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पश्चिम एशिया संघर्ष से भारत की अर्थव्यवस्था पर बढ़ता दबाव

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अब समय आ गया है कि भारत समान विचारधारा वाले देशों और ब्रिक्स प्लस साझेदारों के साथ मिलकर इस अस्थिर दुनिया में अपनी उपस्थिति दर्ज कराए। बता रहे हैं अजय छिब्बर

Last Updated- May 15, 2026 | 8:39 AM IST
West Asia conflict
Representational Image

होर्मुज स्ट्रेट से आवागमन लगातार बाधित होने के कारण अप्रैल के अपने स्तंभ में मैंने जिस मुद्रास्फीति जनित सुस्ती (स्टैगफ्लेशन) की आशंका जताई थी वह अब भारत और विश्व के लिए स्पष्ट वास्तविकता बनती जा रही है। विश्व बैंक के नवीनतम वस्तु पूर्वानुमान के मुताबिक युद्ध के चलते 2026 में तेल की कीमतें पहले की अपेक्षा 20 डॉलर प्रति बैरल अधिक रहने की संभावना है। इसका अर्थ यह है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्र कोष यानी आईएमएफ का 2026 के लिए विश्व सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि का 3.4 फीसदी का अनुमान घटकर करीब 3 फीसदी रह जाएगा। वैश्विक मुद्रास्फीति भी बुनियादी पूर्वानुमान की तुलना में लगभग 1 फीसदी अंक बढ़ जाएगी।

भारत को और अधिक मुश्किल हालात का सामना करना होगा। आईआईएम के कारोबारी पूर्वानुमान सर्वेक्षण के अनुसार जीडीपी वृद्धि 7 फीसदी से अधिक के स्तर से घटकर 6 से 6.5 फीसदी रह जाएगी और मुद्रास्फीति बढ़कर 5 फीसदी से ऊपर निकल जाएगी। यह 4 फीसदी मुद्रास्फीति के तय लक्ष्य से अधिक होगा। 2025 के अंत में भारत को ‘गोल्डीलॉक्स अर्थव्यवस्था’ (अच्छी वृद्धि, कम मुद्रास्फीति और उच्च रोजगार वाली) कहा गया था, लेकिन अब इसे रिवर्स गोल्डीलॉक्स कहा जा रहा है। पेट्रोल पंप पर कीमतों में वृद्धि को रोकना बहुत लंबे समय तक संभव नहीं है, क्योंकि इससे तेल सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों की वित्तीय स्थिति और राजकोषीय घाटे के लक्ष्यों को नुकसान पहुंचेगा। एलपीजी की कीमतें पहले ही बढ़ा दी गई हैं और डीजल तथा जेट ईंधन पर निर्यात शुल्क लगाया गया है। रुपया डॉलर के मुकाबले 95 पार चला गया है और एशिया की सबसे कमजोर मुद्राओं में शामिल हो गया है। रिजर्व बैंक ने थोड़े समय के लिए हस्तक्षेप किया लेकिन जल्द ही समझ लिया कि यह हार जाने वाली लड़ाई है क्योंकि ईरान युद्ध से उत्पन्न संकट के चलते विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय बाजारों से 21 अरब डॉलर से अधिक की राशि निकाल ली है।

हालांकि ईरान युद्ध से पहले ही रुपया कमजोर हो गया था और 2025 में यह एशिया की सबसे कमजोर मुद्रा था, क्योंकि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय बाजारों से 19 अरब डॉलर से अधिक की राशि निकाल ली थी। यह शुल्क संबंधी झटके के कारण हुआ। दरअसल, अमेरिका ने भारत पर 50 फीसदी शुल्क लगा दिए जिससे सभी चकित रह गए। लेकिन इसके साथ ही कम चर्चा में रहने वाला ‘आर्टिफिशल इंटेलिजेंस का झटका’ भी इसमें योगदान करने वाला रहा क्योंकि ऐसा माना जा रहा है कि भारत का सूचना प्रौद्योगिकी सोर्सिंग मॉडल पराजित होने वाला है। सरकार ने इस धारणा का मुकाबला एक बहुचर्चित एआई शिखर सम्मेलन के माध्यम से किया और 2030 तक एक मजबूत एआई पारिस्थितिकी तंत्र बनाने के लिए एक व्यापक एआई मिशन की घोषणा की है। इसमें स्वदेशी छोटे एआई मॉडल तैयार करना और स्टार्टअप्स तथा सार्वजनिक-निजी एआई परियोजनाओं को बढ़ावा देना शामिल है। परंतु यह सवाल बरकरार है कि एआई वरदान साबित होगा या अभिशाप क्योंकि भारत की बड़ी आईटी कंपनियों ने एआई अनुसंधान में निवेश करना उचित नहीं समझा है और उनका आउटसोर्सिंग मॉडल प्रभावित हो रहा है। वे कितनी जल्दी एआई का उपयोग करके अपने व्यापार मॉडल को नया रूप दे सकते हैं, यह देखना होगा।

फिर भी भारत 2025 से अपेक्षाकृत अच्छी स्थिति में उभरा। लेकिन अब तेल संकट और युद्ध से संबंधित आपूर्ति व्यवधानों ने पुन: धन को भारत से बाहर निकालना शुरू कर दिया है। रुपया भी कमजोर हुआ है। शुल्क का झटका कम हो गया है क्योंकि अब भारत संयुक्त राज्य अमेरिका में केवल 10 फीसदी आयात शुल्क देता है, जो अन्य देशों के समान है। लेकिन डॉनल्ड ट्रंप व्यापार समीक्षाएं करवा रहे हैं और चुनिंदा देशों पर फिर से शुल्क लगाने का इरादा रखते हैं। इस पर नजर रखनी होगी। तेल की कीमतें अंततः पलट सकती हैं, लेकिन फिलहाल भारत की मुद्रा फिर से बुरी तरह प्रभावित हुई है। भारी भंडार होने के बावजूद यह एशिया की सबसे कमजोर मुद्राओं में शामिल है। कुल मिलाकर, 2025 की शुरुआत से अब तक भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 10 फीसदी कमजोर हो चुका है। परिणामस्वरूप आईएमएफ के अनुसार डॉलर के संदर्भ में भारत को ब्रिटेन ने पीछे छोड़ दिया है और अब यह दुनिया की पांचवीं नहीं बल्कि छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, यहां तक कि बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति आय भी अब भारत से अधिक है।

तेज़ी से गिरती विनिमय दर से एक और बड़ी चिंता यानी चालू खाते के घाटे को संतुलित करने में मदद मिलेगी जो 2026 में जीडीपी के 2 फीसदी से अधिक हो सकता है। यह एक खतरनाक स्तर है। आयात को महंगा बनाने और निर्यात को प्रोत्साहित करने से कमजोर रुपया चालू खाते के घाटे को कम करने में मदद करेगा। लेकिन इसे कमजोर वैश्विक मांग दबा सकती है। अब तक के सभी अध्ययनों से पता चलता है कि निर्यात वैश्विक वृद्धि पर बहुत अधिक निर्भर करता है और वह कमजोर हो रही है। खाड़ी देशों को भारत का निर्यात, जो एक बड़ा बाजार है, युद्ध से बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इसका मतलब है कि भारत द्वारा हस्ताक्षरित मुक्त व्यापार समझौतों विशेषकर यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और अब न्यूजीलैंड के साथ हुए समझौतों को अंतिम रूप देना और लागू करना बेहद महत्त्वपूर्ण होगा।

युद्ध ने केवल तेल ही नहीं बल्कि गैस और उर्वरक को भी प्रभावित किया है। सब्सिडी वाले यूरिया (नाइट्रोजन) पर अत्यधिक निर्भरता ने मिट्टी के पोषक तत्व अनुपात को गंभीर रूप से प्रभावित किया है, जिससे नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटैशियम संतुलन की ओर बदलाव आवश्यक हो गया है। किसानों को सीधे नकद हस्तांतरण (जैसे प्रति एकड़ निश्चित भुगतान) की ओर बढ़ना, मौजूदा इनपुट आधारित सब्सिडी को बदलना और उर्वरकों के लिए बाजार आधारित मूल्य निर्धारण की अनुमति देना काफी समय से लंबित है। भारत को अपनी गैस आवश्यकताओं में विविधीकरण की ओर भी देखना चाहिए। अमेरिका एक संभावित स्रोत है, लेकिन यह भी संभव है कि अगला अमेरिकी प्रशासन निर्यात करने के लिए इतना इच्छुक न हो और योजनाओं को रद्द कर दे। बाइडन प्रशासन के दौरान ऐसा हुआ था। यदि जो बाइडन ने एलएनजी निर्यात पर प्रतिबंध नहीं लगाया होता तो आज भारत अपनी गैस आवश्यकताओं को लेकर इतनी परेशानी में न होता। ऑस्ट्रेलिया, रूस, मलेशिया और इंडोनेशिया भविष्य में खाड़ी से विविधीकरण के लिए अधिक विश्वसनीय समाधान प्रदान कर सकते हैं।

उम्मीद है कि तेल संकट नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तेज बदलाव को प्रेरित करेगा। आपूर्ति व्यवधानों ने दिखाया है कि तेल और अन्य महत्त्वपूर्ण इनपुट में अधिक भौतिक भंडार वांछनीय हैं। रूस जैसे भरोसेमंद साझेदारों के साथ दीर्घकालिक तेल अनुबंध किए जाने चाहिए भले ही अमेरिका दबाव डाले। साथ ही, अमेरिका के साथ व्यापार समझौता महत्त्वपूर्ण है। भारत को यह संकेत देना होगा कि उसे मनमाने ढंग से दबाया नहीं जा सकता और उसके कुछ प्रमुख रणनीतिक हित हैं।

अब समय आ गया है कि भारत ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और यूरोपीय संघ जैसे समान विचारधारा वाले देशों के साथ-साथ अपने ब्रिक्स प्लस साझेदारों के साथ मिलकर इस अस्थिर दुनिया में अपनी उपस्थिति दर्ज कराए। बजाय इसके कि वह एक अप्रत्याशित अमेरिकी प्रशासन को खुश करने की कोशिश करे और बार-बार ठुकराया जाए। यदि अमेरिका इतनी भारी लागत के साथ दुनिया के बाकी हिस्सों पर एक मनमाना युद्ध थोप सकता है और अपनी इच्छा से बार-बार शुल्क लगा सकता है तो उससे मित्रता का कोई लाभ नहीं नजर आता।

(लेखक जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनैशनल इकनॉमिक पॉलिसी के प्रतिष्ठित विजिटिंग स्कॉलर हैं)

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First Published - May 15, 2026 | 8:39 AM IST

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