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खेती में बड़ा बदलाव: फसलों से आगे निकला पशुपालन और बागवानी, दूध बना देश की सबसे बड़ी ‘कैश क्रॉप’

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भारतीय कृषि अब पारंपरिक फसलों से हटकर पशुपालन, मत्स्य पालन और बागवानी जैसे उच्च लाभकारी क्षेत्रों की ओर तेजी से बढ़ रही है, जो ग्रामीण आय का मुख्य आधार बन रहे हैं

Last Updated- March 24, 2026 | 11:41 PM IST
Goat
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

भारतीय कृषि हरित क्रांति के बाद से निरंतर परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। वह धीरे-धीरे, लेकिन लगातार बागवानी, पशुपालन, मुर्गी पालन, मधुमक्खी पालन, मत्स्य पालन और कृषि-वानिकी जैसे उच्च मूल्य वाले और संभावित रूप से अधिक लाभकारी संबद्ध क्षेत्रों की ओर बढ़ रही है। फसल खेती की तुलना में इन क्षेत्रों की उच्च और तीव्र वृद्धि से यह स्पष्ट रूप से झलकता है।

इस वर्ष जारी आर्थिक समीक्षा के अनुसार, 2024-25 में समाप्त हुए पिछले दशक में फसल क्षेत्र की औसत वार्षिक वृद्धि दर मात्र लगभग 3.5 फीसदी रही, जबकि पशुधन क्षेत्र में यह 7.1 फीसदी और मत्स्य पालन में 8.8 फीसदी तक थी। ऐतिहासिक रूप से भी 1960 के दशक से तकनीकी प्रगति के बावजूद फसल उत्पादन की औसत वार्षिक वृद्धि दर केवल 2.0 से 3.5 फीसदी के बीच रही है। दूसरी ओर, कृषि क्षेत्र के उच्च मूल्य वाले खंडों के विस्तार की गति कहीं अधिक प्रभावशाली रही है जो इस दर से दोगुनी से भी ज्यादा है।

फसलों के भीतर भी अनाज और अन्य खाद्य एवं गैर-खाद्य फसलों की तुलना में बागवानी कहीं बेहतर प्रदर्शन कर रही है। बागवानी में फल, सब्जियों, फूल और जड़ी-बूटियों जैसे उच्च मूल्य वाले उत्पादों की पैदावार होती है। वर्ष 2024-25 में बागवानी उत्पादों का उत्पादन, खाद्यान्न उत्पादन से काफी अधिक रहा। जहां खाद्यान्न उत्पादन का आधिकारिक अनुमान लगभग 33 करोड़ टन है, वहीं बागवानी उत्पादन 36 करोड़ टन से अधिक रहा। इसमें 11.45 करोड़ टन फल और 21.96 करोड़ टन सब्जियां शामिल थीं। इससे भारत फलों और सब्जियों का विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक बन गया है, जो वैश्विक उत्पादन का लगभग 13 फीसदी है। केले, पपीते, आम, अदरक और भिंडी जैसे कई प्रमुख बागवानी उत्पादों के मामले में भारत अग्रणी उत्पादक है। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि कृषि में सकल मूल्य वर्द्धन (जीवीए) में बागवानी उत्पादों का योगदान अब लगभग 33 फीसदी है।

पशुपालन और मत्स्य पालन का रिकॉर्ड तो और भी उल्लेखनीय है। उदाहरण के लिए, पशुधन क्षेत्र का सकल जीवीए 2014-15 और 2023-24 के बीच 195 फीसदी तक बढ़ गया है, जो मौजूदा कीमतों पर 12.77 फीसदी की चक्रवृद्धि वार्षिक दर दर्शाता है। इसी तरह, मत्स्य पालन क्षेत्र का सकल जीवीए भी इसी अवधि में 140 फीसदी तक बढ़ गया है। आर्थिक समीक्षा में इसे ‘कृषि उत्पादन के धीरे-धीरे उच्च मूल्य वाली फसलों की ओर विविधीकरण’ का संकेत माना गया है। इसमें स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया है कि कृषि से जुड़े क्षेत्र तेजी से महत्त्वपूर्ण विकास इंजन और किसानों की आय बढ़ाने में प्रमुख योगदानकर्ता के रूप में उभर रहे हैं।

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि पशुधन और मत्स्य पालन क्षेत्रों ने फसल क्षेत्र से बेहतर प्रदर्शन किया है, और वह भी सरकार द्वारा कुछ प्रमुख खाद्य फसलों को दी गई वित्तीय और विपणन सहायता के बिना। चावल और गेहूं जैसे मुख्य अनाज, सरकारी एजेंसियों द्वारा लाभकारी कीमतों पर खुली खरीद के कारण लगभग नकदी फसलों में परिवर्तित हो गए हैं, जिनकी कीमतें हर साल नियमित रूप से बढ़ाई जाती हैं।

फिर भी, दूध ने मात्रा और मूल्य दोनों के मामले में चावल और गेहूं को पीछे छोड़ते हुए सबसे बड़ी खाद्य वस्तु का दर्जा हासिल कर लिया है। इसका उत्पादन, 2024-25 में 24.8 करोड़ टन होने का अनुमान है, यह चावल के उत्पादन से कहीं अधिक है जिसका ​शिखर उत्पादन 15 करोड़ टन के आसपास था, और गेहूं के उत्पादन से भी अधिक है जिसने उस साल 11.8 करोड़ टन का रिकॉर्ड बनाया था। 

इसके अलावा, पशुपालन अब फसल खेती को पीछे छोड़ते हुए एक तरह से अधिकांश कृषि परिवारों, विशेषकर लघु एवं सीमांत किसानों (जो भारतीय कृषि आबादी का 85 फीसदी से अधिक हैं) की आजीविका का मुख्य आधार बन गया है। फसलों से होने वाली आय मौसमी होती है, जो फसल कटाई और बिक्री के बाद प्राप्त होती है और जलवायु कारकों पर बहुत अधिक निर्भर करती है, जबकि पशुपालन और मत्स्य पालन से होने वाली आय नियमित और स्थिर होती है।

इसके अलावा, सूखे या अन्य प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण फसलें खराब होने पर भी पशुधन ग्रामीण परिवारों के लिए भोजन और आय का एक विश्वसनीय स्रोत बना रहता है। इसके अलावा फसल खेती और पशुपालन का एक अनूठा सहजीवी संबंध है, जिसमें एक के अपशिष्ट और उप-उत्पाद दूसरे के लिए इनपुट के रूप में कार्य करते हैं। इसलिए, यह आश्चर्य की बात नहीं है कि भारत में अधिकांश कृषि परिवारों के पास अपनी आय और परिवार के पोषण के पूरक के रूप में कुछ मवेशी या अन्य पशुधन जैसे मुर्गी, बकरी, भेड़ या सूअर होते हैं।

हालांकि, पशुधन और मत्स्य पालन क्षेत्र भी कुछ गंभीर चुनौतियों से जूझ रहे हैं। पशुधन क्षेत्र के लिए चारे और पशु आहार की कमी और उच्च लागत सबसे बड़ी बाधा है, वहीं मत्स्य पालन क्षेत्र के लिए पैदावार के बाद के प्रबंधन के वास्ते बुनियादी ढांचे का अभाव सबसे बड़ी समस्या है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुमान के अनुसार, हरे चारे की कमी लगभग 30 फीसदी और सूखे चारे की कमी 40 फीसदी है। दूध उत्पादन की लागत का लगभग 70 फीसदी हिस्सा पशु आहार और चारे पर खर्च होता है। मत्स्य पालन में, मछली पकड़ने के बाद के प्रबंधन, संरक्षण और परिवहन के लिए अनुपयुक्त और अपर्याप्त सुविधाओं के कारण उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा खराब हो जाता है। इन लाभदायक क्षेत्रों को अपनी पूरी क्षमता से फलने-फूलने में सक्षम बनाने के लिए इन मुद्दों का समग्र और तत्काल समाधान आवश्यक है।

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First Published - March 24, 2026 | 11:37 PM IST

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