कितने लोगों को याद है कि सरकार ने वर्ष 2002 में पेट्रोलियम उत्पादों के लिए प्रशासित मूल्य निर्धारण तंत्र (एपीएम) खत्म कर दिया था और उसी वर्ष 1 अप्रैल से पेट्रोल एवं डीजल के लिए बाजार आधारित मूल्य निर्धारण का ऐलान किया था?
तब से दो दशक गुजर जाने के बाद भी सरकार यह निर्णय लागू करने में सक्षम नहीं है जो इससे जुड़ी जटिलताओं का संकेत समझा जा सकता है। अफसोस की बात है कि उस विषय पर सिर्फ वर्तमान हालात जैसे समय में ही गंभीर जिक्र होता है। इस बात को सभी जानते हैं कि पेट्रोलियम उत्पादों का मूल्य निर्धारण राजनीतिक रूप से एक संवेदनशील विषय है, मगर अब समय आ गया है कि सरकार इस संबंध में कड़े कदम उठाए, कठोर निर्णय ले और उन पर कायम रहे।
सबसे पहले कुछ तथ्यों पर विचार कर लेते हैं। ऊर्जा समूह (बास्केट) में तेल एवं गैस का अनुपात पिछले दो दशकों में लगभग स्थिर रहा है। यह वर्ष 2000 में लगभग 32 फीसदी था जबकि अब 31 फीसदी है। नवीकरणीय ऊर्जा पर बढ़ते जोर, संरक्षण के विभिन्न प्रयासों और इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) को बढ़ावा देने की योजनाओं के बावजूद तेल एवं गैस की घरेलू खपत में त्वरित कमी आने की गुंजाइश नहीं दिख रही है।
समय के साथ तेल और गैस आयात पर हमारी निर्भरता बढ़ती ही जा रही है। वर्तमान में यह घरेलू खपत का क्रमशः लगभग 85 फीसदी और 50 फीसदी है। भारत का कच्चा तेल आयात कुल वैश्विक तेल आयात का लगभग 12 फीसदी है और भारत अंतरराष्ट्रीय बाजार में मूल्य निर्धारण करने की स्थिति से बहुत दूर है।
तेल एवं गैस अर्थव्यवस्था का एक और अहम पहलू यह है कि केंद्र एवं राज्य सरकारों के अप्रत्यक्ष कर राजस्व का एक बड़ा हिस्सा इन्हीं वस्तुओं से आता है। यही कारण है कि इन्हें अब तक माल एवं सेवा कर (जीएसटी) के दायरे में नहीं लाया जा सका है। सरकार निगम कर और सरकारी स्वामित्व वाली तेल एवं गैस कंपनियों से लाभांश के जरिये भी राजस्व अर्जित करती है। सरकार के सामने तीन तरफा चुनौतियां हैं यानी घरेलू कीमतें नियंत्रित रखना, कर राजस्व में नुकसान से बचना और विदेशी मुद्रा व्यय एवं चालू खाता घाटा नियंत्रित करना। मौजूदा चुनौतीपूर्ण हालात इस व्यवस्था के लिए एक गंभीर परीक्षा साबित होते हैं।
स्वाभाविक रूप से सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) के नुकसान सहन करने की एक सीमा होती है। यह कोई नहीं जानता कि वर्तमान भू-राजनीतिक स्थिति कब तक बनी रहेगी। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ओएमसी सूचीबद्ध कंपनियां हैं जो सार्वजनिक शेयरधारकों के प्रति जवाबदेह हैं।
जहां तक सरकार की बात है तो उसके पास यह बोझ उठाने के लिए राजकोषीय मोर्चे पर गुंजाइश बहुत कम है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) रुपये को एक सीमा तक ही सहारा दे सकता है। मौजूदा प्रतिकूल हालात में रुपये में गिरावट थामना एक कठिन चुनौती है।
बाजार और उपभोक्ताओं को सही मूल्य निर्धारण का संकेत देने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। महज बचत की अपील और आह्वान कारगर नहीं होंगे। इससे मुद्रास्फीति बढ़नी तय है, यह टाली नहीं जी सकती। कीमतों को अस्वाभाविक रूप से दबाए रखने से अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान होता है। भविष्य में सरकार को लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊंचे दाम से निपटने के लिए सिद्धांत-आधारित मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) लागू करनी चाहिए।
ऐसे हालात में केंद्र एवं राज्य सरकारों को अपने कर राजस्व में कमी की स्वीकार कर लेनी चाहिए। इसके उलट सामान्य से कम अंतरराष्ट्रीय कीमतें रहने पर केंद्र एवं राज्य कर दरें बढ़ा सकती हैं।
उपयुक्त मकसद हासिल करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के लिए आपसी तालमेल के साथ कदम उठाना अति आवश्यक है। निकट भविष्य में पेट्रोलियम को जीएसटी व्यवस्था के दायरे में लाना संभव नहीं है। हालांकि, जीएसटी परिषद इस विषय पर आम सहमति बनाने के लिए उपयुक्त मंच हो सकती है। भारत में तेल एवं गैस उद्योग की एक विशेषता यह है कि बाजार में सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियों का वर्चस्व है। बेशक समय के साथ उन्होंने अच्छा काम किया है मगर निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देने की आवश्यकता से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
एक और पहलू भी है। सरकारी स्वामित्व वाली तेल एवं गैस कंपनियों के पास लगभग पूरा बाजार हिस्सा होने के कारण सरकार पर कीमतों में औपचारिक और अनौपचारिक रूप से हस्तक्षेप करने का दबाव बना रहता है।
सरकार की आलोचना हो रही है कि उसने मात्र 11 दिनों के भीतर पेट्रोल एवं डीजल की कीमतों में लगभग 7 से 8 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि कर दी है। घरेलू कीमतों में बढ़ोतरी चरणबद्ध तरीके से धीरे-धीरे दो से तीन महीने की अवधि में की जानी चाहिए थी। इससे लोगों को पहले ही जानकारी मिल जाती और लोगों का गुस्सा भी कम दिखता। मगर ऐसा तभी संभव हो पाता जब पेट्रोलियम उत्पादों के विपणन का एक बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र के पास रहता और सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों का बाजार में एकाधिकार न होता।
हालात सामान्य होते ही सरकार को तेल एवं गैस क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने के लिए नए सिरे से प्रयास करने की जरूरत है। सही तरीका यह होगा कि बाजार में महत्त्वपूर्ण हिस्सेदारी रखने वाली मौजूदा तेल एवं गैस कंपनियों में किसी एक का निजीकरण कर दिया जाए।
सरकार को भारत पेट्रोलियम निगम लिमिटेड (बीपीसीएल) के निजीकरण के प्रस्ताव पर पुनर्विचार करना चाहिए। कंपनी के निजीकरण की योजना कुछ साल पहले बनाई गई थी मगर बाद में यह रद्द कर दी गई थी। बीपीसीएल जैसी 20 फीसदी से अधिक बाजार हिस्सेदारी वाली कंपनी का निजीकरण होने पर देश में पेट्रोलियम उत्पादों के विपणन का परिदृश्य पूरी तरह बदल जाएगा। इससे मूल्य निर्धारण में सरकार की भूमिका कम हो जाएगी और प्रतिकूल हालात रहने पर उसकी दिक्कतें कम हो जाएंगी। समय के साथ लोग बाजार आधारित मूल्य निर्धारण के अभ्यस्त हो जाएंगे।
(लेखक पूर्व आईएएस अधिकारी हैं और पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय में कार्य कर चुके हैं)