Jan Vishwas Bill: वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने शुक्रवार को कहा कि जन विश्वास (प्रावधान संशोधन) विधेयक, 2026 के पारित होने के बाद सरकार छोटे अपराधों से जुड़े करीब 5 करोड़ लंबित मामलों की समीक्षा कर सकती है। उन्होंने अभियोजकों को नए ढांचे के तहत ऐसे मामलों को बंद करने के लिए कदम उठाने के लिए प्रोत्साहित किया। प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए गोयल ने कहा कि नए प्रावधानों के मद्देनजर अभियोजक अदालतों का रुख कर ऐसे मामलों को बंद कराने की पहल कर सकते हैं। इन प्रावधानों का उद्देश्य मामूली नियामकीय उल्लंघनों से जुड़े आपराधिक मामलों को कम करना है।
गोयल ने कहा, “स्थानीय स्तर पर, हम अधिकारियों और अभियोजकों को प्रोत्साहित करते हैं कि वे नए कानून के आधार पर इन मामलों को निपटाने की कोशिश करें। उन्होंने ऐसे मामलों से प्रभावित व्यक्तियों को अभियोजन कार्यालयों से संपर्क करने के लिए प्रोत्साहित किया और कहा कि अधिकारी नए प्रावधानों के तहत कार्रवाई कर सकते हैं और मामलों को बंद कर सकते हैं।
जन विश्वास पहल का मकसद कई केंद्रीय कानूनों में छोटे नियामकीय अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करना है। इसके तहत आपराधिक दंड की जगह सिविल पेनल्टी लागू की जाएगी, जिससे मुकदमों में कमी आएगी और व्यक्तियों व व्यवसायों के लिए अनुपालन (कंप्लायंस) आसान होगा।
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गोयल ने राज्यों से भी इसी तरह के सुधार अपनाने का आग्रह किया। उन्होंने बताया कि 12 राज्यों ने पहले ही राज्य कानूनों के तहत छोटे अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने के लिए जन विश्वास कानून के अपने-अपने संस्करण लागू कर दिए हैं और अन्य राज्यों को भी ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित किया।
उन्होंने यह भी कहा कि केंद्र सरकार सुझावों के लिए खुली है और व्यापक प्रयास के तहत नियामकीय ढांचे को सरल बनाने और मुकदमों को कम करने के लिए अतिरिक्त केंद्रीय कानूनों की समीक्षा करने को तैयार है।
गोयल ने कहा कि सरकार का उद्देश्य उन मामलों में आपराधिक सजा से दूर जाना है, जहां ‘मेंस रिया’ (कानून तोड़ने का जानबूझकर इरादा) नहीं होता, और इसके बजाय अनुपालन-आधारित प्रवर्तन (कंप्लायंस बेस्ड एप्रोच) अपनाना है।
उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में नियामक चेतावनी जारी कर सकते हैं, सुधार नोटिस दे सकते हैं या छोटी पेनल्टी लगा सकते हैं, जो उल्लंघन दोहराए जाने पर बढ़ाई जा सकती है। गंभीर अपराध, जिनसे आम जनता, समाज के किसी विशेष वर्ग या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान होता है, उनमें ही आपराधिक कार्रवाई की जाएगी।
मंत्री ने कहा, “ये सभी हजार धाराएं किसी न किसी रूप में अनिश्चितता, संभावित अनुचित लाभ कमाने और उत्पीड़न का स्रोत थीं। उन्होंने आगे कहा कि कई प्रावधान “औपनिवेशिक मानसिकता” के साथ तैयार किए गए थे जहां न्याय पर दंड को प्राथमिकता दी गई थी।
ये टिप्पणियां संसद द्वारा इस सप्ताह जन विश्वास (प्रावधान संशोधन) विधेयक, 2026 पारित करने के बाद आई हैं, जो नियामक अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने और प्रवर्तन को नागरिक दंड की ओर स्थानांतरित करने के लिए सरकार के सबसे बड़े प्रयासों में से एक है।
यह विधेयक 23 मंत्रालयों द्वारा संचालित 79 केंद्रीय कानूनों के तहत 784 प्रावधानों में संशोधन का प्रस्ताव करता है। इनमें से 717 प्रावधानों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने (डिक्रिमिनलाइज) का प्रस्ताव है, जबकि 67 प्रावधानों में प्रक्रियाओं को सरल बनाने और जीवन को आसान बनाने के लिए बदलाव किए जा रहे हैं।
यह कदम पहले के जन विश्वास (प्रावधान संशोधन) अधिनियम, 2023 पर आधारित है, जिसके तहत 42 केंद्रीय कानूनों के 183 प्रावधानों को जेल की सजा की जगह मौद्रिक दंड (जुर्माने) से बदलकर अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया था।
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भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी ने कहा, “यह विधेयक उद्योग और नीति-निर्माताओं के बीच लंबे समय तक चले रचनात्मक संवाद का परिणाम है और भारत में कारोबार को वास्तव में आसान बनाने के सरकार के संकल्प को दर्शाता है। इन उपायों से व्यवसायों पर अनुपालन का बोझ काफी कम होगा, विवाद समाधान में तेजी आएगी और पहले से दबाव में चल रही न्यायिक व्यवस्था पर मामलों का भार घटेगा।”
गोयल ने कहा कि यह विधेयक निवेशकों का भरोसा बढ़ाने में मदद करेगा, क्योंकि इससे कंपनियों को यह भरोसा मिलेगा कि मामूली अनुपालन चूक के लिए उन्हें आपराधिक कार्रवाई का सामना नहीं करना पड़ेगा।