इस समाचार पत्र में गत सप्ताह यह खबर प्रकाशित हुई थी कि हाल ही में ब्रिटेन के साथ हुए हमारे अहम मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के क्रियान्वयन में देरी हो सकती है क्योंकि ब्रिटेन ने सभी प्रकार के इस्पात आयात पर नए प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया है। उसने हाल ही में यह घोषणा की है कि वह अपने एंटी डंपिंग अधिकारों के तहत शुल्क मुक्त आयात होने वाले इस्पात की मात्रा को 60 फीसदी तक कम करना चाहता है। इसे अपेक्षाकृत जल्दी लागू किया जाएगा और यह आगामी जुलाई से प्रवर्तित होगा।
इस्पात के लिए जो शुल्क मुक्त कोटा निर्धारित किया गया है उससे अधिक आयात करने पर 50 फीसदी शुल्क लगाया जाएगा। व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौता ऐसे आयातों पर शुल्क को शून्य तक घटाने का प्रावधान करता है।
कोई भी बड़ा मुक्त व्यापार समझौता हस्ताक्षर होने से लेकर क्रियान्वयन तक कई मुश्किलों से गुजरता है। परंतु घरेलू राजनीतिक लोकलुभावनवाद और वैश्विक अतिरिक्त क्षमता के समय हालात और भी कठिन हो जाते हैं।
इन कारकों ने मिलकर ब्रिटेन के निर्णय में योगदान दिया है। किअर स्टार्मर की संकटग्रस्त लेबर सरकार को यह दिखाना जरूरी है कि वह ब्रिटिश नौकरियों और उद्योगों की रक्षा करने के लिए तैयार है। लेकिन उसने यूरोपीय संघ के साथ आर्थिक रूप से और निकट आने का भी निर्णय लिया है, जिसे उसने लगभग एक दशक पहले हुए जनमत संग्रह के बाद 2020 में कठिनाई से छोड़ा था। इस प्रक्रिया के हिस्से के रूप में उसे विभिन्न क्षेत्रों पर ऐसे प्रतिबंध लगाने होंगे जो यूरोपीय नियमों के साथ निकटता से जुड़े हों। इस्पात स्वाभाविक रूप से उन क्षेत्रों में से एक होगा।
उल्लेखनीय बात यह है कि ब्रिटेन की इस नई नीति का एक बड़ा लाभार्थी टाटा स्टील होगा जिसका वेल्स के पोर्ट टैलबॉट में एक बड़ा संयत्र है। पोर्ट टैलबॉट में पारंपरिक तरीकों से इस्पात का निर्माण बंद हो चुका है। वहां उसके ब्लास्ट फर्नेस 2024 में ही बंद हो गए थे। नया उत्पादन पर्यावरण के अनुकूल इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस से आता है जो रीसाइकल किए गए इस्पात सहित अन्य कच्चे माल का उपयोग करता है।
आगे चलकर केंद्रीय मुद्दा वही होगा जिसे यूरोपीय संघ कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (सीबीएएम) कहता है। इसे सरल भाषा में आयातों की कार्बन सामग्री पर शुल्क कहा जा सकता है। भारत को इस हकीकत को स्वीकार करना होगा कि उसके प्रमुख व्यापारिक साझेदार यूरोपीय संघ के नेतृत्व का अनुसरण करेंगे और उन उत्पादों पर अपेक्षाकृत ऊंची बाधाएं खड़ी करेंगे जो ऐसी प्रक्रियाओं से निकलते हैं जिनमें ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का उत्पादन अधिक होता है।
ब्रिटेन सहित यूरोप के देश मानते हैं कि उनके उद्योग अब प्रतिस्पर्धी क्षमता में उस कमी का बोझ नहीं उठा सकते जो वैश्विक समकक्षों की तुलना में कार्बन फुटप्रिंट पर अधिक कठोर होने से उत्पन्न होता है। यह बात इतनी दिक्कतदेह नहीं मानी जानी चाहिए कि वह व्यापक एकीकरण की प्रक्रिया को ही बेपटरी कर दे।
वास्तव में, इसे भारतीय इस्पात क्षेत्र के सामने मौजूद एक बड़ी समस्या से निकलने का रास्ता माना जाना चाहिए। वह समस्या है चीन की अतिरिक्त क्षमता। चीन में पारंपरिक इस्पात निर्माण में निवेश के स्तर ने दुनिया भर में, भारत सहित, एंटी डंपिंग चिंताओं को जन्म दिया है। लेकिन भारत में इस क्षेत्र में नए निवेश को उच्चस्तरीय प्रक्रियाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए जो पश्चिम में विभिन्न सीमा प्रतिबंधों को पार करने में अधिक सक्षम होंगी।
यह भविष्य में प्रतिस्पर्धात्मक लाभ का स्रोत बनेगा। भारत के लिए यह महत्त्वपूर्ण है कि वह अपने नए मुक्त व्यापार समझौतों के क्रियान्वयन की प्रक्रिया को धीमा न करे। यूरोप और ब्रिटेन में राजनीति का उतार-चढ़ाव इतना गतिशील है कि किसी भी तरह की अतिरिक्त देरी दोहरी समस्या बन जाएगी। अब तक हासिल विभिन्न उपलब्धियों को यथाशीघ्र सुनिश्चित किया जाना चाहिए।