इस सप्ताह जारी वित्त वर्ष 2025-26 के केंद्र सरकार की वित्तीय स्थिति के अस्थायी आंकड़ों की सबसे प्रमुख बात स्वाभाविक रूप से राजकोषीय घाटे से संबंधित है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण लगातार पांचवे वर्ष राजकोषीय घाटे के लक्ष्य पर कायम रहने में सफल रही हैं। कुछ साल तो उन्होंने इसे बेहतर ही किया है। उनके वित्त मंत्री पद के आरंभिक दो वर्षों में जरूर वास्तविक राजकोषीय घाटे के आंकड़े तय लक्ष्य से अधिक रहे थे। बाद के वर्षों में वे हर बार राजकोषीय सुदृढ़ीकरण के अपने वादे पर खरी उतरी हैं। वर्ष 2025-26 में राजकोषीय घाटे का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 4.4 फीसदी के बराबर रहना भी इसी बात की पुष्टि करता है।
कोविड महामारी के बाद सरकारी व्यय पर जो सख्ती बरती गई थी उसमें थोड़ी ढील भी इन आंकड़ों में साफ दिखाई देती है। पश्चिम एशिया संकट के चलते भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने मौजूद चुनौतियों को देखते हुए सरकार को इस वर्ष अपने खर्चों में और अधिक ढील देनी पड़ सकती है। कोविड के बाद सरकार का व्यय तेजी से बढ़ा था। 2019-20 में यह लगभग 27 लाख करोड़ रुपये था जो जीडीपी के 13.4 फीसदी के बराबर था। परंतु 2020-21 में एक ही वर्ष में यह 30 फीसदी से अधिक बढ़कर करीब 35 लाख करोड़ रुपये हो गया यानी जीडीपी के 17.7 फीसदी के बराबर। अगर तुलना के लिए देखें तो 2019-20 में जब कोविड का असर नहीं था तब व्यय वृद्धि इसके पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 16 फीसदी रही थी।
हालांकि अगले कुछ वर्षों में सरकार की वार्षिक व्यय वृद्धि की दर एकल अंकों तक सीमित रही। केवल वर्ष 2022-23 ही इसका अपवाद रहा। जीडीपी के फीसदी के रूप में केंद्र सरकार का कुल व्यय हर साल घटता गया और 2025-26 में यह 14.2 फीसदी तक पहुंच गया। लेकिन पिछले दो वर्षों में व्यय वृद्धि में हल्की बढ़ोतरी देखी गई। 2025-26 में कुल व्यय में वार्षिक वृद्धि 5.4 फीसदी रही जबकि 2024-25 में यह 4.7 फीसदी थी। व्यय के स्वरूप में बदलाव भी एक ऐसा रुझान है जिसकी अनदेखी करना आसान नहीं है। पूंजीगत व्यय जीडीपी के फीसदी के रूप में लगातार बढ़ता रहा और 2019-20 में 1.67 फीसदी से बढ़कर 2024-25 में 3.31 फीसदी तक पहुंच गया। लेकिन 2025-26 पहला वर्ष था जब इसमें हल्की गिरावट आई और यह 3.1 फीसदी पर आ गया। वार्षिक वृद्धि दर के लिहाज से भी यह 2025-26 में घटकर 1.62 फीसदी रह गई जबकि इसके पिछले पांच वर्षों में वृद्धि दर 11 फीसदी से 39 फीसदी के बीच रही थी।
दिलचस्प बात यह है कि राजस्व व्यय वृद्धि ने उलटा रुझान दिखाया। कोविड काल की बढ़ोतरी के बाद राजस्व व्यय को नियंत्रित किया गया और 2023-24 में इसकी वार्षिक वृद्धि महज 1.2 फीसदी तथा 2024-25 में 3.12 फीसदी रही। लेकिन 2025-26 में स्थिति बदली और राजस्व व्यय को 6.4 फीसदी तक बढ़ने दिया गया हालांकि जीडीपी के फीसदी के रूप में यह लगभग 11 फीसदी पर ही रहा जो कोविड वर्ष 2020-21 में दर्ज लगभग 18 फीसदी से काफी कम है।
राजस्व मोर्चे पर जो कुछ हुआ वह दिलचस्प है। केंद्र सरकार अपनी गैर कर प्राप्तियों में सुधार करने में बहुत कम प्रगति कर पाई है। पिछले सात वर्षों में गैर कर राजस्व जीडीपी के 1 फीसदी से 1.9 फीसदी के बीच ही रहा है। सरकार के गैर कर राजस्व स्रोतों में विविधता लाने में भी कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई है। यह अब भी भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा केंद्र सरकार को हस्तांतरित अधिशेष पर अत्यधिक निर्भर है। पिछले तीन वर्षों में सरकार के गैर कर राजस्व में रिजर्व बैंक के अधिशेष का हिस्सा 42 से 52 फीसदी के बीच रहा है। इस निर्भरता के कई अन्य निहितार्थ हैं और सरकार के लिए आगे का रास्ता यही है कि वह गैर कर राजस्व जुटाने के नए क्षेत्रों की तलाश करे।
कर राजस्व के रुझान और भी चौंकाने वाले हैं जो कई लोगों को सोचने पर मजबूर कर सकते हैं। वर्ष 2025-26 में सकल कर संग्रह लगभग 40.24 लाख करोड़ रुपये रहा जो पिछले वर्ष की तुलना में केवल 6 फीसदी बढ़ा। यह वृद्धि दर पिछले वर्ष दर्ज 8.6 फीसदी की नॉमिनल जीडीपी वृद्धि से कम थी। कॉरपोरेशन टैक्स ने सकल कर संग्रह की वृद्धि दर को सहारा दिया, जो 2025-26 में 11 फीसदी बढ़कर लगभग 11 लाख करोड़ रुपये हो गया। लेकिन चिंताजनक बात यह रही कि व्यक्तिगत आयकर संग्रह 2025-26 में लगभग 11.83 लाख करोड़ रुपये ही रहा। यह 2024-25 के स्तर से लगभग समान है। आखिर गड़बड़ कहां हुई?
गौर करें कि 2025-26 के लिए व्यक्तिगत आयकर संग्रह का संशोधित अनुमान लगभग 13.12 लाख करोड़ रुपये रखा गया था। लेकिन अनंतिम वास्तविक अनुमान इसे घटाकर 2024-25 के स्तर पर ही ले आया। क्या यह सरकार के व्यक्तियों पर प्रभावी कर बोझ कम करने के निर्णय के कारण हुआ, या फिर प्रतिभूति लेनदेन कर के संग्रह में तेज गिरावट के चलते?
वर्ष 2025-26 के बजट में सरकार ने नए कर ढांचे के तहत निवासी व्यक्तियों के लिए आयकर छूट सीमा बढ़ा दी जिसके परिणामस्वरूप जिनकी वार्षिक कुल आय लगभग 12 लाख रुपये तक थी उन्हें कर नहीं देना पड़ा। वेतनभोगी करदाताओं के लिए यह कर-मुक्त सीमा मानक कटौती 75,000 रुपये को ध्यान में रखते हुए लगभग 12.75 लाख रुपये हो गई। इसके अतिरिक्त पुराने कर ढांचे में उपलब्ध सीमांत राहत को नए कर ढांचे में भी 12 लाख रुपये से अधिक आय पर लागू किया गया। महत्त्वपूर्ण रूप से आयकर छूट सीमा को 12 लाख रुपये तक बढ़ाने का अर्थ यह हुआ कि लगभग 1 करोड़ करदाता जो पहले 20,000 से 80,000 रुपये तक आयकर देते थे अब कोई कर नहीं दे रहे। इसका मतलब यह हुआ कि व्यक्तिगत करदाताओं का कर आधार लगभग 12 फीसदी तक घट गया।
आयकर छूट सीमा में वृद्धि नए कर ढांचे में 2023-24 से लागू की गई थी जिसके तहत 7 लाख रुपये तक की कुल आय वाले निवासी व्यक्तियों को कोई आयकर नहीं देना पड़ता था। इसी सिद्धांत को 2025-26 के बजट में आगे बढ़ाया गया। यह कदम देश के मध्यम वर्ग को खुश करने के उद्देश्य से उठाया गया था लेकिन इससे कर आधार का एक बड़ा हिस्सा खोने का राजकोषीय जोखिम भी पैदा हुआ (वे रिटर्न दाखिल कर सकते हैं, लेकिन उन्हें कर चुकाना आवश्यक नहीं है)। प्रतिभूति लेनदेन कर की कमजोर वसूली ने भी 2025-26 में आयकर प्राप्तियों को स्थिर बनाए रखने में योगदान दिया होगा लेकिन इसकी भूमिका अपेक्षाकृत छोटी रही।
वर्ष 2025-26 के अनंतिम वास्तविक आंकड़ों में व्यय और राजस्व के रुझान सरकार के लिए स्पष्ट सबक हैं जो अब 2026-27 में कठिन राजकोषीय चुनौतियों का सामना कर रही है। घाटे पर नियंत्रण रखने के लिए व्यय को रोकना अब विकल्प नहीं है। 2026-27 में व्यय का दबाव बढ़ना तय है और कोविड वर्ष की तरह सरकार को अपने व्यय में वृद्धि को स्वीकार करने पर विचार करना चाहिए। राजकोषीय घाटे को सब्सिडियों पर कड़ी निगरानी रखकर नियंत्रित किया जाना चाहिए, ताकि पेट्रोल, डीजल और उर्वरक जैसी वस्तुओं के खुदरा मूल्य में आवश्यक वृद्धि की जा सके। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि पिछले वर्ष आयकर संग्रह जिस तरह प्रभावित हुआ उसे देखते हुए आयकर छूट योजना के तहत दी जा रही कुछ रियायतों को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने पर विचार करने की आवश्यकता है।