पुदुच्चेरी को 1962 में केंद्र शासित क्षेत्र घोषित किए जाने के बाद कई दशकों तक उसकी राजनीति को उसके पड़ोसी राज्य तमिलनाडु की राजनीति की नकल माना जाता रहा। यह कुछ हद तक नकल थी भी और नहीं भी। दोनों क्षेत्रों के औपनिवेशिक शासक अलग-अलग थे: तमिलनाडु (तत्कालीन मद्रास प्रांत) में ब्रिटिश और पुदुच्चेरी में फ्रांसीसी। इसका असर भू-राजस्व और स्वामित्व पर पड़ा। मद्रास में रैयतवारी प्रणाली के तहत किसानों पर व्यक्तिगत कर लगाया जाता था, जबकि फ्रांसीसी व्यापार पर कर लगाने पर अधिक निर्भर थे, जिसका पूंजी निर्माण और शासक वर्ग के उदय पर प्रभाव पड़ा।
शासन प्रणाली भी अलग थी। फ्रांसीसी स्थानीय निकायों को महत्त्व देते थे, जबकि ब्रिटिश ऐसा नहीं करते थे। यह एक अलग बात है कि पुदुच्चेरी के भारत का हिस्सा बनने के बाद से लगभग 65 वर्षों में स्थानीय निकाय चुनाव केवल दो बार हुए हैं और हाल ही में एक पूर्व सांसद ने शीघ्र चुनाव के लिए सर्वोच्च न्यायालय से हस्तक्षेप की मांग की है। तमिलनाडु के विपरीत पुदुच्चेरी की राजनीति में जाति प्रमुख कारक नहीं है, हालांकि यहां 6.2 प्रतिशत ईसाई और 6 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। तमिलनाडु में भी लगभग यही संख्या है।
दोनों क्षेत्रों में एक ही भाषा बोली जाती है और पुदुच्चेरी के लोगों में एमजी रामचंद्रन और बाद में जयललिता के प्रति अथाह दीवानगी थी। तमिलनाडु में 1977 में अन्नाद्रमुक के सत्ता में आने से पहले उसकी पहली बड़ी चुनावी जीत (1973 के दिंडीगुल लोकसभा उपचुनाव को छोड़कर) पुदुच्चेरी में हुई थी, जहां उसने 1974 और फिर 1977 में विधानसभा के पहले चुनावों में जीत हासिल की थी।
वर्ष 1979 में अन्नाद्रमुक के प्रति आकर्षण कम होने लगा, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई और तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन के बीच पुदुच्चेरी का केंद्र शासित क्षेत्र का दर्जा समाप्त करने और इसे तमिलनाडु में विलय करने के लिए बातचीत की खबरें आईं। वर्ष 1980 में इंदिरा गांधी की वापसी के साथ केंद्र में कांग्रेस के उदय ने पुदुच्चेरी कांग्रेस को पार्टी के तमिलनाडु स्थित गढ़ में एक अलग इकाई बना दिया, जहां चेन्नई गठबंधन सहयोगियों सहित हर चीज को नियंत्रित करता था।
वर्ष 2011 में एन रंगास्वामी ने कांग्रेस से नाता तोड़कर अपनी कांग्रेस (अखिल भारतीय एन रंगास्वामी कांग्रेस या एआईएनआरसी) का गठन किया। पुदुच्चेरी में भाजपा की स्थिति खराब थी। वर्ष 2016 के विधानसभा चुनावों में उसने 30 सीटों पर चुनाव लड़ा और 29 सीटों पर उसकी जमानत जब्त हो गई, इसलिए भाजपा ने एआईएनआरसी को एक मूल्यवान संभावित सहयोगी के रूप में पहचाना और सरकार में भागीदारी के बदले रंगास्वामी को मुख्यमंत्री पद सौंप दिया। वर्ष 2021 में आंध्र प्रदेश के अलावा पुदुच्चेरी दक्षिण भारत का दूसरा राज्य बन गया जहां भाजपा सरकार में भागीदार बनी। वर्ष 2021 में विधानसभा चुनावों में भाजपा ने छह सीटें जीतीं। इससे पहले वह कर्नाटक में भी ऐसा कर चुकी थी (और बाद में उसने आंध्र प्रदेश में भी यही किया)।
पुदुच्चेरी में कांग्रेस और अन्नाद्रमुक के लगभग पतन से पुरानी व्यवस्था के ढहने का खतरा तो भाजपा को दिख रहा है, लेकिन वह इसका पूरा फायदा नहीं उठा पाई है। इसके बजाय नई पार्टियां उभर कर सामने आई हैं। पिछले साल कोयंबत्तूर के कारोबारी सैंटियागो मार्टिन, जिन्हें भारत का ‘लॉटरी किंग’ कहा जाता है, द्वारा लच्चिया जननायका कट्ची (एलजेके) की स्थापना इसका एक उदाहरण है।
भारतीय चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, उनकी कंपनी फ्यूचर गेमिंग ऐंड होटल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड ने अप्रैल 2019 से जनवरी 2024 के बीच 1,368 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड खरीदे। इसमें से द्रमुक को 509 करोड़ रुपये मिले, लेकिन उन्होंने तृणमूल कांग्रेस और भाजपा को भी चंदा दिया।
मार्टिन ने आगामी चुनावों के लिए भाजपा के साथ गठबंधन किया है (वह पहले भाजपा में थे लेकिन 2015 में उन्होंने पार्टी छोड़ दी थी), जिससे अन्नाद्रमुक नाराज है और उसने इस गठबंधन पर अपनी नाराजगी जाहिर कर दी है।
मार्टिन के दामाद आधव अर्जुन इस महीने की शुरुआत में अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कषगम (टीवीके) में शामिल हो गए, जिससे टीवीके को पुदुच्चेरी की राजनीति में प्रवेश करने का एक अनूठा अवसर मिला। पार्टी सभी 30 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। आधव का राजनीतिक करियर उतार-चढ़ाव भरा रहा है। उन्होंने प्रशांत किशोर की टीम में रणनीतिकार के रूप में शुरुआत की, द्रमुक से विदुतलाई चिरुताइगल कट्ची (वीसीके) में गए और अंत में विजय के करीबी बन गए।
वह घोर गरीबी में पले-बढ़े, खिलाड़ी बने और वर्तमान में भारतीय बास्केटबॉल महासंघ तथा तमिलनाडु बास्केटबॉल एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं। वह तमिलनाडु ओलिंपिक एसोसिएशन के महासचिव भी हैं। महत्त्वाकांक्षी युवा मतदाताओं के सामने वह खुद को आदर्श के रूप में पेश करते हैं। उनके ससुराल वालों ने उनके इस कदम पर अपनी असहमति सार्वजनिक रूप से व्यक्त की है। लेकिन हो सकता है कि यह भी सोच-समझकर किसी योजना के तहत किया गया हो।
इन सब बातों का क्या मतलब है? वर्ष 2021 के विधानसभा चुनावों में 30 में से 12 सीटों पर हार-जीत का अंतर 2,000 वोटों से भी कम रहा था। अगर नई पार्टियां चार-पांच प्रतिशत वोट भी हासिल कर लेती हैं, तो पुदुच्चेरी में नतीजे अप्रत्याशित हो सकते हैं। छोटी पार्टियां दोनों तरफ से फायदा उठाने की क्षमता रखती हैं। पुदुच्चेरी भी इसी राह पर आगे बढ़ सकता है। ऐसा हुआ तो तमिलनाडु की राजनीति से उसका नाता पूरी तरह टूट जाएगा।