अभी कुछ वर्ष पहले तक अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त एक सूचना प्रौद्योगिकी कंपनी को उसके समय-समय पर दिए जाने वाले लाभ संबंधी अनुमान (प्रॉफिट गाइडेंस) के कुशल प्रबंधन के लिए जाना जाता था। सामान्यत: जब कंपनी अपने तिमाही नतीजे घोषित करती, तो आने वाली तिमाहियों के लिए लाभ वृद्धि का अनुमान प्रस्तुत करती। बाद में किए गए विश्लेषण से पता चला कि कंपनी द्वारा दिए गए अनुमानित लाभ वृद्धि के आंकड़े हमेशा बाद में घोषित किए जाने वाले वास्तविक प्रदर्शन से थोड़े कम होते थे।
कई विशेषज्ञों ने इसे अपेक्षाओं को प्रबंधित करने और सकारात्मक रूप से चौंकाने का बेहतरीन उदाहरण माना। शेयर बाजार और विश्लेषक कंपनी की इस क्षमता की सराहना करते थे कि वह अपने अनुमान से अधिक प्रदर्शन करती है। समय के साथ इसे कंपनी की जानबूझकर अपनाई गई अनुमान प्रबंधन नीति कहा जाने लगा।
क्या सरकार के थिंक टैंक और प्रधानमंत्री की सलाहकार संस्था को भी देश की अर्थव्यवस्था की वृद्धि और मुद्रास्फीति के दायरे को लेकर इसी प्रकार के अनुमान सिद्धांत का पालन करना चाहिए? निश्चित रूप से, उस कंपनी द्वारा अपनाई गई अनुमान प्रबंधन नीति का पालन करने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था आगे कैसी रहेगी, इस पर अधिक विश्लेषण और पूर्वानुमान निश्चित रूप से अत्यंत सहायक हो सकते हैं। इससे न केवल बाजारों को, बल्कि सरकार के नीति-निर्माताओं को भी ऐसे प्रारंभिक आकलनों से लाभ मिलेगा।
फिलहाल, इस प्रकार का अनुमान मुख्य रूप से रिजर्व बैंक और केंद्रीय वित्त मंत्रालय की वार्षिक आर्थिक समीक्षा से मिलता है। रिजर्व बैंक का आकलन अधिक बार आता है। वह हर दो महीने में मौद्रिक नीति समीक्षा के साथ इसे पेश करता है। आर्थिक समीक्षा का दृष्टिकोण व्यापक होता है, लेकिन यह जल्दी अप्रासंगिक भी हो सकता है , जैसा कि हाल की घटनाओं से देखा गया। उदाहरण के लिए, 2025-26 की आर्थिक समीक्षा 29 जनवरी को प्रस्तुत की गई थी, यानी पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू होने से लगभग एक महीने पहले। इसमें 2026-27 के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 6.8 से 7.2 फीसदी होने का अनुमान पेश किया गया था। अब किसी को इसकी अपेक्षा नहीं है।
हाल के वर्षों में वित्त मंत्रालय द्वारा तैयार की जाने वाली मासिक आर्थिक समीक्षा (एमईआर) से अर्थव्यवस्था की स्थिति को समझने में बड़ा सकारात्मक बदलाव आया है। नए ढांचे और अद्यतन सामग्री के साथ एमईआर इस बारे में व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत करती है कि अर्थव्यवस्था किस तरह का प्रदर्शन कर रही है और संभावित चुनौतियां या अवसर क्या हो सकते हैं। फिर भी यह वर्ष के लिए किसी विशिष्ट वृद्धि या मुद्रास्फीति का अनुमान प्रस्तुत करना पसंद नहीं करती। संभवतः यह अपने स्रोतों और मानकों का, जिनमें उच्च-आवृत्ति संकेतक भी शामिल हैं, उपयोग करके एक वृद्धि दर का अनुमान प्रस्तुत कर सकती है जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अधिक सटीक मानक साबित हो।
पश्चिम एशिया में चल रहा संघर्ष भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि संभावनाओं, मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखने और बाहरी क्षेत्र को संतुलित करने की क्षमता पर गहरी छाया डाल रहा है। वर्ष 2025-26 में भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 7.6 फीसदी की अच्छी दर से बढ़ा। 2026-27 के लिए सरकार की संस्थाओं, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और रेटिंग एजेंसियों के पूर्वानुमान 2025-26 की तुलना में कम वृद्धि दर दर्शाते हैं। खुदरा मुद्रास्फीति के अनुमान भी आने वाले महीनों के लिए अधिक हैं, जबकि 2025-26 में यह 2.1 फीसदी थी। इससे भारत के भुगतान संतुलन पर दबाव बढ़ने वाला है।
एमईआर के अप्रैल संस्करण में स्पष्ट रूप से कहा गया है, ‘भारत वित्त वर्ष 2026-27 में घरेलू मजबूती और बाहरी अस्थिरता के संगम पर प्रवेश कर रहा है। पिछले वित्त वर्ष में वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.6 फीसदी रही, जो हाल के वर्षों में सबसे मजबूत है। इसने आगामी वित्त वर्ष के लिए 7 से 7.4 फीसदी की वृद्धि का अनुमान पेश किया लेकिन पश्चिम एशिया युद्ध के बाद बदले हुए व्यापक आर्थिक परिदृश्य ने इस पर काली छाया डाल दी। अर्थव्यवस्था में ‘आपूर्ति झटका’ स्पष्ट है। उच्च कीमतों, बढ़ती मुद्रास्फीति और आर्थिक गतिविधियों की धीमी गति को देखते हुए मांग में कमी गंभीर चिंता का विषय है। मुद्रास्फीति लागत-प्रेरित हो सकती है क्योंकि व्यवसाय/उत्पादक कच्चे माल की अपनी बढ़ी हुई लागत को लाभ मार्जिन बचाने के लिए ग्राहकों पर डाल सकते हैं।’
वर्तमान में भारत की दो प्रमुख संस्थाओं प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद और नीति आयोग में इस तरह का आकलन अनुपस्थित है। जहां रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय देश के सामने भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति का व्यापक खाका प्रस्तुत करते हैं, वहीं ये दोनों संस्थाएं फिलहाल मासिक, तिमाही या वार्षिक आवृत्ति पर ऐसे रिपोर्ट जारी नहीं करतीं। निश्चित रूप से, ये संस्थाएं बड़ी संख्या में रिपोर्ट तैयार करती हैं, लेकिन वे मुख्यतः सरकार द्वारा संचालित क्षेत्रों और योजनाओं पर केंद्रित होती हैं।
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद या नीति आयोग के लिए ऐसी कोई वजह नहीं है कि वे भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति और उन उपायों पर जिन्हें वे सरकार को विचार करने योग्य मानते हैं, तिमाही या अर्ध वार्षिक रिपोर्ट जारी न करें। अतीत में, प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने भारतीय अर्थव्यवस्था की ऐसी समीक्षाएं प्रस्तुत की थीं, जिनसे यह बहस शुरू हुई कि अर्थव्यवस्था का प्रबंधन कैसे किया जाना चाहिए। अपने पुराने स्वरूप में योजना आयोग भी ऐसी समीक्षाएं तैयार करता था, ताकि रिजर्व बैंक या वित्त मंत्रालय द्वारा किए गए कार्यों को पूरक बनाया जा सके।
ऐसा नहीं है कि परिषद या नीति आयोग के पास ऐसी रिपोर्ट तैयार करने के लिए संसाधनों की कमी है। परिषद में कई अंशकालिक सदस्य हैं, जो विश्वसनीय और सक्षम अर्थशास्त्री हैं। इसी तरह, नीति आयोग का हाल ही में पुनर्गठन हुआ है और अशोक लाहिड़ी जो पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे हैं, उनको इसका नया उपाध्यक्ष बनाया गया है।
अब समय आ गया है कि देश को भारतीय अर्थव्यवस्था के अधिक व्यापक और विविध आकलनों तक पहुंच का मिले। रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय को समय-समय पर अर्थव्यवस्था की हालत पर रिपोर्ट जारी करनी चाहिए। पश्चिम एशिया संघर्ष, बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली के पतन और अमेरिका की शुल्क नीतियों से उत्पन्न वैश्विक आर्थिक अस्थिरता को देखते हुए प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद और नए स्वरूप वाला नीति आयोग भारतीय अर्थव्यवस्था की समझ को बेहतर बनाने और नीतिगत सुझाव देने में रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय के प्रयासों के पूरक बन सकते हैं।