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ईरान को लेकर गलत साबित हुए तेल बाजार, होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से वैश्विक अर्थव्यवस्था संकट में

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ईरान संकट के बावजूद तेल बाजार अप्रत्याशित रूप से शांत हैं। विश्लेषकों का मानना है कि होर्मुज स्ट्रेट बंदी से तेल की कीमतें बढ़कर मंदी ला सकती हैं

Last Updated- May 15, 2026 | 9:37 PM IST
Strait of Hormuz
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

ईरान संकट में एक बड़ा रहस्य है और वह है तेल बाजारों का व्यवहार। कहा जा रहा है कि यह इतिहास में तेल बाजारों में मची सबसे बड़ी उथलपुथल है। इसके बावजूद बाजार तेल की कीमतों को उस स्तर से काफी नीचे आंक रहे हैं जिसे विश्लेषक बुनियादी कारकों के आधार पर उचित मानते हैं। या तो विश्लेषक बेवकूफ हैं या फिर बाजार बहुत अदूरदर्शी साबित हो रहे हैं। आने वाले दिनों में इसका पता चल जाएगा।

फरवरी के अंत में ईरान में लड़ाई छिड़ने के बाद तेल कीमतें शुरुआत में 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे रहीं। विशेषज्ञों ने माना कि यह लड़ाई चार-छह सप्ताह से अधिक नहीं चलेगी और ऐसे में विश्व अर्थव्यवस्था पर बहुत अधिक असर नहीं होगा।

यह धारणा गलत थी कि संघर्ष के चार सप्ताह या कम समय में समाप्त होने से तेल आपूर्ति में व्यवधान भी समाप्त हो जाएगा। जैसा कि द इकॉनमिस्ट ने 30 अप्रैल के अपने अंक में इंगित किया है, तेल कुओं में उत्पादन को तुरंत शुरू नहीं किया जा सकता है। उत्पादन को सामान्य स्तर पर लौटने में कई सप्ताह का वक्त लगता है। वे टैंकर जो अन्य मार्गों पर चले गए हैं उन्हें फिर से फारस की खाड़ी में लौटना पड़ता है। इसमें काफी समय लगता है। वे रिफाइनरी जो कच्चे तेल की आपूर्ति के अभाव में बंद हो गई थीं उन्हें फिर से शुरू करना पड़ता है। ऐसे में यह तय था कि तेल आपूर्ति में व्यवधान लंबा खिंचने वाला है।

तेल बाजार और उन पर भरोसा करने वाले विशेषज्ञ गलत साबित हुए। लड़ाई चार-छह हफ्ते में खत्म नहीं हुई। वह लड़ाई 10 सप्ताह बाद भी चल रही है। चिंता की बात यह है कि क्या तेल बाजार ईरान के हालात को सही ढंग से दर्शा पा रहे हैं या नहीं। विश्लेषक ऐसा नहीं सोचते। तेल बाजारों की सबसे बड़ी विफलता यह रही कि उन्होंने ईरान की होर्मुज स्ट्रेट को बंद करने की क्षमता और इच्छा का अनुमान नहीं लगाया।

ऐसा लगता है कि उन्होंने यह मान लिया था कि क्योंकि यह पहले कभी नहीं हुआ, इसलिए अब भी नहीं होगा। जबकि ईरान के नेताओं ने बहुत स्पष्ट चेतावनियां दी थीं कि अमेरिका के हमले पर देश कैसे जवाब देगा। इन चेतावनियों को न तो अमेरिकी प्रशासन ने गंभीरता से लिया और न ही तेल बाजारों ने।  

द इकॉनमिस्ट का अनुमान है कि होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से पिछले दो महीनों में वैश्विक खपत के लगभग 10 फीसदी तक की आपूर्ति बाहर हो गई है। इतनी बड़ी कमी पर तेल की कीमतें धीरे-धीरे प्रतिक्रिया कर रही हैं। अतीत में, आपूर्ति में इससे छोटे व्यवधानों ने तेल की कीमतों में कहीं अधिक वृद्धि की थी।

संघर्ष शुरू होने के लगभग तीन सप्ताह बाद तेल की कीमतें (ब्रेंट क्रूड) 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचीं। जुलाई 2026 के लिए तीन महीने की वायदा अनुबंध की कीमत 112 डॉलर प्रति बैरल है। इसके बाद बाजार अगस्त, सितंबर और अक्टूबर में तेल की कीमत क्रमशः 104, 99 और 95 डॉलर तक गिरने की संभावना देख रहा है।

तेल बाजार ऐसा क्या जानते हैं जो विश्लेषक नहीं जानते? मौजूदा तेल कीमतों को तेल बाजार में मांग-आपूर्ति संतुलन के साथ मिलाना कठिन है। यह ईरान और अमेरिका-इजरायल गठबंधन के बीच संघर्ष की स्थिति से कम मेल खाता है। विश्लेषकों का मानना है कि राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के उत्साहजनक संदेश ‘हम समाधान के करीब हैं’, ‘यह जल्द ही समाप्त होगा’ और इसी तरह की अन्य बातों का तेल बाजारों पर अपेक्षा से कहीं अधिक प्रभाव पड़ा है। यदि विश्लेषक सही हैं, तो विश्व अर्थव्यवस्था जल्द ही गंभीर संकट में पड़ सकती है।

अब तक देखे गए तेल मूल्य स्तरों पर भी, विश्व अर्थव्यवस्था पर प्रभाव महत्त्वपूर्ण होगा। आईएमएफ का विश्व आर्थिक परिदृश्य (अप्रैल 2026) इस साल के लिए औसत पेट्रोलियम हाजिर मूल्य 82 डॉलर प्रति बैरल मानता है। इसे वह अपना संदर्भ पूर्वानुमान कहता है। इस परिदृश्य में, वैश्विक वृद्धि 2024 के 3.4 फीसदी से घटकर 2026 में 3.1 फीसदी हो जाती है। यह आईएमएफ के जनवरी पूर्वानुमान से 0.2 प्रतिशत अंक कम है, जो ईरान संघर्ष शुरू होने से पहले किया गया था। यह गिरावट ईरान संघर्ष के प्रभाव की पूरी गंभीरता को नहीं दर्शाती। लेकिन आईएमएफ का अनुमान है कि ईरान संघर्ष न होता तो वैश्विक वृद्धि 3.4 फीसदी होती। यानी पिछले वर्ष के समान।

आज की स्थिति में 2026 के लिए औसत तेल मूल्य 82 डॉलर प्रति बैरल मानना कितना यथार्थवादी है? वर्ष के पहले चार महीनों में ही ब्रेंट क्रूड का औसत 87 डॉलर रहा है। अधिकांश विश्लेषकों का मानना है कि यदि होर्मुज स्ट्रेट अगले चार सप्ताह तक बंद रहता है, तो तेल की कीमतें 125 डॉलर से कहीं ऊपर चली जाएंगी। शायद 150 डॉलर प्रति बैरल तक भी पहुंच जाएं।

यदि ऐसा होता है, तो विश्व अर्थव्यवस्था की आशंकाएं वास्तव में गंभीर होंगी। यदि तेल की औसत कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल होती है, तो आईएमएफ का अनुमान है कि वैश्विक वृद्धि तेजी से गिरकर 2.5 फीसदी हो जाएगी। 110 डॉलर प्रति बैरल की कीमत पर वृद्धि गिरकर 2 फीसदी हो जाएगी, जो वैश्विक मंदी के करीब है।

संघर्ष के बावजूद, संदर्भ पूर्वानुमान के मुताबिक 2026 में अमेरिका की वृद्धि 2.3 फीसदी होगी, जो 2025 के 2.1 फीसदी से अधिक है। दुनिया ठहरी हुई है लेकिन अमेरिका अपेक्षाकृत अप्रभावित बना हुआ है। यही शायद इस संघर्ष के प्रति उसकी रुचि को समझाता है। लेकिन ऐसा नहीं है कि अमेरिका ईरान युद्ध से प्रभावित नहीं हुआ। युद्ध शुरू होने से पहले, 2026 में अमेरिका की वृद्धि 2.5 फीसदी से अधिक अनुमानित थी।

ईरान युद्ध के परिणामस्वरूप संशोधित वृद्धि पूर्वानुमानों में एक महत्त्वपूर्ण तथ्य छिप गया है। युद्ध ने विश्व अर्थव्यवस्था को उस तरह प्रभावित किया है, जिस तरह ट्रंप के शुल्क ने भी नहीं किया था। अर्थशास्त्रियों ने अमेरिकी शुल्क वृद्धि की नासमझी और उसके गंभीर परिणामों के बारे में चेतावनी दी थी। लेकिन वे आखिर में बेवकूफ साबित हुए।

तीन बिंदु उल्लेखनीय हैं। पहला, 2025 में ट्रंप के शुल्कों से वैश्विक आर्थिक वृद्धि अप्रभावित रही और 2026 में भी अप्रभावित रहने की स्थिति में थी। दूसरा, शुल्क वृद्धि के बाद 2026 में अमेरिका की वृद्धि 2025 से अधिक अनुमानित है।

2025 में विश्व व्यापार वृद्धि 5.1 फीसदी तक रही, जो 2024 के 3.7  फीसदी से अधिक थी। प्रौद्योगिकी-संबंधी निर्यात में विस्तार ने अन्य श्रेणियों में धीमी वृद्धि की भरपाई की। चीन ने अपने निर्यात को अमेरिका से एशिया और यूरोप की ओर स्थानांतरित किया और 1.2 लाख करोड़ डॉलर के माल व्यापार अधिशेष का नया उच्च स्तर दर्ज किया।

राष्ट्रपति ट्रंप की शुल्क संबंधी सोच सही साबित हुईं। उन्होंने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को लाभ पहुंचाया वह भी बिना विश्व अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाए। अफसोस की बात है कि ईरान पर उनकी समझ धोखा दे गई।

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First Published - May 15, 2026 | 9:31 PM IST

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