चर्चित गायक दिलजीत दोसांझ ने इस साल अप्रैल में ‘द जिमी फैलन शो’ में अपनी पंजाबी पहचान को बड़े फख्र के साथ पेश किया। उन्होंने पूरे जोश के साथ गाना गाया, मंच पर थिरके और बीच-बीच में हंसी-मजाक भी करते हुए नजर आए। वहीं, पिछले साल एड शीरन के दुनिया भर में हिट रहे गीत ‘सैफायर’ में अरिजीत सिंह की आवाज का जादू देखने को मिला। स्ट्रीमिंग की सुविधा ने मीडिया और मनोरंजन की दुनिया को आपूर्ति और मांग दोनों स्तरों पर एक समान स्तर पर ला दिया है, जिसके कारण यह एक बड़ा वैश्विक बाजार बन चुका है। दोसांझ, शीरन या बीटीएस जैसे कलाकार इसी बदलाव की देन हैं। वे अपनी राष्ट्रीय पहचान की सीमाओं को लांघकर दूर-दराज के दर्शकों और श्रोताओं तक अपनी पहुंच बना रहे हैं और विविध आवाजों, गीत और संगीत को सामने लाने के लिए अन्य संगीतकारों व गायकों के साथ जुगलबंदी कर रहे हैं।
मनोरंजन के भविष्य का अंदाजा लगाने के लिए संगीत एक बेहतरीन माध्यम है। दुनिया के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक म्यूजिक फाइल पहुंचाने के लिए बहुत कम डेटा और बेहद कम बैंडविड्थ की जरूरत होती है। इसी वजह से यह उन पहले कारोबारों में से एक था जो पहले इंटरनेट और फिर स्ट्रीमिंग के कारण पूरी तरह बदल गए। जब 1990 के दशक के आखिर में म्यूजिक फाइलों को छोटा करने वाली तकनीक ‘एमपी3’ लोकप्रिय हुई, तब युवाओं ने कॉम्पैक्ट डिस्क (सीडी) से गाने निकालकर उन्हें आपस में साझा करने के लिए एक नेटवर्क बना लिया जिससे यह पूरा कारोबार धराशायी हो गया।
‘इंटरनैशनल फेडरेशन ऑफ द फोनोग्राफिक इंडस्ट्री’ (आईएफपीआई) के आंकड़ों के मुताबिक, 2001 में म्यूजिक का वैश्विक राजस्व जहां 22 अरब डॉलर था, वहीं 2014 में कम होकर महज 13 अरब डॉलर के निचले स्तर पर आ गया। इसके बाद 2001 में आईट्यून्स, 2005 में यूट्यूब और फिर 2016 से स्पॉटिफाई जैसे म्यूजिक स्ट्रीमिंग ऐप ने पूरे परिदृश्य को बदलने में मदद की। साल 2016 से राजस्व में फिर से बढ़ोतरी शुरू हुई और 2025 तक यह लगभग 32 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इस कारोबार में अब अच्छा प्रदर्शन हो रहा है।
दुनिया भर में, संगीत से होने वाली कुल कमाई का 70 फीसदी हिस्सा स्ट्रीमिंग से आता है। इसके बाद दूसरा सबसे बड़ा हिस्सा, यानी 16.6 फीसदी, रिकॉर्ड आदि की बिक्री से मिलता है, जिसमें पिछले साल विनाइल रिकॉर्ड्स की भारी मांग के चलते 8 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई। हालांकि, इसके सामने दो बड़ी चुनौतियां भी हैं।
पहली चुनौती यह है कि अधिकांश देशों में यूट्यूब और स्पॉटिफाई का दबदबा है। आप यह तर्क दे सकते हैं और जैसा कि आईएफपीआई भी कहता है कि हर बाजार में प्रभुत्व रखने वाले ब्रांड अलग-अलग हैं। मिसाल के तौर पर यह ऐपल, यूट्यूब, स्पॉटिफाई या फिर भारत में जियोसावन या पहले विंक जैसा कोई स्थानीय स्ट्रीमिंग ब्रांड हो सकता है। लेकिन हकीकत यही है कि भारत के म्यूजिक से जुड़े बाजार पर यूट्यूब का राज है और उसके बाद स्पॉटिफाई का नंबर आता है। इन मंच ने कमाई साझा करने के लिए सभी प्रक्रियाओं, प्रणाली और भुगतान के तौर-तरीकों को व्यवस्थित करने का बेहतरीन काम किया है। लेकिन ऐसा करने के साथ ही उन्होंने एक असंतुलन भी पैदा कर दिया है।
करीब 17.8 करोड़ श्रोताओं के भारतीय बाजार में, केवल 1.4 करोड़ लोग ही किसी म्यूजिक स्ट्रीमिंग सेवा का सशुल्क सब्सक्रिप्शन लेते हैं। वर्ष 2025 में वीडियो स्ट्रीमिंग के पास 2.72 करोड़ सब्सक्राइबर थे। म्यूजिक के क्षेत्र में, कारोबार का एक बड़ा हिस्सा विज्ञापनों से मिलने वाली कमाई पर निर्भर है। हर बार जब कोई गाना बजाया जाता है तब एक म्यूजिक लेबल को 4 से 10 पैसे के बीच की कमाई होती है जबकि वैश्विक स्तर पर यही अनुमानित कमाई 50 से 90 पैसे के बीच है। यह अनुमान मुफ्त और सब्सक्रिप्शन दोनों स्रोतों से होने वाली कुल आय के हिस्से को मिलाकर लगाया गया है।
कोई गाना भले ही करोड़ों बार क्यों न बजाया जाए लेकिन 4 पैसे बहुत बड़ी रकम नहीं बन पाती खासकर तब जब इसी कमाई से मार्केटिंग से लेकर रॉयल्टी तक हर चीज का खर्च निकालना हो। यही वजह है कि कुल कमाई की वृद्धि हमेशा गाने को सुने जाने की संख्या के मुकाबले पीछे छूट जाती है। वर्ष 2025 में भारत में लगभग 5,900 करोड़ रुपये की कमाई के साथ, म्यूजिक उद्योग की कमाई टीवी उद्योग की कमाई के 10 फीसदी से भी कम थी। दूसरी चुनौती जिसे आईएफपीआई की मुख्य कार्याधिकारी (सीईओ) विक्टोरिया ओकले वैश्विक स्तर पर जोर-शोर से उठा रही हैं वह है फर्जी प्ले यानी गानों को नकली तरीके से बार-बार बजाना।
आज आप आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) टूल का इस्तेमाल करके नकली कवर आर्ट, नकली बोल, नकली धुन और बैंड के नकली नाम के साथ सैकड़ों फर्जी गाने तैयार कर सकते हैं। फिर आप इन्हें स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स पर अपलोड कर सकते हैं। इसके बाद, इंटरनेट पर इंसानों की तरह काम करने वाले एआई बॉट्स के जरिए इन गानों के व्यूज या स्ट्रीम्स की संख्या बढ़ा दी जाती है ताकि यह लगे कि बहुत से लोगों ने इन्हें सुना है। इसका सीधा सा मतलब यह है कि जो पैसा असल कलाकारों को मिलना चाहिए था, वह नकली प्ले का खेल रचने वाले किसी जालसाज की जेब में जा रहा है।
‘स्ट्रीमिंग फार्म के जरिये अब इसे बाकायदा उद्योग की तरह बढ़ाया जा रहा है। कुछ अनुमान बताते हैं कि दुनिया भर में स्ट्रीमिंग से होने वाली कमाई का 10 से 20 फीसदी हिस्सा इन फर्जी प्ले की भेंट चढ़ रहा है। अब इस पूरे घटनाक्रम को मीडिया और मनोरंजन के बाकी कारोबारों के संदर्भ में देखिए। जब वीडियो और प्रकाशन की बात आती है तब वैश्विक स्तर पर गूगल (जिसके पास यूट्यूब है) और मेटा (इंस्टाग्राम, फेसबुक और व्हाट्सऐप) का एक डिजिटल दबदबा पहले से ही मौजूद है। हर देश का स्थानीय उद्योग अपने-अपने तरीके से इससे निपटने की कोशिश कर रहा है।
हालांकि, यह फर्जी प्ले का मामला बिल्कुल अलग है। नेटफ्लिक्स, एमेजॉन प्राइम वीडियो या सोनी लिव जैसे सब्सक्रिप्शन पर चलने वाले मंच को प्रभावित करने की इसकी क्षमता सीमित है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ये मंच अपनी शो या फिल्में खुद अपने पैसे खर्च करके बनवाते हैं। इससे एक ऐसा सुरक्षा घेरा बन जाता है जिसे ये जालसाज पार नहीं कर पाते। इसके अलावा, एक नकली फिल्म या शो बनाने के लिए कई गीगाबाइट बैंडविड्थ की जरूरत होती है, जिससे ऐसा कर पाना लगभग नामुमकिन हो जाता है।
लेकिन जहां यह तकनीक तबाही मचा सकती है, वह है यूट्यूब के छोटे वीडियो (शॉर्ट्स), इंस्टाग्राम जैसे शॉर्ट-वीडियो मंच या माइक्रो-ड्रामा (बेहद छोटी वेब सीरीज) सेवाएं। असल में, हर वो सामग्री जो छोटी है वो कम बैंडविड्थ वाली है और इन्हें बनाने वाले पहले से ही प्रोडक्शन के काम में एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं। गौर करने वाली बात यह है कि म्यूजिक के क्षेत्र में कॉपीराइट की धोखाधड़ी थोड़ी-बहुत हमेशा से थी, लेकिन एआई ने अब इसे पंख दे दिए हैं। ऐसे में सवाल यह है कि इस खेल को शॉर्ट वीडियो तक पहुंचने में आखिर कितना वक्त लगेगा?