ईरान और अमेरिका-इजरायल युद्ध पांचवें सप्ताह में प्रवेश कर चुका है और इसकी चपेट में आकर भारतीय सूचकांक 9 फीसदी से अधिक टूट चुके हैं। युद्ध के प्रत्यक्ष प्रभाव हम सभी के सामने हैं क्योंकि होर्मुज स्ट्रेट लगभग बंद हो चुका है। भारत के कुल आयात का लगभग 54 फीसदी कच्चा तेल, 60 फीसदी तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) और लगभग 90 फीसदी तरल पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरते हैं। तेल और गैस के साथ-साथ भारत को नेफ्था, विमान ईंधन (एटीएफ) और गैसऑयल जैसे परिष्कृत उत्पादों की कमी का भी सामना करना पड़ रहा है।
खाद्य क्षेत्र में स्थिति और भी गंभीर है। खाद्य उत्पादन डीजल और उर्वरकों पर निर्भर करता है। उर्वरक जैसे यूरिया, अमोनिया और फॉस्फेट पैदावार बढ़ाते हैं। वैश्विक यूरिया व्यापार का 30 फीसदी से अधिक और अमोनिया और फॉस्फेट का लगभग 20 फीसदी हिस्सा भी होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है।
खाड़ी क्षेत्र से दुनिया को कुल हीलियम के एक तिहाई से अधिक की आपूर्ति होती है। हीलियम सेमीकंडक्टर और इमेजिंग मशीनों के लिए अत्यंत जरूरी घटक है। पूरी दुनिया में मेथनॉल उत्पादन में भी इसकी लगभग 30 फीसदी हिस्सेदारी है जो प्लास्टिक, पेंट और ईंधन के लिए एक आधारभूत रसायन है। खाड़ी क्षेत्र सल्फर निर्यात में भी अग्रणी है (विश्व के कुल निर्यात का लगभग 45 फीसदी) जिसका इस्तेमाल सीधे उर्वरक उत्पादन में उपयोग होता है। सल्फ्यूरिक एसिड का इस्तेमाल तांबा, कोबाल्ट और निकल के निष्कर्षण में किया जाता है जिनका उपयोग ट्रांसफाॅर्मर, इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं में होता है।
इस युद्ध से एल्युमीनियम की आपूर्ति भी प्रभावित हुई है। दुनिया में एल्युमीनियम उत्पादन में खाड़ी क्षेत्र लगभग 9 फीसदी योगदान देता है और चीन के बाहर कुल आपूर्ति में 22 फीसदी दखल रखता है जिससे यूरोप और अमेरिका में वाहन से लेकर निर्माण क्षेत्रों के लिए जोखिम खड़ा गया है। निवेशकों को अब यह तय करना होगा कि इन प्रभावों का किस हद तक असर मूल्य निर्धारण में दिख चुका है।
विमानन ईंधन किसी विमानन कंपनी के परिचालन लागत में 35-40 फीसदी हिस्सा रखता है। विश्लेषकों के अनुसार ईंधन की कीमतों में 10 फीसदी वृद्धि से परिचालन लाभ लगभग 15 फीसदी तक घट जाता है। पश्चिम एशियाई हवाई क्षेत्र बंद होने और उड़ान मार्गों के लंबा होने से विमानन कंपनियों का मार्जिन और भी कम हो जाता है। उपभोक्ता वस्तुओं के क्षेत्र में दबाव अधिक व्यापक है। कच्चे तेल से जुड़ी पैकेजिंग सामग्री पॉलिएथिलीन टेरेफ्थालेट (पीईटी) चिप, लिक्विड पैराफिन, उच्च घनत्व पॉलिइथिलीन और लचीले लैमिनेट परिचालन लागत का लगभग 15 फीसदी हिस्सा हैं।
कीमतें नियंत्रित करने की अधिक ताकत रखने वाली कुछ बड़ी कंपनियां बढ़ी लागत का कुछ बोझ ग्राहकों पर डाल सकती हैं मगर छोटी एवं असंगठित कंपनियां ऐसा नहीं कर सकतीं जिससे बाजार हिस्सेदारी में बदलाव तेजी से हो रहा है। कांच का उत्पादन प्राकृतिक गैस पर निर्भर करता है। कपड़ा उत्पादक मध्यवर्ती सामग्रियों पर निर्भर हैं। युद्ध के कारण आपूर्ति में आए व्यवधान ने पॉलिएस्टर धागे की कीमतें पहले ही 15-20 फीसदी तक बढ़ गई हैं। सीमेंट प्रत्यक्ष आपूर्ति व्यवधान से बच जाता है मगर फिर भी मूल्य प्रभावों से प्रभावित होता है। ईंधन की लागत में वृद्धि से आय कम हो सकती है, साथ ही पैकेजिंग में उपयोग होने वाले पॉलिप्रोपिलीन की उच्च कीमतों से भी नुकसान होता है। गुजरात के मोरबी में टाइल उत्पादकों ने गैस की कमी के कारण अपना काम बंद कर दिया है।
ये सभी छोटे-छोटे प्रभाव हैं मगर ये सब मिलकर एक ऐसे हालात तैयार कर देते हैं जो समय और कीमतों से प्रभावित होते हैं। पिछले कुछ हफ्तों से चल रही किल्लत के दौरान बहुत कम गड़बड़ी दिखाई दी है। मगर अगले एक से तीन महीनों में जब भंडार कम हो जाएगा तो इसकी दोबारा आपूर्ति बहुत अधिक लागत पर होगी जिससे एक बड़ा अप्रत्यक्ष झटका लगेगा।
सवाल यह है कि बाजार ने इसका किस हद तक अनुमान लगा लिया है? बाजार सबसे पहले लगने वाले झटके पर तत्काल प्रतिक्रिया देते हैं यानी शेयर बाजार लड़खड़ाते हैं, मुद्राएं कमजोर होती हैं आदि। मगर स्वभाव से आशावादी होने के कारण निवेशक यह मान लेते हैं कि स्थिति जल्द ही सामान्य हो जाएगी। दूसरे और तीसरे स्तर पर होने वाले प्रभाव कम दिखाई देते हैं। व्यापक राजकोषीय गणित और उपभोग पर इसके प्रभाव को तत्काल अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता है।
कच्चे तेल की कीमत में प्रत्येक 10 डॉलर की वृद्धि से भारत की आयात लागत में 12 अरब से 15 अरब डॉलर की वृद्धि होती है। 80 डॉलर से ऊपर तेल की कीमतें रहने से मुद्रास्फीति दर 4.5 फीसदी से ऊपर जाने का खतरा है। इससे चालू खाता घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 1.5-2 फीसदी तक बढ़ जाएगा और रुपया कमजोर होकर डॉलर के मुकाबले 95 से भी आगे जा सकता है। रुपया कमजोर होने और विदेशी निवेशकों द्वारा बिकवाली के बाद विदेशी निवेश ठिठक जाएगा।
सबसे बड़ा प्रभाव बिगड़ते व्यापार संतुलन, ऊंची मुद्रास्फीति, बढ़ते राजकोषीय घाटे और घटते कर राजस्व के रूप में सामने आएगा। उर्वरकों की बढ़ती लागत से सब्सिडी का आंकड़ा बढ़ जाता है और इसकी (सब्सिडी की) कमी के कारण किसान उर्वरकों का इस्तेमाल करने से कतराने लगते हैं। इससे कुल फसल पैदावार कम रहने का जोखिम उत्पन्न हो जाता है। सरकार ईंधन की कीमतों में कुछ वृद्धि सहन कर सकती है मगर ईंधन और उर्वरक दोनों की कीमतों में अचानक वृद्धि से जूझ पाना कठिन है। इस स्थिति का सामना करने के लिए सरकार पूंजीगत व्यय में कटौती करेगी जो हाल के वर्षों में भारत की आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा देने में अहम रहा है।
अगर युद्ध नहीं रुकता है तो हालात बहुत खराब हो जाएंगे। मुद्रास्फीति बढ़ने से स्थानीय मुद्रा कमजोर होती है जिसका सीधा असर ऊर्जा पर अधिक लागत के रूप में सामने आता है। महंगे ईंधन और उर्वरकों से बढ़ती लागत के कारण परिवारों के पास विवेकाधीन खर्च कम हो जाएगा और कर राजस्व में कमी आएगी। अर्थव्यवस्था शुरुआती कुछ हफ्तों में झटकों को सहन कर सकती है।
इसके अलावा समस्या कई छोटे-छोटे बदलावों के रूप में सामने आएगी यानी मार्जिन में कुछ प्रतिशत अंकों की गिरावट होगी, उत्पादन में कुछ हफ्तों की देरी और मुद्रास्फीति में कुछ आधार अंक की वृद्धि हो जाएगी। बाजार हर बार इस पर अपनी प्रतिक्रिया देगा। चूंकि, ये बदलाव धीरे-धीरे होंगे इसलिए उनके प्रभाव का सही अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकेगा। कुल मिलाकर उतार-चढ़ाव भरे सफर के लिए तैयार रहें।
(लेखक मनी लाइफ डॉट कॉम के सह-संस्थापक एवं मनीलाइफ फाउंडेशन के न्यासी हैं)