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FDI का स्रोत नहीं बल्कि प्राथमिकताएं तय करना जरूरी, इस पर चीन से सीखने की जरूरत

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चीन के साथ बढ़ते व्यापार घाटे के बीच भारत ने FDI नियमों में ढील दी है। हालांकि, असली सफलता निवेश के स्रोत में नहीं, बल्कि तकनीक को आत्मसात करने और उत्पादन क्षमता बढ़ाने में है

Last Updated- May 11, 2026 | 10:12 PM IST
FDI
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

भारत ने 10 मार्च को अपनी जमीनी सीमा से सटे देशों से आने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) से जुड़े नियमों में ढील दे दी। ‘प्रेस नोट 3’ के नाम से ये दिशानिर्देश अप्रैल 2020 में लागू हुए थे जिनका उद्देश्य कोविड महामारी के दौरान मौके का फायदा उठाने वाले यानी अवसरवादी अधिग्रहणों को रोकना था। हालांकि, इन नियमों के निशाने पर मुख्य रूप से चीन था। अब प्रेस नोट 3 में ढील के तहत10फीसदी तक की गैर-नियंत्रण हिस्सेदारी रखने वाले निवेशकों को स्वचालित मार्ग (ऑटोमेटिक रूट)  यानी सरकार से पूर्व अनुमति के बिना निवेश करने की अनुमति दी गई है।

अधिकारियों का कहना है कि इस बदलाव से व्यापार करने में आसानी होगी, निवेश में इजाफा होगा और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में एकीकरण मजबूत होगा। हालांकि, यह एक कोरी कल्पना ही कही जा सकती है। चीन एफडीेआई के लिए भारत को एक मजबूत एवं आकर्षक निवेश के स्थान के रूप में नहीं देखता है। हालांकि, चीन भारत को अपने उत्पादों के लिए एक विशाल निर्यात बाजार जरूर समझता है।

भारत में चीनी राजदूत शू फेइहोंग ने 8 अप्रैल को सोशल मीडिया एक्स पर लिखा,‘यह जानकर खुशी हुई कि चीन वित्त वर्ष 2026 में लगातार 11वें महीने भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार बना रहा।’ यह खबर चीन के लिए तो अच्छी थी मगर भारत के लिए नहीं। दोनों देशों के बीच 151.1 अरब डॉलर के व्यापार में 131.63 अरब डॉलर का निर्यात चीन से भारत को हुआ और भारत से आयात मात्र 19.47 अरब डॉलर का था। यह एकतरफा व्यापार है। चीन भारत का ‘सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार’ बनने के बावजूद भारतीय बाजारों को अपने माल से पाट रहा है।

व्यापार और निवेश से जुड़ी ये दोनों आंकड़े हमें बताते हैं कि चीन-भारत के आर्थिक संबंध कितने असंतुलित हैं। भारत अपने एफडीआई नियमों में मामूली बदलाव करता है तो चीन अपना निर्यात दोगुना कर देता है। भारत को हर साल चीन से इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं एवं विद्युत उपकरण (40-50 अरब डॉलर), मशीनरी (27 अरब डॉलर), कार्बनिक रसायन (12-13 अरब डॉलर), प्लास्टिक, इस्पात, चिकित्सा उपकरण आदि आयात करने पड़ते हैं।

ये ऐसे महत्त्वपूर्ण उत्पाद हैं जिनके बिना भारतीय अर्थव्यवस्था चल ही नहीं सकती। कुछ उत्पादों के लिए वैकल्पिक स्रोत मौजूद हैं मगर उनकी कीमत बहुत अधिक है। इसके अलावा, चीन अपने आपूर्ति स्रोतों में विविधता ला रहा है इसलिए भले ही सीधे तौर पर न हो, मगर चीन में बने सामान दक्षिण-पूर्व एशियाई और अन्य विनिर्माण केंद्रों के माध्यम से भारत तक पहुंच जाते हैं।

चीन 3.0 से 3.5 लाख करोड़ डॉलर के संचयी विदेशी निवेश भंडार और 160-190 अरब डॉलर के सालाना निवेश के साथ हर क्षेत्र में एफडीआई का तगड़ा खिलाड़ी है। चीन से होने वाले कुल निवेश का लगभग 70 फीसदी (लगभग 2.0-2.2 लाख करोड़ डॉलर) हिस्सा एशिया ही खींच लेता है (मुख्य रूप से दक्षिण-पूर्व एशिया में जहां चीन की कंपनियों ने संपूर्ण विनिर्माण प्रणालियों को स्थापित किया है, खासकर इलेक्ट्रॉनिक, वस्त्र, इलेक्ट्रिक वाहन और मध्यवर्ती वस्तुओं के क्षेत्रों में)।

लैटिन अमेरिका दूसरा प्रमुख क्षेत्र है जहां चीन भारी पैमाने पर निवेश (अनुमानित संचयी चीनी निवेश 300-500 अरब डॉलर) करता है। यूरोप का हिस्सा भले ही छोटा है मगर वहां भी चीन से 100 से 200 अरब डॉलर निवेश किया गया है। अफ्रीका में चीन से 50 से 100 अरब डॉलर निवेश होता है मगर इसकी रणनीतिक स्थिति महत्त्वपूर्ण है। पश्चिम एशिया ने ऊर्जा, पेट्रो-रसायन और तेजी से बढ़ते नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्रों में अरबों डॉलर का सालाना निवेश आकर्षित किया है।

भारत में चीन से एफडीआई वर्ष 2000 से अब तक मात्र 2.51 अरब डॉलर है जो भारत के कुल इक्विटी निवेश का मात्र 0.32 फीसदी है। अगर इसमें वेंचर कैपिटल निवेश और तीसरे देशों के माध्यम से होने वाले अप्रत्यक्ष निवेश भी शामिल कर लिया जाए तो भी कुल राशि केवल 15-20 अरब डॉलर तक ही पहुंचती है।

इसका कारण यह है कि भारत यह तय नहीं कर पा रहा है कि कि उसे चीन से प्रत्यक्ष एफडीआई चाहिए या नहीं। भारत को इस बात का डर है कि इससे उसकी संप्रभुता को खतरा हो सकता है और आत्मनिर्भरता का दावा कमजोर पड़ सकता है। चीन का बाहरी निवेश अक्सर औद्योगिक और भू-राजनीतिक उद्देश्यों से जुड़ा होता है।

महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में निर्भरता (चाहे बैटरी, दूरसंचार उपकरण या सक्रिय दवा सामग्री हो) विशेष रूप से भू-राजनीतिक तनाव के समय में असुरक्षा का कारण बन सकती है। मगर सावधानी, झिझक और अप्रासंगिक नीतिगत बदलाव कोई नीतिगत विकल्प नहीं हैं। वास्तविक विकल्प यह है कि चीन से ही सीखा जाए कि एफडीआई कैसे संभाला जाता है।

1990 के दशक से शुरू होकर 2000 के दशक तक चीन ने एफडीआई एवं प्रौद्योगिकी आकर्षित करने के लिए सक्रिय कदम उठाए, खासकर जापान, अमेरिका और यूरोप से। चीन में इस अवधि को ‘सुधार और खुलापन’ का दौर कहा जाता है। चीन विदेशी पूंजी को खतरा नहीं मानता था बल्कि इसे बदलाव लाने का एक जरिया मानता था बशर्ते राज्य रणनीतिक नियंत्रण बनाए रखे।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अक्सर संयुक्त उद्यम बनाने, उत्पादन का स्थानीयकरण करने और कई मामलों में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण करने के लिए कहा जाता था। इसे तब ‘यिन चिन लाई’ यानी चीन के अंदर संसाधन एवं तकनीक लाने से जोड़कर देखा गया। इसका पूरा लाभ उठाने के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्रों ने बुनियादी ढांचा, नीतिगत स्थिरता और निर्यात प्रोत्साहन प्रदान किए जिससे चीन वैश्विक विनिर्माण तंत्र से जुड़ा सका और आपूर्तिकर्ता प्रणालियों, कुशल श्रम बल और प्रक्रिया विशेषज्ञता का व्यापक विकास कर सका।

चीन ने इस चरण का इस्तेमाल प्रौद्योगिकी को आत्मसात करने, घरेलू स्तर पर अग्रणी कंपनियां तैयार करने और धीरे-धीरे मूल्य श्रृंखला में ऊपर चढ़ने के लिए किया और अंततः अगले चरण यानी ‘बाहर जाओ’ (झाऊ चू छू ) में एक निर्यातक और निवेशक दोनों बन गया। चीन से पहले जापान और जर्मनी ने विदेशी प्रौद्योगिकी आयात करने, उसे आत्मसात करने और विश्व चैंपियन बनने की ऐसी ही रणनीति अपनाई थी।

भारत को एक ऐसी प्रणाली बनाने की आवश्यकता है जिसमें कंपनियां, वित्त और सरकार सभी एक ही दिशा यानी उत्पादन, प्रौद्योगिकी, व्यापकता और प्रतिस्पर्द्धात्मकता की ओर बढ़ें। उसे इस बात की परवाह नहीं करनी चाहिए कि एफडीआई कहां से आ रहा है। मगर उससे भी जरूरी बात यह है कि उद्देश्य स्पष्ट हो। भारत अक्सर एक साथ कई लक्ष्यों जैसे आत्मनिर्भरता, निर्यात वृद्धि, घरेलू स्तर पर चैंपियन बनना, राजस्व अधिक से अधिक बढ़ाना और कम उपभोक्ता मूल्य हासिल करने का प्रयास करता है, मगर उनकी प्राथमिकता तय नहीं कर पाता है। औद्योगीकरण की मुहिम में सफल रहने वाले देशों ने एक स्पष्ट विकल्प चुना और वह था उत्पादन क्षमता को प्राथमिकता। अब सवाल है कि भारत ऐसा कब करेगा?

(लेखक मनीलाइफ डॉट इन के सह-संस्थापक और मनीलाइफ फाउंडेशन के न्यासी हैं)

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First Published - May 11, 2026 | 10:12 PM IST

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