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केवल बाहरी खतरा नहीं, भीतर भी दें ध्यान

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पश्चिम एशिया में छिड़े संघर्ष के केंद्र और राज्य सरकारों पर होने वाले वित्तीय असर पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। बता रहे हैं एके भट्टाचार्य

Last Updated- May 21, 2026 | 9:00 AM IST
West Asia crisis
Representational Image

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष को ध्यान में रखते हुए भारतीयों को मितव्ययिता संबंधी कई कदम उठाने की सलाह दी है। अब केंद्र और राज्य सरकारों को ऐसी रणनीतियां तैयार करनी होंगी जिनकी मदद से कच्चे तेल के बढ़े हुए दामों के कारण उनकी वित्तीय स्थिति पर पड़ने वाले राजकोषीय बोझ का प्रबंधन किया जा सके। भारत को केवल बाहरी खाते की समस्या ही नहीं बल्कि उतनी ही गंभीर राजकोषीय चुनौती का भी सामना करना पड़ रहा है।

मितव्ययिता के उपायों को चाहे जिस रूप में अपनाया जाए लेकिन उनसे विदेशी मुद्रा संसाधनों को बचाने और सरकार के बाहरी खाते के प्रबंधन में मदद मिलनी चाहिए। बढ़ते चालू खाता घाटे और पूंजी के बहिर्प्रवाह यानी विदेश जाने से भुगतान संतुलन के अंतर को पाटने के लिए केंद्र सरकार को समन्वित प्रयास करने होंगे। यह अंतर निश्चित रूप से और बढ़ेगा। हालांकि राजकोषीय चुनौती संभावित बाहरी खाते के संकट से अलग है लेकिन दोनों आपस में संबद्ध हैं।

पिछले कुछ दिनों में केंद्र सरकार ने कई कदम उठाने की इजाजत दी है मसलन पेट्रोल, डीजल और कंप्रेस्ड नैचुरल गैस (सीएनजी) की खुदरा कीमतों में दो बार इजाफा किया गया। उसने केंद्रीय मंत्रालयों और सरकारी बैंकों सहित सरकारी उपक्रमों को भी विदेशी मुद्रा बचाने के उपाय करने के निर्देश दिए हैं। इन उपायों की बदौलत तेल कंपनियों को अपने कुछ घाटे की भरपाई करने में मदद मिलेगी। यह घाटा उन्हें कच्चे तेल की बढ़ी हुई कीमतों की वजह से हो रहा है।

राज्य सरकारों ने भी मितव्ययिता के उपायों की घोषणा की है। उनमें से कुछ ने एविएशन टर्बाइन फ्यूल पर कर घटा दिए हैं जिससे उनकी राजस्व आय प्रभावित होगी। अधिकांश राज्यों ने अभी तक अपने व्यय या राजस्व प्रबंधन की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए हैं। जाहिर है कि राज्यों ने यह साबित करने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए हैं कि वे आने वाले संकट की गंभीरता को पूरी तरह समझते हैं। लेकिन राज्यों के सामने मौजूद चुनौतियों के पैमाने का आकलन करने से पहले यह उपयोगी होगा कि केंद्र सरकार के राजकोषीय बोझ में संभावित वृद्धि का अंदाजा लगाया जाए।

एक फरवरी को पेश किए गए 2026-27 के केंद्रीय बजट में राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के 4.3 फीसदी तक सीमित रखने का लक्ष्य तय किया है। इस लक्ष्य को तय करते समय पश्चिम एशिया के संघर्ष के संभावित प्रभाव को ध्यान में नहीं रखा जा सका था। यह निश्चित रूप से राजस्व और व्यय दोनों को प्रभावित करेगा।

पहले राजस्व पर प्रभाव की बात करते हैं। 26 मार्च को केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की। इसकी वजह से 2026-27 में एक लाख करोड़ रुपये राजस्व का नुकसान होगा। राज्य इस राजकोषीय बोझ से बच सके क्योंकि शुल्क में कमी पूरी तरह एक विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क रियायत से आई जिसकी प्राप्तियां विभाजन किए जाने वाले संग्रह का हिस्सा नहीं हैं।

व्यय की बात करें तो केंद्र सरकार को उर्वरक सब्सिडी का बोझ उठाना पड़ रहा है जिसे 2026-27 के बजट में लगभग 1.7 लाख करोड़ रुपये आंका गया था। अब यह सब्सिडी बिल बढ़कर लगभग 2.4 लाख करोड़ रुपये होने जा रहा है। इसका अर्थ यह है कि 70,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त राजकोषीय बोझ पड़ेगा।

कुछ अन्य कदम भी हैं जो सरकार की वित्तीय स्थिति पर राजकोषीय दबाव बढ़ाएंगे। 28 फरवरी को पश्चिम एशिया संघर्ष शुरू होने के कुछ ही दिनों के भीतर वित्त मंत्रालय ने घोषणा की कि उसने एक एहतियाती कदम के रूप में आर्थिक स्थिरीकरण कोष में लगभग एक लाख करोड़ रुपये आवंटित किए हैं। इसका उद्देश्य वैश्विक प्रतिकूल परिस्थितियों, आपूर्ति श्रृंखला व्यवधानों, विशिष्ट क्षेत्रों में अचानक तनाव, या किसी भी ऐसी घटना से निपटने के लिए आपातकालीन सुरक्षा कवच तैयार करना था जिसका राजकोषीय प्रभाव महत्त्वपूर्ण हो सकता है।

आर्थिक मामलों के विभाग ने 2025-26 के संशोधित अनुमान में आर्थिक स्थिरीकरण कोष के लिए प्रावधान किया था और इस मद के तहत लगभग 50,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे। फरवरी 2026 के अंत तक इस कोष से बहुत कम राशि का उपयोग हुआ था। ऐसा लगता है कि इस कोष के लगभग एक लाख करोड़ रुपये के आवंटन को आवश्यकता अनुसार आर्थिक मामलों का विभाग ही प्रबंधित करेगा। आवश्यक प्रावधान संसद द्वारा अनुमोदित अनुदानों की अनुपूरक मांगों के माध्यम से किए जाएंगे। यह विवेकपूर्ण राजकोषीय प्रबंधन का संकेत है, इसके बावजूद यह सरकार की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ाता है।

इसके अलावा, सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्यमों (एमएसएमई) तथा एयरलाइंस के लिए एक ऋण गारंटी योजना भी है, जो पश्चिम एशिया संघर्ष से प्रभावित इकाइयों को वित्तीय सहायता प्रदान करेगी। इस योजना के तहत लगभग 2.55 लाख करोड़ रुपये मूल्य के ऋणों की गारंटी दी जाएगी। सरकार के लिए इस योजना की राजकोषीय लागत लगभग 18,000 करोड़ रुपये आंकी गई है।

पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्यात कर से कुछ राजस्व प्राप्त होने के बाद भी, अतिरिक्त व्यय और राजस्व हानि का बोझ लगभग 2.9 लाख करोड़ रुपये रहेगा। यदि भारत की नॉमिनल अर्थव्यवस्था का आकार बजट में अनुमानित लगभग 393 लाख करोड़ रुपये माना जाए तो इससे राजकोषीय घाटा अनुमानित 4.3 फीसदी से 0.73 प्रतिशत अंक और बढ़ सकता है। इस प्रकार, चालू वित्त वर्ष में केंद्र सरकार को जीडीपी के 5 फीसदी से अधिक का राजकोषीय घाटा झेलना पड़ सकता है। यह ज्यादा भी हो सकता है क्योंकि अनुमान है कि गैर-कर राजस्व पर भी असर पड़ेगा। इसके अतिरिक्त, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर राजस्व पर द्वितीयक प्रभाव होंगे। व्यय में होने वाली चूकें नियंत्रित नहीं हो पाएंगी और आर्थिक वृद्धि पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।

इस परिदृश्य में राज्यों की राजकोषीय स्थिति और अधिक जटिल हो जाती है। 2025-26 के लिए, 23 राज्यों ने अपने अस्थायी अनुमान जारी किए हैं जो सभी राज्य बजटों के कुल आकार का लगभग 85 फीसदी हिस्सा हैं। इन 23 राज्यों का संयुक्त राजकोषीय घाटा उनके सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के 3.3 फीसदी से अधिक है। लेकिन कई राज्य पहले ही 3.5 फीसदी घाटे के स्तर को पार कर चुके हैं (आंध्र प्रदेश 4.6 फीसदी, बिहार 6.9 फीसदी, हिमाचल प्रदेश 6 फीसदी, मध्य प्रदेश 4.6 फीसदी, राजस्थान 3.8 फीसदी और तेलंगाना 4.36 फीसदी)।

इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि अधिकांश राज्यों की निर्भरता केंद्र सरकार से करों के बंटवारे पर बहुत अधिक है। यह उनकी स्वयं की कर आय का लगभग आधा है। यदि 2025-26 में उनकी स्वयं की कर आय जीएसडीपी का 6.5 फीसदी थी तो केंद्रीय करों पर उनकी निर्भरता 3.45 फीसदी थी। यदि 2026-27 में बाहरी आर्थिक उथल-पुथल के कारण केंद्र की कर वसूली प्रभावित होती है, तो राज्यों की राजस्व स्थिति भी प्रभावित होगी और उनका राजकोषीय संतुलन सबसे पहले प्रभावित होगा।

इन 23 राज्यों में से कई अपने पूंजीगत व्यय को कम कर सकते हैं (जो 2025-26 में जीएसडीपी का 2.3 फीसदी और इसके पिछले वर्ष 2.4 फीसदी था) ताकि राजकोषीय घाटे के तय लक्ष्य का पालन कर सकें। लेकिन यह समाधान अन्य प्रतिकूल परिणामों को जन्म देगा। एक ऐसा रास्ता जिसे केंद्र सरकार को भी टालना चाहिए। खासकर तब जब निजी क्षेत्र की निवेश दरें अभी तक टिकाऊ रूप से नहीं बढ़ी हैं।

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First Published - May 21, 2026 | 9:00 AM IST

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