सिडी या नकद रकम भेजने के लिए नए-नए तरीके ईजाद करता रहता है। सोलहवें वित्त आयोग ने नकद अंतरण की तेजी से बढ़ती इसी प्रवृत्ति की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा था, ‘ बिना शर्त नकद अंतरण 2018-19 और 2025-26 के बजट अनुमानों के दरम्यान 28.8 प्रतिशत की दर से बढ़े हैं।’
उसने यह भी कहा, ‘… बिना शर्त अंतरण नए-नए इलाकों में तेजी से फैल रहे हैं और ज्यादा से ज्यादा राज्य इन्हें रकम देने का पसंदीदा साधन मानकर अपना रहे हैं।’ सभी राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए अपने घोषणापत्रों में बड़े-बड़े वादे करते रहे हैं और सत्ता में आते ही वे वादे उन्हें परेशान करने लगते हैं।
केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल की तीन नव निर्वाचित सरकारों की कहानी भी अलग नहीं है। इन तीनों राज्यों के पास ज्यादा राजकोषीय गुंजाइश नहीं है। सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के अनुपात में राजस्व घाटे की बात करें तो अभी केरल के लिए यह 2.1 प्रतिशत है, जो उसके राजकोषीय घाटे का 77 प्रतिशत है। इसी तरह तमिलनाडु के लिए राजस्व घाटा 1.5 प्रतिशत (उसके राजकोषीय घाटे का 47 प्रतिशत) और पश्चिम बंगाल के लिए 2.4 प्रतिशत (राजकोषीय घाटे का 60 प्रतिशत) है। इसका अर्थ है कि उधार ली गई 50 से 70 प्रतिशत रकम राजस्व व्यय पूरे करने में खर्च हो रही है।
इन राज्यों में राजस्व प्राप्तियों का लगभग 20 प्रतिशत ब्याज चुकाने में ही निकल जाता है। जीएसडीपी के अनुपात में बकाया देनदारियों की बात करें तो केरल में ये 37 प्रतिशत, तमिलनाडु में 30 प्रतिशत से अधिक और पश्चिम बंगाल में 40 प्रतिशत से अधिक थीं। सोलहवें वित्त आयोग के अनुसार केरल में बजट के अलावा भी उधारी ली गई है और मार्च 2025 में केरल इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट फंड बोर्ड पर भी लगभाग 28,880 करोड़ रुपये का ऋण बकाया था। तमिलनाडु में राज्य बिजली वितरण कंपनी पर ही 2023-24 में लगभग 1.73 लाख करोड़ रुपये कर्ज बकाया था।
फिर भी मुफ्त रेवड़ियों की घोषणाएं कम नहीं हो रहीं। तमिलगा वेट्री कषगम (टीवीके) ने 40 बिंदुओं वाले अपने घोषणापत्र में हर महिला को 2,500 रुपये महीने देने, छह मुफ्त गैस सिलिंडर, 200 यूनिट मुफ्त बिजली, सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा देने, लड़कियों की शादी के लिए आठ ग्राम सोना और एक रेशमी साड़ी देने, नवजात के लिए सोने की एक अंगूठी देने, हर स्नातक को 4,000 रुपये और हर डिप्लोमा धारक को 2,500 रुपये मासिक बेरोजगारी भत्ता देने, प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए मुफ्त कोचिंग और हर परिवार के लिए 25 लाख रुपये तक स्वास्थ्य बीमा सहित अनेक वादे किए गए हैं। जब राज्य के बजट में लगभग 10 लाख करोड़ रुपये की देनदारी बकाया हैं और बिजली वितरण क्षेत्र पर भी 2 लाख करोड़ रुपये बकाया हों तो इन वादों के लिए रकम जुटाना चुनौती बनेगा।
केरल में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट ने पांच गारंटी लागू करने का वादा किया है। ये गारंटी हैं – सामाजिक कल्याण पेंशन को 3,000 रुपये मासिक तक बढ़ाना, सरकारी बसों में महिलाओं को मुफ्त यात्रा, कॉलेज जाने वाली हर छात्रा को 100 रुपये महीने भत्ता, हर परिवार के लिए 25 लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा और युवा उद्यमियों के लिए 5 लाख रुपये तक का ब्याज-मुक्त व्यापार ऋण शामिल है।
पश्चिम बंगाल में सत्ता हासिल करने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपने घोषणापत्र में कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए सातवें केंद्रीय वेतन आयोग के अनुसार महंगाई भत्ता लागू करने, 1 करोड़ नई नौकरियां सृजित करने, महिलाओं को 3,000 रुपये मासिक सहायता देने और धान, आम तथा आलू के लिए समर्थन मूल्य तय करने का वादा किया है।
असम में भी सत्तारूढ़ पार्टी ने 2 लाख सरकारी नौकरियां देने और अरुणोदय योजना के तहत निम्न-आय वाले परिवारों को दी जाने वाली सहायता राशि धीरे-धीरे बढ़ाकर 3,000 रुपये कर देने का वादा किया है।
मुफ्त उपहारों की ऐसी घोषणाओं से चुनाव जीतने में तो मदद मिलती है मगर ये महंगी साबित होती हैं और इन्हें वृद्धि को बढ़ावा देने वाले पूंजीगत व्यय तथा मानव विकास को दांव पर लगाकर ही लागू किया जा सकता है। जब तक यह नहीं दिख जाता कि वृद्धि को हाशिये पर डालने वाली मुफ्त रेवड़ियों के बजाय दूसरी बातें चुनाव जीतने में ज्यादा निर्णायक भूमिका निभाती हैं तब तक ऐसा लोकलुभावनवाद अन्य राज्यों में भी फैल सकता है।
(लेखक राष्ट्रीय लोक नीति और वित्त संस्थान के पूर्व निदेशक हैं। लेख में निजी विचार हैं)