एक सवाल मेरे मन में महीनों से पक रहा है: भारत को ब्रांड के रूप में सबसे अधिक क्षति पहुंचाने वाली बात कौन सी है। आर्थिक सुधारों की शुरुआत के तीन दशक बाद और भारत के विकसित देशों का चहेता बनने के बाद हालात बदल क्यों गए?
निवेशक अपना पैसा निकाल कर भारत से बाहर जा रहे हैं जबकि विदेशी पर्यटकों का आगमन भी 2019 के स्तर से काफी कम है। मैं इसके पक्ष में एक उचित तर्क की तलाश में था। यह तब तक नहीं मिला जब तक कि नई दिल्ली के मालवीय नगर में एक अनधिकृत बेड ऐंड ब्रेकफास्ट (बीऐंडबी) होटल में आग नहीं लगी जिसमें इस आलेख को लिखे जाने तक 21 लोगों की मौत हो चुकी है। भारत में कई व्यक्तिगत कारक ब्रांड को नुकसान पहुंचाने वाले हैं। इनमें सबसे गंभीर तीन हैं कचरा, वायु की गुणवत्ता और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की सुरक्षा। फिलहाल ये सब मिलकर एक बड़े संकट का रूप ले चुके हैं। प्राकृतिक तत्वों से बचने की जद्दोजहद को इसमें जोड़ दीजिए। सच कहें तो इसे शहरी कुप्रशासन का घोटाला कहना चाहिए।
आप दूरदराज के गांवों या जर्जर छोटे कस्बों से भारत के सबसे लाड़-प्यार वाले शहर में आते हैं जहां राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से लेकर भारत के मुख्य न्यायाधीश और निश्चित रूप से सबसे प्रमुख पत्रकार और आंदोलनकारी रहते हैं जिन्हें नागरिक समाज का विवेकपूर्ण संरक्षक माना जाता है। फिर भी जब आप सोने जाते हैं तो यह निश्चित नहीं होता कि रातोरात आग या इमारत गिरने से आपकी जान न चली जाए।
सिर्फ एक सप्ताह पहले यानी 30 मई को दिल्ली में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छह सबसे प्रतिभाशाली युवा भारतीयों की मौत हो गई। वे साकेत मेट्रो स्टेशन के पास एक अन्य अनधिकृत बहुमंजिला इमारत के पास रह रहे थे जो अब आग से प्रभावित बीऐंडबी से कुछ ही किलोमीटर दूर है। इसमें जोड़ दीजिए लगातार हो रहे पेपर लीक और परीक्षाओं के रद्द होने की घटनाएं और फिर यह पूछने की जरूरत नहीं रह जाती कि भारत के युवा इतने आक्रोशित क्यों हैं।
वास्तव में हमारे शहरों की स्थिति ही भारत की सबसे बड़ी ब्रांड विध्वंसक है। खराब हवा, पानी, ट्रैफिक, पुलिसिंग, महिलाओं का उत्पीड़न आदि यहां सब मौजूद है और दुर्भाग्य से हम लोग इसे सामान्य मान चुके हैं। बस जब वैश्विक रैंकिंग लगातार हमारे शहरों को सबसे कम रहने योग्य सूचीबद्ध करती है तो हमारी पतली राष्ट्रवादी चमड़ी पर चकत्ते उभर आते हैं। व्यक्तिगत सुरक्षा, हालांकि, इन सब से ऊपर है। खासकर उन लोगों के लिए जिनका घर भारतीय शहरों के अलावा कहीं नहीं है।
आइए राजधानी के अग्नि सुरक्षा रिकॉर्ड पर नजर डालें। वर्ष 2019 में करोल बाग के एक छह-मंजिला होटल में आग लगी और 17 लोगों की मौत हुई। उसी वर्ष अनाज मंडी की आग ने 45 लोगों की जान ले ली जिनमें नौ नाबालिग भी शामिल थे। अभी हम केवल बड़ी आग की घटनाओं की गिनती कर रहे हैं। 2022 में मुंडका में एक चारमंजिला वाणिज्यिक इमारत में आग लगी और 27 लोग दम घुटने से मारे गए। दो साल बाद पूर्वी दिल्ली के विवेक विहार में एक नवजात शिशु देखभाल इकाई में आग लग गई जिसमें आठ नवजात शिशुओं की मौत हो गई।
ये तो सिर्फ प्रमुख घटनाओं की सूची है जो एक-दो दिन के लिए सुर्खियां बनीं। यदि आप दिल्ली अग्निशमन सेवा के आंकड़े देखें तो चौंक जाएंगे। या शायद नहीं क्योंकि हम इस खतरनाक अराजकता में जीने के अभ्यस्त हो चुके हैं। वर्ष 2019-20 में दिल्ली में आग से 308 लोगों की मौत हुई, अगले वर्ष कोविड लॉकडाउन के बावजूद 346 मौतें हुईं। फिर 2021-22 में यह बढ़कर 591 हो गई। 2022-23 में लगभग दोगुनी होकर 1,029 और 2023-24 में बढ़कर 1,303 तक पहुंच गई। देश की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी है।
दिल्ली में अरबों डॉलर का निवेश हुआ है। कई क्षेत्रों का विकास हुआ है और कनेक्टिविटी सुधरी है। लेकिन गहराई से देखने पर पता चलता है कि अधिकांश आपदाएं उन इमारतों और क्षेत्रों में हुई हैं जिन्हें अलग-अलग तरह से अनधिकृत, अवैध या अनियमित कहा जा सकता है।
यहां क्षेत्र महत्त्वपूर्ण है क्योंकि दिल्ली के मूल गांव नक्शे पर लाल धागे से घिरे हुए हैं। इसीलिए इन्हें लाल डोरा कहा जाता है और वहां अधिकांश शहरी कानून या नियम लागू नहीं होते। भला होंगे भी कैसे क्योंकि ये तो गांव हैं?
मालवीय नगर की आग और साकेत की इमारत गिरने जैसी सभी प्रमुख घटनाएं इन्हीं इलाकों में हुई हैं। मालवीय नगर का बीऐंडबी हौज रानी में था जबकि साकेत की इमारत महरौली के सईद उल अजैब में थी। दोनों शहरी गांव हैं। यहां होटल या बीऐंडबी चलाने के लिए कुछ लाइसेंस लेने पड़ सकते हैं। लेकिन शहरी गांव या जिसे आमतौर पर लाल डोरा क्षेत्र कहते हैं, वहां आप जैसा चाहें वैसा निर्माण कर सकते हैं क्योंकि आखिर वह हैं तो गांव ही।
यदि आप मालवीय नगर और साकेत सहित राजधानी की नियमित कॉलोनियों में रहते हैं तो वहां निर्माण की ऊंचाई और मात्रा पर कई तरह की सीमाएं होती हैं। लेकिन लाल डोरा इलाके में आप अपने स्तर पर गगनचुंबी इमारतें बना सकते हैं। अक्सर इन्हें बिना कॉलम के एकल ईंट संरचना के रूप में बनाया जाता है। अगर खुदा न खास्ता रिक्टर स्केल पर 6 की तीव्रता का भूकंप आ गया तो ये तुरंत मलबे में बदल जाएंगी।
हमारे शहरी शासन का सबसे बड़ा अभिशाप यह नहीं है कि अधिक मतदाता इन झुग्गीनुमा गांवों या अनधिकृत कॉलोनियों में रहते हैं बल्कि यह है कि राजनीतिक वर्ग उनका जीवन स्तर सुधारने के बजाय उन्हें खुश करने में लगा रहता है। राजधानी में हर चुनाव में सभी राजनीतिक दलों की एक प्राथमिकता होती है अवैध कॉलोनियों को नियमित करना। कोई भी राजनीतिक दल नवीनीकरण का वादा करने में फायदा नहीं देखता है। यहां तक कि अब तक स्थापित झुग्गी पुनर्वास कार्यक्रम की तर्ज पर भी नहीं।
लोगों को उनके अवैध निवास से अस्थायी आवास में स्थानांतरित करना, वहां पुनर्विकास करना और उन्हें वहीं आधुनिक, सुरक्षित आवास स्वामित्व अधिकारों के साथ देना। यह बहुत बड़ा काम है और जो एक चुनावी चक्र में पूरा नहीं हो सकता। ऐसे में इस तरह के कामों में नेताओं की भी रुचि नहीं होती है।
इस प्रक्रिया में हमारे शहर गेट वाली कॉलोनी तथा अन्य लोगों में बंट गए हैं। अन्य लोग अधिकतर अवैध रूप से रहते हैं। उनके पास मतदान की शक्ति है लेकिन उन्हें मुफ्त उपहारों के जरिये या उनकी अवैध बसाहट को नियमित करने का वादा करके खरीदा जा सकता है। इस विशाल शहरी बहुमत को न्यूनतम अपेक्षाओं पर जीने के लिए मूर्ख बनाया गया है। मुंबई एक दिलचस्प उदाहरण है।
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सरकार के तहत वहां बुनियादी ढांचे और कनेक्टिविटी में भारी सुधार हुआ है। इनमें शानदार नया कोस्टल रोड भी शामिल है। लेकिन इसके चालू होने के बाद मुंबई की कई यात्राओं में मैंने उस पर एक भी सवारी बस नहीं देखी। और हमें लगा कि अलग बस लेन और कामकाजी वर्ग के यात्रियों की सुविधा इसके वादों में शामिल थी। नई मेट्रो बेहतरीन है लेकिन गरीब कामकाजी वर्ग के लिए महंगी है। सबसे सस्ता सफर अब भी लोकल ट्रेन या बस ही है।
मैंने कई बार लिखा है कि हमारे राजनेता शहरों के साथ इतना बुरा व्यवहार इसलिए करते हैं क्योंकि उनके मतदाता गांवों में रहते हैं। वे गांवों के वोट से सत्ता हासिल करते हैं और फिर शहरों में आकर धन लूटते हैं। बाबासाहेब आंबेडकर ने ग्राम स्वराज पर आधारित गांधीवादी संविधान के विचार का विरोध किया था। उन्होंने 4 नवंबर 1948 को संविधान सभा में पूछा था, ‘गांव क्या है, स्थानीयता का कीचड़ भरा हौदा है, अज्ञानता, संकीर्णता और सांप्रदायिकता का अड्डा है।’ वे उस तर्क में आंशिक रूप से ही जीत पाए।
हमारी राजनीति योजनाबद्ध शहरीकरण से कतराती रही है, जबकि विश्व बैंक के अनुसार अब भारत की 35 फीसदी आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है और आर्थिक समीक्षा का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक यह 40 फीसदी से अधिक हो जाएगा। किसी भी महत्त्वाकांक्षी विकासशील देश की तरह भारत का उद्देश्य है अधिक लोगों को खेती से उद्योग और सेवाओं में लाया जाए, यानी गांवों से शहरों में। इसके लिए हमारे शहरों की नए सिरे से कल्पना करनी होगी और नए शहर बनाने होंगे, जहां नए आने वालों के लिए रहने और आने-जाने की जगह हो। समय के साथ वे मूल्य श्रृंखला में ऊपर बढ़ेंगे। यह चुनौतीपूर्ण है लेकिन अब तक चला आ रहा ढर्रा अब कारगर नहीं होगा। यह ब्रांड इंडिया को नुकसान पहुंचाने वाला बड़ा कारण बना रहेगा।