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सोलहवें वित्त आयोग की रिपोर्ट जमा: आय में अंतर और बढ़ते कर्ज की खाई पाटना जरूरी

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रिपोर्ट को अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया है, हालांकि उम्मीद है कि इसे 2026 के बजट सत्र में संसद के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा

Last Updated- November 20, 2025 | 9:54 PM IST
India

सोलहवें वित्त आयोग ने इस सप्ताह अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। रिपोर्ट को अब तक सार्वजनिक नहीं किया गया है, हालांकि उम्मीद है कि इसे 2026 के बजट सत्र में संसद के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। सोलहवें वित्त आयोग की अनुशंसाएं अप्रैल 2026 से शुरू होने वाले पांच वर्ष के लिए होंगी। ये अनुशंसाएं केंद्र और राज्यों के बीच कर राजस्व के वितरण को आकार देने के अलावा विभिन्न श्रेणियों के तहत राज्यों के बीच फंड आवंटन से संबंधित होंगी। इस संबंध में यह बात ध्यान देने लायक है कि दक्षिण भारत के कई राज्यों ने अपनी घटती हिस्सेदारी को लेकर चिंता जताई है।

इसी समाचार पत्र में प्रकाशित एक हालिया विश्लेषण दिखाता है कि केंद्र सरकार के कर बंटवारे में दक्षिण भारत के पांच राज्यों की संयुक्त हिस्सेदारी 2010-11 के 19 फीसदी से घटकर 2025-26 में 16 फीसदी रह गई। ऐसे में संभव है कि यह मुद्दा फिर से उठे क्योंकि सोलहवें वित्त आयोग की अनुशंसाओं में अतीत से किसी खास बदलाव की बात नहीं कही गई है।

दक्षिण के राज्यों की चिंताएं समझी जा सकती हैं, लेकिन एक संघीय ढांचे में हमेशा यह उम्मीद रहेगी कि जो राज्य पिछड़ रहे हैं उन्हें मदद पहुंचाई जाएगी और यह सुनिश्चित किया जाएगा कि अधिक समतापूर्ण विकास संभव हो सके। इसके अलावा आंकड़े दिखाते हैं कि प्रति व्यक्ति आधार पर दक्षिण भारत के राज्यों के संसाधन बेहतर हैं।

उदाहरण के लिए चालू वर्ष में केरल की प्रति व्यक्ति व्यय 86,000 रुपये से अधिक है, बिहार में यह केवल 24,000 रुपये के करीब है। ध्यान देने वाली बात है कि 2020-21 और 2025-26 के बीच देश के सबसे गरीब राज्यों में प्रति व्यक्ति व्यय आय बढ़कर करीब दोगुना हो गया है। हालांकि इसका आधार कम रहा है जबकि अमीर दक्षिण भारतीय राज्यों में यह समेकित स्तर पर 59 फीसदी तक बढ़ा है।

यद्यपि, व्यय में तेज वृद्धि आय में तेज वृद्धि में परिवर्तित नहीं हुई है। दक्षिणी राज्यों की औसत प्रति व्यक्ति आय 2009-10 में गरीब राज्यों की तुलना में 2.1 गुना थी, जो अब बढ़कर 2.8 गुना हो गई है। इससे संकेत मिलता है कि गरीब राज्यों को विकास कार्य करने में सक्षम बनाने के लिए कर बंटवारे में अधिक हिस्सेदारी आवश्यक हो सकती है, लेकिन यह तीव्र आर्थिक वृद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है। तीव्र आर्थिक वृद्धि ही प्रति व्यक्ति आय बढ़ाकर इस अंतर को कम करने में मदद कर सकती है।

यह एक जटिल नीतिगत चुनौती पेश करता है जिससे पिछड़ रहे राज्यों और केंद्र सरकार दोनों को मिलकर जूझना होगा। क्योंकि अकेले राजकोषीय हस्तांतरण शायद जरूरी बदलाव लाने में संभव न हो सके। इसका कोई आसान उत्तर नहीं है। यह कहा जा सकता है कि इन क्षेत्रों की ओर और अधिक निजी निवेश लाया जा सकता है लेकिन कारोबारी इकाइयां शायद बेहतर राज्यों में ही निवेश करना पसंद करें।

ऐसा इसलिए क्योंकि उन राज्यों में उन्हें बेहतर माहौल मिल सकता है। ऐसे में यह महत्त्वपूर्ण होगा कि पिछड़ रहे राज्य अपने संसाधनों का इस्तेमाल ज्यादा बेहतर तरीके से करें और निवेश जुटाने के लिए जरूरी अधोसंरचना तैयार करें। उन्हें कारोबारियों की चिंताओं को भी सक्रियता से दूर करना होगा ताकि कारोबारी सुगमता में सुधार किया जा सके।

केंद्र और राज्यों के समक्ष एक और चुनौती है। कुछ राज्यों पर बहुत अधिक ऋण है, जो विकास की संभावनाओं को प्रभावित कर सकता है। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 19 राज्यों में बकाया देनदारियां सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के 30 फीसदी से अधिक हैं, जिनमें केरल भी शामिल है। पंजाब और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में यह जीएसडीपी के 40 फीसदी से भी अधिक है।

इस समस्या से निपटने के लिए एक तंत्र की आवश्यकता होगी। राज्यों में अधिक ऋण से सामान्य सरकारी ऋण और उधारी की जरूरतें बढ़ जाती हैं, जिससे पूरी अर्थव्यवस्था के लिए धन की लागत प्रभावित होती है। राज्यों के बीच आय अंतर को कम करना और ऊंचे स्तर के ऋण मसले का समाधान करना प्रमुख नीतिगत चुनौतियां हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि वित्त आयोग इन मुद्दों से कैसे निपटता है।

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First Published - November 20, 2025 | 9:54 PM IST

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