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भारत का तेल व्यापार घाटा: मांग पर नियंत्रण और खपत में संतुलन की जरूरत

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तेल आयात पर निर्भरता कम करने के लिए भारत को इसकी मांग पर भी अंकुश लगाना होगा। बता रहे हैं धर्मकीर्ति जोशी और अधीश वर्मा 

Last Updated- June 04, 2026 | 11:32 PM IST
India Oil trade
इलेस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा

पश्चिम एशिया संकट भारत की अर्थव्यवस्था को कई तरह से प्रभावित कर रहा है। ऊर्जा जिंसों खासतौर पर कच्चे तेल की कीमतों पर इसका सबसे अधिक असर हुआ है। फरवरी के अंत में जंग छिड़ने के ​बाद से अब तक कच्चे तेल की कीमतें 60 फीसदी बढ़ चुकी हैं। कमी के बावजूद तेल और तेल उत्पाद देश की कुल ऊर्जा आपूर्ति में 25 फीसदी के हिस्सेदार हैं। तेल आयात पर देश की बढ़ती निर्भरता हमें खासतौर पर संवेदनशील बनाती है। हमारी घरेलू तेल जरूरतों का 85 फीसदी आयात किया जाता है।

हम कच्चे तेल का आयात करते हैं और उसका कुछ हिस्सा परिशोधित पेट्रोलियम उत्पाद के रूप में निर्यात करते हैं। चूंकि आयात का आकार और लागत पेट्रोलियम निर्यात से बहुत अधिक है इसलिए तेल व्यापार निरंतर घाटे में रहता है। वित्त वर्ष 26 में यह घाटा 120 अरब डॉलर रहा। आमतौर पर जब कच्चे तेल की कीमतें गिरती हैं तो भारत का तेल व्यापार घाटा कम होता है। परंतु पिछले दो वित्त वर्षों यानी 2024-25 और 2025-26 में यह रिश्ता टूट गया।

सस्ते कच्चे तेल के बावजूद (वित्त वर्ष 24 में 83 डॉलर प्रति बैरल से घटकर वित्त वर्ष 26 में 70.3 डॉलर प्रति बैरल) भारत का तेल व्यापार घाटा 27 फीसदी बढ़कर 94.5 अरब डॉलर से 120 अरब डॉलर हो गया क्योंकि पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात घट गया।

वैश्विक तेल की मांग कमजोर होने के तीन मुख्य कारण थे। महामारी के बाद अचानक गतिशीलता में आई तेजी का कम होना, औद्योगिक वृद्धि की सुस्ती, और इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने में वृद्धि।

भारत में रुझान इसके विपरीत रहा। देश की तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था के कारण कच्चे तेल का आयात लगातार बढ़ता रहा। आश्चर्य नहीं कि 2024 के बाद के दो वित्त वर्षों में तेल भारत के वस्तु व्यापार घाटे का सबसे बड़ा योगदानकर्ता रहा है। चिंताजनक बात यह है कि वर्तमान में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी लंबे समय तक बनी रह सकती है।

कच्चे तेल के बाजार एक बड़े आपूर्ति तंगी का सामना कर रहे हैं, क्योंकि होर्मुज स्ट्रेट बंद है और पश्चिम एशिया में तेल उत्पादन केंद्र क्षतिग्रस्त हो गए हैं। भले ही होर्मुज स्ट्रेट से आवागमन बेहतर हो जाए लेकिन पश्चिम एशिया संघर्ष से नष्ट हुए उत्पादन तंत्र को सामान्य होने में समय लगेगा। क्रिसिल का अनुमान है कि इस वित्त वर्ष में ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत 90-95 डॉलर प्रति बैरल रहेगी, जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह 70.3 डॉलर प्रति बैरल थी। परिणामस्वरूप वित्त वर्ष 27 में भारत का तेल व्यापार घाटा और भी बढ़ने वाला है।

बढ़ता हुआ तेल व्यापार घाटा, अन्य कारकों के साथ मिलकर, इस वित्त वर्ष भारत के चालू खाते के घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 2.2 फीसदी तक पहुंचा देगा जो पिछले वित्त वर्ष के लगभग 0.8 फीसदी से तेज उछाल है। इसके साथ ही, पूंजी प्रवाह कमजोर रहने के आसार हैं। जैसा कि पिछले दो वित्तीय वर्षों में हुआ। इसका अर्थ है कि रुपये और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव ऊंचा बना रहेगा।

आईईए ने कहा है कि पूर्वानुमान अवधि यानी 2024 से 2030 के बीच में भारत की कच्चे तेल की मांग प्रतिदिन 10 लाख बैरल तक बढ़ेगी। किसी भी देश के लिए यह अब तक की सबसे बड़ी वृद्धि है। इसका कारण तेज शहरीकरण, अपेक्षाकृत मजबूत औद्योगिक वृद्धि और उभरता हुआ परिवहन क्षेत्र है। दूसरी ओर वैश्विक मांग धीमी बनी रहने की संभावना है और 2030 में तो इसमें कमी आ सकती है।

वर्तमान मुश्किलों से निपटने के लिए सरकार मितव्ययिता उपायों और नैतिक आग्रह के माध्यम से प्रबंधन करने की कोशिश कर रही है। उदाहरण के लिए घर से काम को बढ़ावा देना। हाल तक तेल विपणन कंपनियां और सरकार ऊंचे तेल मूल्यों का बोझ खुद उठा रही थीं। अब यह धीरे-धीरे अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचाया जा रहा है। मांग को नियंत्रित करने के लिए हाल ही में पेट्रोल और डीजल की कीमतें पंप पर बढ़ा दी गईं।

आपूर्ति के मामले में, कच्चा तेल वैकल्पिक स्रोतों से कुशल कूटनीति के जरिए खरीदा जा रहा है। रूसी तेल पर से प्रतिबंध हटना भी मददगार है। मध्यम से दीर्घकाल में मांग को नियंत्रित करने के लिए आपूर्ति का विविधीकरण जारी रहना चाहिए और रणनीतिक भंडार को मजबूत करना होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में संयुक्त अरब अमीरात की यात्रा के दौरान इस दिशा में कई ऐतिहासिक समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इनमें से एक समझौता इंडियन स्ट्रटीजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स लिमिटेड और अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी के बीच रणनीतिक सहयोग समझौता है जिसका उद्देश्य भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना है।

उपलब्ध घरेलू ऊर्जा स्रोतों के उपयोग को प्राथमिकता देना ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। विशेषकर भू-राजनीतिक अस्थिरता के समय। आयात पर निर्भरता कम करने के लिए तेल खनन की दिशा में भी ठोस प्रयास आवश्यक हैं। सरकार ने इस दिशा में कदम बढ़ाए हैं। हाल ही में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस उत्पादन पर रॉयल्टी दरों में कमी घरेलू खोज को प्रोत्साहित करने और निवेश में सुधार दिखाई देने के उद्देश्य से की गई है। समुद्र मंथन कार्यक्रम का लक्ष्य गहरे समुद्र में तेल, गैस और अहम खनिजों की खोज करना है। इन पहलों को आगे बढ़ाना होगा। लेकिन इनकी परिपक्वता अवधि लंबी होती है और इनमें अनिश्चितताएं भी होती हैं। इसलिए साथ ही साथ कच्चे तेल पर आयात निर्भरता कम करने के लिए अतिरिक्त और अधिक निश्चित रास्ते भी खोजने होंगे।

हाल ही में घोषित 100 फीसदी एथनॉल मिश्रण का लक्ष्य उसी दिशा में एक कदम है। बेहतर और व्यापक ईवी अधोसंरचना विकसित करने पर अधिक ध्यान देना, साथ ही सार्वजनिक परिवहन (हाई-स्पीड रेल, मेट्रो नेटवर्क आदि) में अधिक निवेश करना भी वांछनीय है। भारत में कोयला प्राथमिक ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत है और इस पर आयात निर्भरता कम है, क्योंकि घरेलू उत्पादन मांग का 70 फीसदी से अधिक पूरा करता है।

यद्यपि स्वच्छ कोयला प्रौद्योगिकियां अपनाई जा सकती हैं, लेकिन नवीकरणीय ऊर्जा की अस्थिर प्रकृति को देखते हुए कोयला-आधारित बिजली आवश्यक क्षमता प्रदान करती रहेगी। यह दृष्टिकोण नवीकरणीय ऊर्जा, विशेषकर सौर ऊर्जा में तेज निवेश को सुगम बनाएगा, जहां भारत पहले ही उल्लेखनीय प्रगति कर चुका है। इसके अतिरिक्त, न्यूक्लियर टेक्नॉलजी को अपनाने की गति तेज करना और वर्ष 2031-32 तक लगभग 22 गीगावॉट का लक्ष्य हासिल करना एक सतत प्रयास होना चाहिए।

भारत का तेल व्यापार घाटा यदि सामान्य परिदृश्य में संरचनात्मक रूप से और बड़ा होने जा रहा है, तो आयात निर्भरता कम करने के उपायों को दीर्घकालिक आकांक्षा से हटाकर तत्काल, क्रियान्वयन योग्य प्राथमिकताओं में बदलना होगा। यह विकसित भारत 2047 के लक्ष्य के अनुरूप है, जिसे अधिक आत्मनिर्भरता के माध्यम से हासिल किया जाना है।


(लेखक क्रमशः क्रिसिल लिमिटेड में मुख्य अर्थशास्त्री और वरिष्ठ अर्थशास्त्री हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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First Published - June 4, 2026 | 11:26 PM IST

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