लंबे समय से एक महत्त्वपूर्ण सरकारी इमारत रहा नई दिल्ली के राजेंद्र प्रसाद रोड पर मौजूद शास्त्री भवन जल्द ही ध्वस्त किए जाने के कगार पर पहुंच चुका है। हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, इमारत के मुख्य भाग में पिछले 60 वर्षों से मौजूद प्रसिद्ध चित्रकार और वास्तुकार सतीश गुजराल के भित्ति-चित्रों को भी अब नया ठिकाना तलाशना पड़ेगा। शास्त्री भवन में कार्यरत रहे हजारों कर्मचारियों, यहां आने वाले आगंतुकों और पत्रकारों की यादों में यह भवन लंबे समय तक जीवित रहेगा, भले ही इसके भीतर स्थित लगभग एक दर्जन मंत्रालय और विभाग अब सेंट्रल विस्टा के आधुनिक कार्यालयों में स्थानांतरित हो रहे हैं।
सात मंजिला शास्त्री भवन को अक्सर एक पुराने और जर्जर सरकारी कार्यालय के रूप में देखा जाता था। यह उन भव्य सत्ता-केंद्रों जैसा नहीं था जिनकी कल्पना आमतौर पर की जाती है। फिर भी इसकी एक अलग पहचान थी। अन्य सरकारी भवनों में जहां आमतौर पर एक ही क्षेत्र से संबंधित मंत्रालय होते हैं, वहीं भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के नाम पर बने इस भवन से कई मंत्रालयों का संचालन होता था। इनमें सूचना एवं प्रसारण, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस, कॉरपोरेट कार्य, कोयला, शिक्षा, कानून एवं न्याय, खेल एवं युवा मामले, जनजातीय कार्य तथा महिला एवं बाल विकास जैसे मंत्रालय शामिल हैं।
कई मंत्रालयों का एक ही भवन में होना शास्त्री भवन को एक लोकतांत्रिक और जीवंत स्वरूप देता था। यही कारण था कि यह अनेक कहानियों और घटनाओं का साक्षी बना। विभिन्न क्षेत्रों की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों के लिए यह किसी सपने से कम नहीं था। कुछ वर्ष पहले तक वे आसानी से एक मंजिल से दूसरी मंजिल और एक कमरे से दूसरे कमरे तक पहुंच सकते थे। कई बार दिन के अंत तक उनके पास कई महत्त्वपूर्ण समाचार होते थे।
पत्रकारों के लिए यह जानना भी जरूरी होता था कि कोई मंत्री या वरिष्ठ अधिकारी किस लिफ्ट का उपयोग करता है। कई बार केवल एक छोटी-सी पुष्टि ही किसी खबर को अगले दिन के अखबार के पहले पन्ने तक पहुंचा देती थी। शास्त्री भवन में आने वाले प्रभावशाली लोगों पर नजर रखना भी अपेक्षाकृत आसान था क्योंकि यहां कई ऐसे रास्ते, कोने और गलियारे थे जहां से बिना अधिक ध्यान आकर्षित किए, आवाजाही की जा सकती थी। उदाहरण के तौर पर कोई व्यक्ति यह जता सकता था कि वह कोयला मंत्रालय की ओर जा रहा है जबकि वास्तव में उसे कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय के किसी कमरे में जाना होता था।
भवन की कमजोर और पुरानी होती जा रही व्यवस्थाएं भी कभी-कभी अप्रत्याशित घटनाओं को जन्म देती थीं। एक बार मुंबई के एक बड़े उद्योगपति अपने निजी विमान से एक केंद्रीय मंत्री से मिलने आए। मंत्री अपने आवास पर उद्योगपतियों से मुलाकात नहीं करते थे इसलिए शास्त्री भवन में बैठक तय हुई। उद्योगपति अपने सहयोगियों के साथ मंत्री को नई कारोबारी योजना की जानकारी देने के लिए पहुंचे। लेकिन उनके लिए निर्धारित लिफ्ट अचानक खराब हो गई। ऐसे में उन्हें अपनी पूरी टीम के साथ सीढ़ियां चढ़कर पांचवीं मंजिल पर मौजूद मंत्री के कार्यालय तक पहुंचना पड़ा। दिलचस्प बात यह रही कि वापसी के समय वह लिफ्ट फिर से चलने लगी।
दो दशक से अधिक समय पहले जब मीडिया जगत के दिग्गज रूपर्ट मर्डोक स्टार टीवी की विस्तार संबंधी योजनाओं पर चर्चा करने के लिए सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधिकारियों से मिलने शास्त्री भवन पहुंचे थे तब उनके आने की खबर से काफी हलचल थी। भारतीय और विदेशी मीडिया के अनेक पत्रकार उनके पीछे-पीछे चल रहे थे। हालांकि मर्डोक ने एक शब्द भी नहीं कहा। यहां कई बार बॉलीवुड की बड़ी हस्तियां भी सेंसर बोर्ड की मंजूरी या नई परियोजनाओं के सिलसिले में दिखाई देती थीं जिनमें तीनों खान सितारे भी शामिल थे। लेकिन कुछ असामान्य घटनाओं ने भी इस भवन को खास बनाया।
उदाहरण के तौर पर जब डैन ब्राउन के उपन्यास ‘द दा विंची कोड’ पर आधारित फिल्म को लेकर भारत में विरोध प्रदर्शन हुए, तब देश के प्रमुख कैथलिक पादरी, इसके समाधान के लिए शास्त्री भवन में एकत्र हुए थे। इसी तरह, जब कंडीशनल एक्सेस सिस्टम (सीएएस) को लेकर विवाद अपने चरम पर था, तब देश के कई बड़े केबल ऑपरेटरों ने शास्त्री भवन को लगभग अपना दूसरा घर बना लिया था।
कई वर्षों तक शास्त्री भवन को एक सूत्र में बांधे रखने में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका विभिन्न मंत्रालयों से जुड़े सूचना अधिकारियों (आईओ) की रही। मीडिया जगत के लिए इनमें से कई अधिकारी परिचित और भरोसेमंद नाम बन चुके थे।
पत्रकारों के लिए उनसे नियमित संपर्क और मुलाकातें लगभग दैनिक कार्य का हिस्सा थीं। छह दशकों तक शास्त्री भवन की पहली मंजिल पर मौजूद उनके कार्यालय मीडिया और नीति-निर्माताओं के बीच एक महत्त्वपूर्ण सेतु का काम करते रहे। वे पत्रकारों को भवन की ऊपरी मंजिलों में बैठे अधिकारियों और अन्य महत्वपूर्ण नीति-निर्माताओं तक पहुंचाने का माध्यम थे। हालांकि अब इनमें से कई अधिकारी कुछ ही दूरी पर रायसीना रोड पर मौजूद राष्ट्रीय मीडिया केंद्र में स्थानांतरित हो चुके हैं, फिर भी उनका शास्त्री भवन से जुड़ाव बना हुआ है।
शास्त्री भवन की पहली मंजिल पर मौजूद सम्मेलन कक्ष भी अपनी विशेष पहचान रखता था। यह स्थान मंत्रियों द्वारा आयोजित कैबिनेट से जुड़ी प्रेस ब्रीफिंग और इसके बाद मिलने वाले नाश्ते के लिए मशहूर था। कुछ वर्ष पहले ये कैबिनेट ब्रीफिंग भी राष्ट्रीय मीडिया केंद्र में स्थानांतरित कर दी गईं।
अब आखिरकार मंत्रालय कर्तव्य पथ पर मौजूद अपने नए कार्यालयों में स्थानांतरित होने वाले हैं ऐसे में शास्त्री भवन को याद करना शायद इस तथ्य का उल्लेख किए बिना अधूरा रहेगा कि कई प्रधानमंत्रियों ने ऐसे मंत्रालयों का अतिरिक्त प्रभार संभाला था, जिनके कार्यालय इसी भवन में मौजूद थे। निश्चित रूप से अब एक युग का अंत हो रहा है और अब सबकी राहें नए पते की ओर बढ़ रही हैं।