पश्चिम एशिया में हाल ही में शुरू हुए संकट ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि ऊर्जा सुरक्षा की समस्या वास्तव में भौगोलिक स्थिति के कारण मुश्किल हो जाती है। अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध के बीच होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों का आवागमन गंभीर रूप से बाधित हो गया है और दुनिया की प्रमुख शक्तियां इस बात को खुले तौर पर स्वीकार कर रही हैं कि इस कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर जोखिम की स्थिति बन सकती है। दुनिया का लगभग 20 फीसदी तेल और तरल प्राकृतिक गैस (एलएनजी) इस संकीर्ण जलमार्ग से होकर गुजरता है और इस मार्ग के बंद होने का प्रभाव अब पूरी दुनिया में महसूस होने लगा है।
भारत अपनी तेल की जरूरतों का करीब 90 फीसदी और गैस की जरूरतों का लगभग आधा हिस्सा आयात करता है। इसके अलावा, भारत की रसोई गैस (एलपीजी) खपत का लगभग 60 फीसदी आयात से पूरा होता है और इन आयात में से लगभग 90 फीसदी होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते से ही आता है। कच्चे तेल के मामले में भारत ने आयात स्रोतों में कुछ हद तक विविधता पर जोर दिया है लेकिन फरवरी 2026 में इसके आयात पोर्टफोलियो में पश्चिम एशिया की हिस्सेदारी 59 फीसदी तक पहुंच गई। इस युद्ध की शुरुआत से पहले भी, भारत का तेल और गैस आयात बिल सालाना लगभग 180 अरब डॉलर के करीब था।
जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता भारत के लिए एक प्रणालीगत सुरक्षा समस्या बन गई है। आयातित हाइड्रोकार्बन, भारत की अर्थव्यवस्था को उन क्षेत्रों से जोड़ते हैं, जिन पर इसका नियंत्रण सीमित है। जितना लंबा यह युद्ध चलेगा, भारत का आयात बिल उतना ही बढ़ेगा और उद्योग, कृषि, परिवहन और घरेलू जीवन पर दबाव लगातार बढ़ता जाएगा।
हालांकि, गैर-जीवाश्म ईंधन इस तरह के समीकरण में बदलाव ला सकता है जो वास्तव में जीवाश्म ईंधन के आयात पर निर्भरता से संभव नहीं है। सोलर पीवी तंत्र अब सामान्य तौर पर 25 से 35 साल तक चलते हैं जबकि पवन टर्बाइनों की उम्र 20 से 25 साल होती है। इसका मतलब यह नहीं है कि सभी जोखिम खत्म हो गए हैं। अब भी ग्रिड, स्टोरेज और विनिर्माण से संबंधित निर्भरता है जिनका प्रबंधन करना होता है। लेकिन इसका यह मतलब है कि एक बार गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता तैयार होने के बाद यह युद्ध जैसी स्थिति, नौ वहन में व्यवधान और समुद्री संकट के बीच भी काम करती रहती है। ऐसा न होने पर आयातित ईंधन की कीमतें आसमान छूने पर मजबूर होतीं।
भारत अपनी ऊर्जा क्षमता में बदलाव लाने की यात्रा में काफी आगे बढ़ चुका है और इसके पास 275 गीगावॉट से अधिक गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता है। भारत ने अपनी ऊर्जा परिवर्तन यात्रा में कुछ अहम कदम उठाए हैं, लेकिन इस तरह के संकट से यह साफ हो रहा है कि जो गति अब तक अपनाई गई है, वह पर्याप्त नहीं है। भारत को अपनी ऊर्जा नीति और योजना को और तेजी से बदलने की जरूरत है ताकि भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा बेहतर हो सके।
पहला कदम, वर्ष 2030 तक अक्षय ऊर्जा लक्ष्य को 500 गीगावॉट से बढ़ाकर 1,500 गीगावॉट करना होगा। यह महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य जरूर है लेकिन असंभव नहीं। 1,500 गीगावॉट का लक्ष्य बाजार, विनिर्माताओं, राज्यों और निवेशकों को यह मजबूत संदेश देगा कि भारत अगले पांच वर्षों में ऊर्जा परिवर्तन के अगले दशक को पूरा करने की दिशा में काम कर रहा है।
दूसरा, भारत ट्रांसमिशन और इससे जुड़े बुनियादी ढांचा के काम को बाद में पूरा करने के लिए छोड़ने पर 1,500 गीगावॉट लक्ष्य के लिए गंभीरता से प्रयास नहीं कर सकता। गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक और तमिलनाडु के अक्षय ऊर्जा से समृद्ध क्षेत्रों में ट्रांसमिशन ग्रिड को तेजी से मजबूत करने की आवश्यकता है ताकि ऊर्जा आवागमन में बाधा कम आए और निकासी की प्रक्रिया तेज हो सके। अक्षय ऊर्जा को समन्वित करने के लिए स्थापित किए गए 11 अक्षय ऊर्जा प्रबंधन केंद्र एक दूरदर्शी कदम थे लेकिन अब भारत को इन केंद्रों की संख्या और क्षमता दोनों को बढ़ाने की आवश्यकता है।
तीसरा, भारत को अब अपनी रणनीति बदलते हुए अक्षय ऊर्जा से जुड़ी हुई हर निविदा में बैटरी भंडारण को अनिवार्य कर देना चाहिए। केवल सौर या केवल पवन ऊर्जा वाली निविदाओं का समय अब पीछे छूट चुका है। इसके साथ ही, पंप युक्त जल भंडारण को भी एक अभियान के तहत आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। वास्तव में, भंडारण ही वह तकनीक है जो अक्षय ऊर्जा को केवल दिन के पूरक के बजाय एक रणनीतिक बुनियादी ढांचे में बदल देती है, जिससे 24 घंटे बिजली की आपूर्ति संभव हो पाती है। इस गति को और बढ़ावा देने के लिए, भंडारण संपत्तियों पर माल एवं सेवा कर (जीएसटी) की दर को घटाकर 5 फीसदी किया जाना चाहिए जैसा कि वर्तमान में अधिकांश अक्षय ऊर्जा उपकरणों और उससे जुड़े कलपुर्जों के लिए लागू है।
चौथा, भारत में घरेलू ऊर्जा खपत के लिए एलपीजी का महत्त्व बहुत अधिक है, जिसके कारण हम भारी मात्रा में आयात पर निर्भर हैं। जिस तरह उजाला योजना के तहत थोक खरीद के जरिये एलईडी बल्बों की कीमतों में भारी कमी लाई गई थी, उसी तरह इंडक्शन कुकर के लिए भी मांग पर आधारित योजना शुरू की जानी चाहिए। इससे इसकी शुरुआती लागत में बड़ी गिरावट आएगी। गैस सिलिंडर वाली उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों के डेटाबेस का उपयोग करके इस कार्यक्रम को तेजी से आगे बढ़ाया जा सकता है।
भारत को इलेक्ट्रिक पर आधारित वाहन और इसके लिए जरूरी चार्जिंग ढांचे पर पूरी ताकत लगानी होगी। इसके लिए जरूरी होगा कि एक स्पष्ट परिवहन विद्युतीकरण का रोडमैप तैयार हो जैसे कि नई इलेक्ट्रिक बसों की खरीद, वर्ष 2030 तक दोपहिया और तिपहिया वाहनों का विद्युतीकरण और 2035 तक कारों और ट्रकों का पूर्ण विद्युतीकरण। इसके साथ ही, आधुनिक सेल बैटरी भंडारण के लिए उत्पादन-संबंधी प्रोत्साहन योजना को दुरुस्त करना जरूरी है जिसका अब तक खराब प्रदर्शन रहा है।
अंत में सिर्फ भंडारण से आगे बढ़कर अक्षय ऊर्जा वाले तंत्र की बेहतर क्षमता बनाने की जरूरत होगी। इसमें छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर सहित परमाणु ऊर्जा की भूमिका आती है। वर्ष 2047 तक 100 गीगावॉट परमाणु क्षमता का लक्ष्य रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण और अपरिहार्य होता जा रहा है।
साथ ही, भारत को एक निर्भरता से मुक्ति पाने के लिए दूसरी निर्भरता की ओर बढ़ने से बचना होगा। स्वच्छ ऊर्जा में बदलाव की प्रक्रिया तभी रणनीतिक रूप से टिकाऊ होगी, जब यह महत्त्वपूर्ण खनिज के मूल्य श्रृंखला पर भी जोर दे। चीन लगभग सभी रणनीतिक खनिजों का प्रमुख रिफाइनर बना हुआ है, जिसकी बाजार हिस्सेदारी औसतन 70 से 90 फीसदी है। भारत को महत्त्वपूर्ण खनिज कच्चे माल में विविधता लानी होगी, मध्यवर्ती प्रसंस्करण क्षमता विकसित करनी होगी तथा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और क्षमता निर्माण के लिए अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक साझेदारियों का लाभ उठाना होगा।
आयातित जीवाश्म ईंधन पर निर्भर रहने वाले देश को इसके साथ भू-राजनीतिक जोखिम के लिए भी तैयार रहना होगा। स्वदेशी स्वच्छ ऊर्जा, विनिर्माण, भंडारण और खनिज प्रसंस्करण क्षमता विकसित करने वाला देश बाहरी झटकों का बेहतर सामना कर सकेगा। मौजूदा अनिश्चितता की स्थिति में यह एक छिपा रणनीतिक अवसर है और भारत को तत्काल कार्रवाई कर इस क्षण को ऊर्जा संप्रभुता की दिशा में निर्णायक बदलाव लाना होगा।
(लेखक एनआईआईटी यूनिवर्सिटी के चांसलर, फेयरफैक्स सेंटर फॉर फ्री एंटरप्राइज के चेयरमैन, जी20 के पूर्व शेरपा तथा नीति आयोग के पूर्व सीईओ हैं। ये उनके निजी विचार हैं)