प्रधानमंत्री ने हाल ही में नागरिकों से ईंधन, खाद्य तेल की खपत और विदेश यात्रा कम करने का आह्वान किया है। इसके साथ ही भारतीय अर्थव्यवस्था पर पश्चिम एशिया संकट के असर के बारे में बहस छिड़ गई है। चार साल तक पेट्रोल-डीजल की कीमतें जस की तस रखने वाली सरकारी तेल कंपनियों ने भी आखिरकार पिछले पखवाड़े में दाम बढ़ाना शुरू कर ही दिया। ऐसे में कई महीनों से 4 फीसदी के नीचे चल रही मुद्रास्फीति में भी इजाफा होने की संभावना है।
बढ़ती कीमतों के कारण आम परिवारों का बजट बिगड़ रहा है और मंद पड़ी अर्थव्यवस्था में कमाई धीरे बढ़ने के कारण उपभोक्ता वस्तु क्षेत्र भी मांग में कमी के लिए कमर कस रहा है और कुछ क्षेत्रों में तो मांग एकदम बैठ जाने की आशंका है। व्यवसाय अपने खर्चों, आपूर्ति श्रृंखलाओं, बिक्री और मांग पूर्वानुमानों पर दोबारा विचार कर रहे हैं और नए सिरे से बनी कुछ नीतियां बाजार में पहले ही नजर आने लगी हैं, जैसे कीमतों में वृद्धि, उत्पाद और पैकेजिंग में बदलाव, डिलिवरी और नए उत्पाद लाने में देर।
आवश्यक वस्तुओं की कीमतें पहले ही 2 प्रतिशत से 7 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं। यह भी तब है, जब तेल कंपनियों को पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस को बाजार मूल्य से कम पर बेचने के कारण हो रहे घाटे की एक तिहाई भरपाई ही हालिया मूल्य वृद्धि से हो पा रही है। तेल विपणन कंपनियों को बिक्री पर हर महीने 30,000 करोड़ रुपये का घाटा हो रहा है और अगर उसका आधा बोझ भी उपभोक्ताओं पर डाला जाए तो घरों के बजट पर सालाना 1.75 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की चोट पड़ेगी। कच्चा तेल जितना महंगा होता है, अमेरिका में पेट्रोल पंप पर दाम उतने ही बढ़ा दिए जाते हैं। वहां उपभोक्ताओं ने पेट्रोल-डीजल पर पिछले साल जितनी रकम खर्च की थी, इस साल 28 फरवरी से अभी तक उससे 45 अरब डॉलर (लगभग 4.25 लाख करोड़ रुपये) ज्यादा खर्च कर दिए हैं और इसकी वजह अमेरिका-ईरान युद्ध है। हमने ईंधन महंगा होने पर दूसरे और तीसरे स्तर के प्रभावों की गिनती तो अभी तक शुरू भी नहीं की है, जिसकी वजह से जल्द ही हर तरफ महंगाई बढ़ सकती है।
हालांकि इस बात पर मतभेद है कि पश्चिम एशिया संकट से मांग में कितनी गंभीर मंदी हो सकती है मगर अक्सर नजरअंदाज कर दी जाने वाली एक बात पर इस बार नजर रखनी चाहिए और वह है शेयर बाजार की संपत्ति पर इसका असर। देश में 24 करोड़ से अधिक डीमैट/ट्रेडिंग खाते हैं और हर महीने लगभग 30 लाख नए खाते जुड़ रहे हैं। यह बात अलग है कि कई व्यक्ति अलग-अलग ऑनलाइन/फिजिकल ब्रोकरों के पास कई खाते खोल लेते हैं। सरकारी आंकड़े लें या किसी निजी अनुसंधान फर्म के आंकड़े देखें, भारतीय शेयर बाजार में यूनीक रजिस्टर्ड निवेशकों की संख्या 12.7 से 13 करोड़ ही निकलती है। इसमें से लगभग 6 करोड़ केवल म्युचुअल फंड में हैं। यह कोई छोटी संख्या नहीं है। यह भारत की आबादी का लगभग 10 प्रतिशत है! इस समय सक्रिय यूनीक निवेशकों करीब 4.5 करोड़ हैं और यह बहुत बड़ा आंकड़ा है क्योंकि वे देश के शीर्ष आय और उपभोग वर्ग का हिस्सा हैं।
साल की शुरुआत से अब तक शेयर बाजार की संपत्ति करीब 40 लाख करोड़ रुपये घट चुकी है। यह बाजार पूंजीकरण का लगभग दसवां हिस्सा है और देश में म्युचुअल फंड जो संपत्ति संभाल रहे हैं, उसकी यह करीब आधी है। बेशक पूरे 40 लाख करोड़ रुपये की चोट खुदरा निवेशकों को ही नहीं लगी है। लेकिन बाजार पूंजीकरण में देसी संस्थागत निवेशकों का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा है, जिसमें से एक-तिहाई से ज्यादा खुदरा निवेशकों का है, जो उन्होंने म्युचुअल फंडों के जरिये लगाया है। इसके अलावाबाजार में 10 प्रतिशत शेयर सीधे खुदरा निवेशकों के ही पास हैं और इस तरह आपको पता लग जाता है कि शेयर बाजार में भारतीय परिवारों की दौलत करीब 8-9 लाख करोड़ रुपये कम हो गई है।
इस आंकडे के मायने समझने के लिए देश के प्रमुख उपभोक्ता क्षेत्रों के आकार पर नजर डालिए। साबुन, टूथपेस्ट, शैंपू, घरेलू सफाई के उत्पाद और पैकेज्ड खाद्य पदार्थ जैसी रोजमर्रा के इस्तेमाल की वस्तुएं बनाने वाला एफएमसीजी क्षेत्र लगभग 20-25 लाख करोड़ रुपये का है। देश का पूरा वाहन बाजार लगभग 22 लाख करोड़ रुपये का है। संगठित रिटेल क्षेत्र 30 से 33 लाख करोड़ रुपये का है और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स तथा इलेक्ट्रॉनिक्स का बाजार लगभग 5–6 लाख करोड़ रुपये का है।
एफएमसीजी क्षेत्र की प्रमुख कंपनियों ने इस कैलेंडर वर्ष में वॉल्यूम (बिकने वाले माल की संख्या या मात्रा) वृद्धि का अपना अनुमान पहले ही 5 प्रतिशत से घटाकर 3 प्रतिशत कर लिया है। कंज्यूमर ड्यूरेबल्स के निर्माता भी मांग की कठिन स्थिति के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं, जबकि कच्चे माल और मालभाड़े की बढ़ती लागत के कारण उन्हें कीमतें कई बार बढ़ानी पड़ रही हैं।
दिलचस्प है कि वाहन कंपनियों को 2026-27 में मांग की अच्छी खासी उम्मीद है क्योंकि उनके पास पहले से काफी बुकिंग पड़ी हैं और अप्रैल तक बिक्री भी अच्छी रही है। लेकिन संपन्न उपभोक्ताओं की वित्तीय संपत्ति में करीब 8-9 लाख करोड़ रुपये की कमी का असर मझोली से ऊंची कीमत वाली कार, बाइक, मकान की बिक्री पर और देश-विदेश में महंगी छुट्टियों पर नहीं पड़ेगा, यह मानना जोखिम भरा हो सकता है। मॉनसून कमजोर रहने के पूर्वानुमान और ग्रामीण हौसले तथा आय पर इसके प्रतिकूल प्रभाव तथा बढती खाद्य कीमतों को देखकर ऐसा लग रहा है कि देश के उपभोक्ता बाजार के लिए बड़ी मुश्किल आने वाली है।