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पारंपरिक प्रसारण की ढीली होती पकड़ के बीच रेटिंग का शोर-गुल, नियमन पर उठे सवाल

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25 वर्षों से अधिक समय तक पारंपरिक टेलीविजन प्रसारण (अपॉइंटमेंट टेलीविजन या लीनियर टीवी) ने मीडिया कारोबार पर राज किया और दर्शकों और राजस्व का एक बड़ा हिस्सा बटोरता रहा

Last Updated- April 27, 2026 | 10:06 PM IST
Television

जुलाई 2000 से हर सप्ताह रात 9 बजे सबके घरों से एक आवाज जरूर सुनाई देती थी। लगभग सभी उम्र के लोगों पर जादू चलाने वाली वह आवाज थी ‘मैं अमिताभ बच्चन बोल रहा हूं और आप देख रहे हैं कौन बनेगा करोड़पति’। भारत के 35 करोड़ टीवी दर्शकों में आधे से अधिक (उस समय) स्टार प्लस पर अमिताभ बच्चन को देखने के लिए सब काम छोड़ कर टेलीविजन के सामने टकटकी लगाकर बैठ जाते थे। रात 10 बजे उनका शो खत्म होते ही लोग ‘कहानी घर घर की’ में पार्वती अग्रवाल को और फिर साढ़े दस बजे ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ में तुलसी विरानी को देखने से नहीं चूकते थे।

वह टेलीविजन का स्वर्णिम युग था जिसकी शुरुआत 90 के दशक की शुरुआत में स्टार टीवी, ज़ी, सोनी और सन टीवी के आगमन के साथ हुई थी। 25 वर्षों से अधिक समय तक पारंपरिक टेलीविजन प्रसारण (अपॉइंटमेंट टेलीविजन या लीनियर टीवी) ने मीडिया कारोबार पर राज किया और दर्शकों और राजस्व का एक बड़ा हिस्सा बटोरता रहा। हॉटस्टार (2015), नेटफ्लिक्स और एमेजॉन प्राइम वीडियो (2016) के आने के बाद भी यह बात सच रही। मगर वह सुनहरा दौर अब खत्म हो रहा है।

आइए आंकड़ों से समझते हैं। वर्ष 2019 में 21 करोड़ से अधिक भारतीय घरों में टेलीविजन था (लगभग 90 करोड़ लोगों का दर्शक वर्ग)। इनमें से ज्यादातर घरों में डीटीएच (डायरेक्ट-टु-होम) या केबल कनेक्शन थे। कोविड महामारी और वीडियो स्ट्रीमिंग के बढ़ते चलन के कारण यह संख्या घटकर 15.7 करोड़ घरों तक रह गई है (60 करोड़ लोगों तक पहुंच)। इसे और अधिक गहराई से समझने की कोशिश करते हैं।

इन 15.7 करोड़ घरों में लगभग आधे से कम घर डीडी फ्री डिश का इस्तेमाल कर रहे हैं जो सरकारी प्रसारक की एक निःशुल्क डीटीएच सेवा है। बाकी 9.2 करोड़ घरों में केबल या डीटीएच और कनेक्टेड टीवी का संयोजन हैं या इनमें से केवल एक है। इसका मतलब है कि इनमें से आधे से थोड़े अधिक घर केबल या डीटीएच की सेवा ले रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार सैकड़ों बहु-प्रणाली ऑपरेटरों (टीवी सिग्नल वितरकों) ने या तो अपने लाइसेंस लौटा दिए हैं या उनकी अवधि समाप्त हो गई है या फिर रद्द कर दिए गए हैं। नए लाइसेंस के लिए कोई जल्दबाजी नहीं दिख रही।

ये आंकड़े 2025 की शुरुआत के हैं। विश्लेषकों का कहना है कि इनमें और कमी आई है। ये आंकड़े इसलिए नहीं दिखते क्योंकि आधिकारिक रेटिंग निकाय ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल (बार्क) 2018 से ही इनके आंकड़ों को दोहरा रही है। पिछला बुनियादी अध्ययन उसी वर्ष किया गया था। पारंपरिक टेलीविजन के पतन का सबसे बड़ा संकेत विज्ञापन और भुगतान राजस्व, दोनों में आई भारी गिरावट है। ईवाई की फिक्की-फ्रेम्स रिपोर्ट के अनुसार यह 2019 में लगभग 78,800 करोड़ रुपये से कम हो कर 2025 में लगभग 61,700 करोड़ रुपये रह गया। नियमित रूप से देखने, स्थिर रेटिंग और छह और बारह महीने के विज्ञापन अनुबंधों की पूरी अवधारणा ही खत्म होती दिख रही है।

रेटिंग नियंत्रित करने वाले हाल के कदम हैरान करने वाले हैं। गत 6 मार्च को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने बार्क को चार सप्ताह के लिए समाचार चैनलों की रेटिंग रोक देने का निर्देश दिया। यह निर्देश ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमले की सनसनीखेज कवरेज को रोकने के मद्देनजर दिया गया था। एक महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी समाचार प्रसारकों, विज्ञापनदाताओं और एजेंसियों की ओर से पूरी तरह चुप्पी है।

समाचार (जो कुल टीवी दर्शकों का एक छोटा सा हिस्सा है) टीवी की पहुंच की सिकुड़न को देखते हुए महत्त्वहीन हो जाता है। गत 27 मार्च को सरकार ने टीवी रेटिंग नीति 2026 जारी की। यह उन तमाम नियामक बदलावों को खत्म कर देता है, जो तीन अलग-अलग रिपोर्टों, एक कोर्ट केस, काफी खींचतान और 2010 से 2015 के बीच टीएएम (टेलीविजन ऑडियंस मेजरमेंट) के तहत टीआरपी सिस्टम को खत्म करके बार्क बनाने में लगी सारी मेहनत के बाद आए थे।

नई नीति में कहा गया है, ‘टेलीविजन रेटिंग कंपनी के निदेशक मंडल का कोई भी सदस्य प्रसारण/विज्ञापन/विज्ञापन एजेंसी के व्यवसाय में नहीं होना चाहिए।’ इसका मतलब है कि इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फाउंडेशन, इंडियन सोसाइटी ऑफ ऐडवरटाइजर्स और ऐडवरटाइजिंग एजेंसीज एसोसिएशन ऑफ इंडिया के संयुक्त उद्यम बार्क को दिशानिर्देशों की अधिसूचना के 30 दिनों के भीतर अपना पुनर्गठन करना होगा।

इसका यह भी अर्थ है कि तेजी से घटते लगभग 26,300 करोड़ रुपये के टेलीविजन विज्ञापन बाजार के भविष्य को निर्धारित करने वाले मापदंडों को तय करने की ताकत अब इस उद्योग से बाहर के लोगों के हाथों में होगी। आप कह सकते हैं कि अगर परंपरागत टीवी में गिरावट आ रही है तो इस हस्तक्षेप की फिर क्या अहमियत रह जाती है? शायद इसलिए कि इससे निजी व्यवसायों में इसी तरह के हस्तक्षेपों के लिए एक मिसाल कायम हो सकती है।

क्या सरकार यह तय कर सकती है कि पाठकों की संख्या, किसी फिल्म की बॉक्स ऑफिस कमाई या डिजिटल पहुंच या असर का आकलन किस तरह किया जाए? यह दूसरे कारण को उजागर करता है कि नियामक अतिरेक क्यों काफी पेचीदा लगता है। डीडी फ्री डिश सबसे बड़ी लीनियर टीवी सेवा है। यह 5 करोड़ से 6.5 करोड़ घरों तक पहुंचती है। इसके प्रभाव का सबसे बड़ा संकेत इस तथ्य से मिलता है कि डीडी फ्री डिश पर देखे जाने वाले चैनल (जैसे दंगल टीवी और स्टार उत्सव ) मौजूदा रेटिंग चार्ट में मजबूती से दिखाई देते हैं। इस पर विज्ञापनदाताओं या प्रसारकों की ओर से कोई आपत्ति या शिकायत नहीं है। यूट्यूब और नेटफ्लिक्स जैसी ऑन-डिमांड सेवाओं के कारण भी बड़े पर्दे का चलन बढ़ रहा है। लेकिन इस दुनिया में रेटिंग का कोई महत्त्व नहीं है। यहां विज्ञापन प्रदर्शन पर आधारित होते हैं न कि रेटिंग पर।

विभिन्न स्क्रीन को जोड़कर एक समग्र तस्वीर पेश करने वाली चीज की कमी है। रेटिंग नीति में एक ऐसी तकनीक-तटस्थ व्यवस्था की बात की गई है जो केबल, डीटीएच और स्ट्रीमिंग से डेटा एकत्र करे। मगर अगले ही पल इसमें मीटर, घरों की बात करते हुए नमूना अनिवार्य कर दिया जाता है। यह एक मुश्किल काम है। उद्योग जगत के सर्वश्रेष्ठ विशेषज्ञों वाली संस्था बार्क ने इस व्यवस्था को लागू करने के लिए एक दशक से अधिक समय तक प्रयास किया है। यह स्पष्ट नहीं है कि एक नई संस्था, जिसमें इस उद्योग के लोग शामिल ही नहीं हैं, यह लक्ष्य कैसे हासिल कर पाएगी।

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First Published - April 27, 2026 | 9:43 PM IST

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