अब जबकि पाकिस्तान के साथ 87 घंटों तक चली झड़प की वर्षगांठ मनाने की होड़ खत्म हो चुकी है तो हम यह आकलन कर सकते हैं कि ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान ने भारत के साथ लड़ाई में किस तरह का व्यवहार किया है। रणनीतिक रूप से शानदार, लेकिन सामरिक रूप से विनाशकारी, इसके लिए यह एक अच्छी हेडलाइन हो सकती है। यही कारण है कि जोदार शुरुआत करने के बाद, कभी-कभी तो बेहद शानदार ढंग से शुरुआत करने के बाद भी उसे हर जंग में शिकस्त मिली है।
इसके बावजूद 1971 और करगिल को छोड़ दिया जाए तो उसने ज्यादातर में जीतने का ही दावा किया है। आइए प्रमाणों के आधार पर वास्तविकता की पड़ताल करते हैं। हर युद्ध या झड़प के बारे में बार-बार बात करना भारतीय उपमहाद्वीप का एक प्रिय शगल है। बस अंतर इतना ही है कि पाकिस्तान में यह बड़े पैमाने पर किया जाता है यानी इसे स्कूली पाठ्यपुस्तकों में भी शामिल किया जाता है।
आइए 87 घंटे की झड़प पर नजर डालें। फील्ड मार्शल से लेकर राजनीति के सबसे निचले स्तर के लोगों तक पूरा पाकिस्तान इस बात पर विश्वास करता है कि उन्होंने जीत हासिल की। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा उस ‘स्थायी सहयोगी’ को गले लगाया जाना जिसे अमेरिका छोड़ चुका था, इस स्वघोषित ‘विजय’ के पक्ष में एक मुहर सा लगा।
तथ्य यह है कि मुनीर और उनके लोगों की ओर से इसकी योजना पहले से बना ली गई थी। पहलगाम हत्याकांड के सिर्फ चार दिन पहले और ऑपरेशन सिंदूर के करीब दो हफ्ते पहले स्टीव विटकॉफ के बेटे जैक का दौरा और क्रिप्टो सौदा (जिसमें ‘टेक’ के मामले में माहिर एक पाकिस्तानी युवा, एक कोर कमांडर का दामाद और अब क्रिप्टो कारोबारी शामिल थे) हो चुका था।
जब पहलगाम की योजना बनी तो मुनीर को पता था कि भारत जवाब देगा। इसलिए उन्होंने ट्रंप परिवार के लालच का लाभ उठाने की पूर्व योजना बनाई। इस बात को दुनिया में दूसरों से पहले समझने के लिए उनकी सराहना करनी होगी। या शायद सऊदी अरब ने उन्हें सावधान किया हो। लड़ाई शुरू होने के पहले ही उन्होंने ट्रंप के तंत्र को अपने पाले में कर लिया था।
पहलगाम के बारे में तो उन्होंने विदेश में बसे पाकिस्तानियों के बीच एक सप्ताह पहले यानी 16 अप्रैल 2025 को ही संकेत दे दिया था। पहलगाम हत्याकांड उनका तरीका था भारत की प्रतिक्रिया आमंत्रित करने का। वह ट्रंप को अपने पाले में लेकर कश्मीर मुद्दे को दोबारा उभारना चाहते थे। उनका पहला हथियार कामयाब रहा लेकिन दूसरा नाकाम रहा।
अब सैन्य पहलू पर ध्यान दीजिए। चूंकि पाकिस्तान ने यह उकसावा यह जानते हुए किया था कि भारत सैन्य रूप से इसका जवाब जरूर देगा, इसलिए वह लक्ष्य का अनुमान भी लगा सकता था। उन्हें यह भी पता था कि भारत कौन से साधन इस्तेमाल करेगा। 7 मई 2025 की रात जब भारतीय वायुसेना ने हमला किया तब वे तैयार थे। वे अपनी सीमा के अंदर गहराई तक स्थित लक्ष्यों पर हमलों को रोक नहीं पाए लेकिन वह उनका उद्देश्य भी नहीं था। उनका उद्देश्य केवल अपनी प्रतिक्रिया को एक हवाई मुठभेड़ तक सीमित रखना था।
एयरबोर्न अर्ली वॉर्निंग यानी एईडब्ल्यू विमानों, जे-10सी और जेएफ-17 तथा पीएल-15 मिसाइलों के जरिये इसका अभ्यास पहले ही कर लिया गया था। इसलिए जब भारत ने हमला किया तो उन्हें कुछ शुरुआती कामयाबी मिली जिसका उन्होंने जश्न भी मनाया। भारत ने भी सर्वोच्च स्तर पर यह स्वीकार किया कि उस रात कुछ विमानों को क्षति पहुंची। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ ने इसे सामरिक गलती माना। इसके बाद वायु सेना ने जवाब देने की योजना बनाई।
पहले उसने विकिरण रोधी ड्रोन की मदद से पाकिस्तान के हवाई बचाव तंत्र को नाकाम करने का प्रयास किया और उसके बाद पाकिस्तानी वायु सेना के अत्यंत सुरक्षित हवाई ठिकानों पर हमला किया। पाकिस्तानी वायु सेना का कोई विमान फिर भले ही उसमें कोई भी मिसाइल तैनात हो, वह बचाव के लिए आगे नहीं बढ़ पाया।
जब तक पाकिस्तान युद्ध विराम की मांग को मजबूर हुआ तब तक केवल एक ही पक्ष को नुकसान होने के प्रमाण मौजूद थे। पाकिस्तानी वायु सेना के कम से कम 13 ठिकानों और तीन रडारों को क्षति पहुंचने के चित्र वाणिज्यिक सैटेलाइट ने जारी किए थे। इसके बावजूद पाकिस्तान ने इसका जश्न जीत के रूप में मनाया क्योंकि उसने कुछ विमान गिरा दिए थे।
उन्होंने हमले के दावे किए लेकिन उनके पास कोई सबूत नहीं था। सभी कथित भारतीय ठिकानों के आसपास शहर हैं। ऐसे में कुछ भी छिपाया नहीं जा सकता। कोई सैटेलाइट तस्वीर तक सामने नहीं आई। पाकिस्तान के सारे दावे बकवास हैं।
मैं हालिया इतिहास को दोहराने की कोशिश नहीं कर रहा बल्कि केवल अपने केंद्रीय बिंदु को मजबूत कर रहा हूं कि पाकिस्तानी सैन्य सोच अच्छी होती है, लेकिन केवल रणनीतिक स्तर पर। वे यह अनुमान नहीं लगा पाते कि भारत कैसे प्रतिक्रिया देगा। यह अंतर्निहित अक्षमता, भारतीय सेना के प्रति अनादर या दोनों का संयोजन हो सकता है। यह तर्क हमें पाकिस्तानी लेखक शुजा नवाज की किताब क्रॉस्ड स्वॉर्ड्स से मिलता है।
करगिल के बारे में वे लिखते हैं कि युद्ध के खेल में भारत की भूमिका निभाने वाली टीम ने ठीक उसी प्रतिक्रिया का अनुमान लगाया था जो वाजपेयी सरकार ने दी। यदि उन्हें गंभीरता से लिया गया होता, तो पाकिस्तान खुद को हार, पीछे हटने और अपमान से बचा सकता था। लेकिन उन्हें हंसी में टाल दिया गया। रणनीतिक दृष्टि से, करगिल भी शानदार था। छल, योजना, गोपनीयता, भूभाग का चयन और स्थान की अहमियत-सब कुछ बेहतरीन था। लेकिन किसी ने अगर-मगर की संभावना पर विचार नहीं किया। अगर भारत पलटकर लड़ता तो? इसके लिए रणनीतिक सोच चाहिए, जो पाकिस्तान में नहीं है।
करगिल इसलिए सामरिक हार साबित हुआ क्योंकि उसके बाद नियंत्रण रेखा को लेकर वैश्विक सहमति सी बन गई। इस्लामाबाद में कुछ देर रुकने के अवसर पर भी बिल क्लिंटन ने पाकिस्तानियों से कैमरे पर कहा कि उपमहाद्वीप पर सीमाओं में अब खून खराबे से नए सिरे से बदलाव नहीं संभव है।
पुलवामा के बाद की बात करें तो पाकिस्तान को पता था कि ऐसा हमले करने के बाद भारतीय वायु सेना जवाब देगी। इसीलिए ऑपरेशन स्विफ्ट रिटॉर्ट की तैयारी की गई जिसमें 26 विमानों की मदद से भारतीय वायु सेना को घेरने का अभ्यास किया गया। वे अभी तक एक मिग-21 को गिराने का जश्न मनाते हैं। वह रणनीतिक कामयाबी रही लेकिन सामरिक स्तर पर भारत ने जो भय पैदा किया वह पहलगाम तक यानी सात साल तक कायम रहा।
पहले भी ऐसा ही होता रहा है। ऑपरेशन जिब्राल्टर, ऑपरेशन ग्रैंडस्लैम आदि के जरिये भी कश्मीर के कई हिस्सों को हथियाने का प्रयास किया गया। रणनीतिक दृष्टि से यह अच्छा था लेकिन यह सोचना भी बेवकूफी है कि भारत चुपचाप कश्मीर गंवा देगा और जंग को पंजाब के मैदानी इलाकों तक नहीं ले जाएगा। उसी लड़ाई में खेमकरन में टैंकों के इस्तेमाल को उपमहाद्वीप में सबसे साहसिक टैंक कार्रवाई माना जाता है। उस समय भी किसी ने भारतीय प्रतिक्रिया का अनुमान नहीं लगाया था। उस जंग की सबसे अहम बात पाकिस्तान की हार और उसकी सर्वश्रेष्ठ बख्तरबंद टुकड़ी का खात्मा है।
पाकिस्तान उस युद्ध में विजय का दावा करता है, लेकिन विडंबना यह है कि 6 सितंबर को ‘पाकिस्तान रक्षा दिवस’ भी मनाता है। उनके संशोधनवादी इतिहासकार उस युद्ध के गर्व की कहानी लिखने में खुश हैं, जिसमें उन्होंने स्पष्ट उद्देश्य के साथ हमला किया था। यह कश्मीर को सैन्य रूप से लेने का उनका आखिरी मौका था जिसमें वे विफल रहे।
ऑपरेशन सिंदूर की वास्तविकता चाहे जो भी हो, पाकिस्तानियों ने उससे गलत सबक लिया है। इसे उनके बढ़ते कूटनीतिक कद के भ्रम ने और जटिल बना दिया है। भारत को इसे ध्यान में रखना होगा और यह अनुमान लगाना होगा कि नया उकसावा छह महीने पहले के अनुमान से भी पहले आ सकता है।
पाकिस्तान ने सामूहिक रूप से ऑपरेशन सिंदूर के बाद के अपने ही प्रचार को स्वीकार कर लिया है और अब मानता है कि दुनिया या तो उस पर निर्भर है या विचलित है। इतिहास बताता है कि यही वे परिस्थितियां हैं जिनमें पाकिस्तानी प्रतिष्ठान अपनी सबसे बुरी, अंततः आत्मघाती राजनीतिक और सामरिक गलतियां करता है, चाहे वे रणनीतिक रूप से कितने भी अच्छे क्यों न हों।