बीते सप्ताह यही बात खबरों में रही कि नरेंद्र मोदी ने निरंतर सबसे लंबी अवधि तक प्रधानमंत्री के रूप में पद संभालने का जवाहरलाल नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ दिया। मोदी और नेहरू के बीच यह तुलना खूब होती रही है कि दरअसल किसने भारत के लिए क्या किया। अब वक्त आ गया है कि हम भविष्य की बात करें क्योंकि मोदी अभी भी पद पर हैं। उनके इस कार्यकाल में तीन वर्ष का समय बचा है और यकीनन वह 2029 का चुनाव भी लड़ेंगे और कौन जाने शायद 2034 का भी।
आखिर ट्रंप भी तमाम संवैधानिक सीमाओं के बावजूद अतीत में तीसरे कार्यकाल की बात कर ही चुके हैं, जबकि इसी महीने वह 80 वर्ष के होने वाले हैं। इसके अलावा व्लादीमिर पुतिन को पेइचिंग में तीन सितंबर 2025 को दूसरे विश्वयुद्ध की 80वीं सालगिरह पर आयोजित सैन्य परेड में माइक पर शी चिनफिंग से यह कहते सुना गया कि वर्तमान चिकित्सकीय प्रगति के साथ कोई चाहे तो 150 साल की उम्र तक शासन कर सकता है।
यह अनुमान उचित है कि मोदी इतने लंबे समय तक बने रहेंगे कि हम आगे आने वाली चुनौतियों पर विचार कर सकें। मैं पांच चुनौतियां सामने रखने वाला हूं। पहली चुनौती स्पष्ट है कि उन्हें अतीत से छुटकारा पाना होगा। नेहरू, इंदिरा या अन्य किसी से तुलना अब समाप्त होनी चाहिए। जब नेहरू का निधन हुआ तब मोदी 14 वर्ष के थे और मैं सात वर्ष का भी नहीं था। अब से मोदी को उनके अपने युग से परिभाषित किया जाना चाहिए न कि उस युग से जो भारत में बहुत पहले आया था।
सबसे लंबे समय तक लगातार निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में तुलना अब उनके पहले 12 वर्षों में किए गए कार्यों से होनी चाहिए। यदि वह एक स्थायी विरासत बनाना चाहते हैं, तो यह भारत के राजनीतिक इतिहास में सबसे बड़े ‘नेहरू-विरोधी’ के रूप में नहीं हो सकती। यह उनके अपने नाम पर एक विरासत होगी।
इसके लिए उन्हें अतीत पर निर्भर रहना बंद करना होगा। आज का चालू या पूंजी खाता संकट, कमजोर होता रुपया अब इस तरह नहीं समझाया जा सकता कि ‘क्या आप भूल गए कि 1991 या 2013 में संकट कितना बुरा था।’ क्या मोदी और भाजपा अब आगे बढ़ सकते हैं? यह अब मोदी की पहली चुनौती है।
किसी भी लंबे कार्यकाल वाले प्रधानमंत्री की तरह मोदी ने भी अपने हिस्से के संकट देखे हैं। इनमें से तीन वैश्विक थे: कोविड, यूक्रेन और पश्चिम एशिया के युद्ध। उनकी दूसरी चुनौती तीसरे से जुड़ी है। इतना शक्तिशाली नेता डॉनल्ड ट्रंप के शेष कार्यकाल से कैसे निपटेगा?
अब तक वे उनसे समभाव से निबटते रहे हैं। मोदी यूरोप, और अमेरिका के दूसरे मित्र देशों से संकेत लेते हुए शांत रहने और किसी उकसावे में न आने की नीति अपनाते रहे हैं।
लेनदेन वाला पहलू और मजबूत होगा और भारत इसका प्रबंधन कर सकता है। जैसा कि पश्चिम एशिया का युद्ध दिखाता है, भारत ने पहले ही इजरायल, अमेरिका और संयुक्त अरब अमीरात के रूप में अपना पक्ष चुन लिया है। कोई ऐसा कहेगा नहीं लेकिन तथ्य यही बताते हैं। जल्दी ही अमेरिका के साथ कारोबारी समझौता हो सकता है। कारोबारी रिश्ते और व्यापार भारत के कारोबारी प्रमुखों के सक्रिय सहयोग से जारी रहेंगे। आमतौर पर आप यह मानकर चल सकते हैं कि ट्रंप चाहे जितना उकसाएं, मोदी के आलोचक चाहे जितने ताने दें लेकिन मोदी उकसावे में नहीं आएंगे। हां, लेकिन बड़ा संकट कभी न कभी उभर सकता है।
पाकिस्तान ने ट्रंप के लिए बहुत कुछ किया है, इसलिए वह केवल अपने फील्ड मार्शल की तारीफों से संतुष्ट होने वाला नहीं है। वह चाहता है कि कश्मीर का उल्लेख किया जाए चाहे वह जितने अस्पष्ट तरीके से आए। चाहे वह केवल ट्रुथ सोशल की पोस्ट में आए। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की हालत खराब है और पश्चिमी मोर्चे पर संघर्ष छिड़ा हुआ है। उन्हें इन सबसे निजात पाने की जरूरत है। मुनीर की नजर में यह कश्मीर मुद्दे को उभार कर और घड़ी की सुइयों को वापस 5 अगस्त, 2019 की ओर ले जाने में है। मोदी इस चुनौती को लेकर क्या प्रतिक्रिया देंगे? उसका समय आ गया है और इसके लिए करीब ढाई साल का रणनीतिक धैर्य रखना होगा।
इसे उचित ठहराने के लिए और रणनीतिक धैर्य बनाए रखने के लिए हमें सैन्य शक्ति की जरूरत है। अगर मोदी अपने 12 साल के कार्यकाल की ओर पलट कर देखते हैं तथा नेहरू और 1962 को भूल जाते हैं तो उन्हें पता चलेगा कि उन्होंने रक्षा पर बहुत अधिक खर्च नहीं किया है। यहां तक कि उपलब्ध राशि को भी पूरी तरह खर्च नहीं किया गया क्योंकि खरीद को लेकर दिक्कतें मौजूद हैं।
काफी सुधार नजर आने वाला है। खासकर निजी क्षेत्र में खुलापन आने वाला है। लेकिन परिणाम आने में समय लगेगा। तब तक एक तात्कालिकता का भाव होना चाहिए क्योंकि मुनीर कभी भी फिर से संकट खड़ा कर सकते हैं। इसके लिए छह महीने, दो साल और पांच साल की योजना की आवश्यकता है। रणनीतिक और सामरिक शक्ति की नींव अर्थव्यवस्था है। लंबे समय से भारत ने यह दावा करके खुद को सांत्वना दी है कि वह सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है। लेकिन इतनी बड़ी जनसंख्या के लिए यह पर्याप्त नहीं है।
प्रधानमंत्री को अपने न्यूनतम सरकार के वादों पर खरा उतरना होगा और वह स्पष्ट बयान भी सही साबित करना होगा जो उन्होंने महामारी के बाद दिया था। उन्होंने कहा था कि चूंकि सरकार का कारोबार में कोई काम नहीं है इसलिए वह कुछ रणनीतिक क्षेत्रों को छोड़कर सभी क्षेत्रों से बाहर निकल जाएगी। इन वर्षों में इसका उल्टा हुआ है। कई नई सरकारी कंपनियां स्थापित की गई हैं और आईडीबीआई की बिक्री जैसे सामान्य अवसर भी लंबित हैं।
संकट के समय सरकार ने अपनी गलतियों को वापस लेने की क्षमता दिखाई है। हम इसे मुक्त व्यापार समझौतों की बाढ़, बॉन्ड में विदेशी निवेश पर करों की वापसी और अब एक नई उदार द्विपक्षीय निवेश संधि (बीआईटी) की चर्चा में देखते हैं जबकि पहले की सभी संधियां समाप्त कर दी गई थीं।
किसी संकट से सीखने वाली और अपनी नीतियों को इतनी नाटकीय रूप से बदलने की इच्छा दिखाने वाली सरकार का होना एक अच्छा संकेत है। भारत को इसकी और भी ज्यादा जरूरत है। खनन, हाइड्रोकार्बन अन्वेषण, शहरीकरण और यहां तक कि साधारण चीजों जैसे छत पर सौर ऊर्जा। इस क्षेत्र में पाकिस्तान हमसे कहीं आगे है। हमें प्रधानमंत्री द्वारा फरवरी 2024 में घोषित योजना (पीएम सूर्य घर योजना) को गति देने के लिए इससे प्रेरणा लेनी चाहिए। हिंदुत्व के साथ मिलकर यह वृद्धि दर जिसे हम ‘हिंदुत्व वृद्धि दर’ कह सकते हैं शायद चुनाव जितवा दे। लेकिन यह भारत के लिए कमजोर प्रदर्शन होगा। चौथी चुनौती, तब, वास्तव में सरकार को कारोबार से दूर करने की होगी।
पांचवी और अंतिम चुनौती राजनीतिक होनी चाहिए। मोदी-शाह संयोजन ने अब तक उल्लेखनीय कौशल दिखाया है। लोक सभा में 240 सीटों के अल्पमत से शुरू करके भी वे भारत को लगभग एक-दलीय प्रणाली में बदलने में सफल रहे। लेकिन राजनीति में चीजें हमेशा एक सी नहीं होतीं। इस शक्ति का बड़ा हिस्सा नए सहयोगियों पर निर्भर है या अन्य छोटे दलों को तोड़ने पर। किसी समय कोई सहयोगी असंतोष दिखा सकता है, कोई मुख्यमंत्री बड़ी गड़बड़ी कर सकता है।
खासकर राज्य की राजधानियों में पार्टी द्वारा चुने गए कुछ ‘प्रतिभाशाली’ नेताओं को देखते हुए। भले ही भाजपा में कोई उत्तराधिकार की बात नहीं करे लेकिन 2029 के करीब आते-आते पार्टी में किसी प्रकार की प्राथमिक प्रक्रिया की फुसफुसाहट अनिवार्य रूप से शुरू होगी। कम से कम चार दावेदार 2034 के लिए मौजूद होंगे, हालांकि तब वे भी अपनी उम्र के पांचवें या छठे दशक में होंगे। विपक्ष की वर्तमान स्थिति को देखते हुए कह सकते हैं कि मोदी की राजनीतिक चुनौतियां भाजपा के भीतर से उठेंगी। मोदी के सामने आने वाली पांच सबसे बड़ी चुनौतियां यही हैं। और याद रखिए कि इसमें सबसे पहले अतीत को भूलने की बात है।