श्रम और रोजगार मंत्रालय सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के प्रावधानों के तहत गिग वर्कर्स के लिए दुर्घटना और जीवन बीमा कवरेज देने के लिए एक नई योजना का मसौदा तैयार कर रहा है। योजना से जुड़े 3 सूत्रों ने यह जानकारी दी।
इस योजना में सामाजिक सुरक्षा योजना के लिए नियम तय किए जाने की संभावना है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि मंत्रालय इस योजना के हिस्से के तौर पर पेंशन सुरक्षा को भी शामिल करने पर विचार कर रहा है।
खबर प्रकाशित होने को जाने तक श्रम मंत्रालय को भेजे गए एक ईमेल का कोई जवाब नहीं मिला।
सरकार के थिंक टैंक नीति आयोग के मुताबिक 2025-26 में भारत में अनुमानित 1.43 करोड़ गिग वर्कर्स होंगे। 2030 तक यह संख्या बढ़कर 2.35 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है।
सामाजिक सुरक्षा संहिता में गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के लिए कल्याणकारी योजनाओं की सिफारिश करने और उनकी देखरेख के लिए एक ‘राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड’ बनाने का प्रावधान है। इस संहिता के मसौदा नियमों में एक ‘सामाजिक सुरक्षा कोष’ बनाने का भी प्रस्ताव है, जो राइड-सेवा और फूड-डिलिवरी जैसी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म कंपनियों के योगदान से ऐसी योजनाओं के धन मुहैया कराएगा।
मसौदा नियमों के तहत एग्रीगेटर अपने सालाना टर्नओवर का 1 से 2 प्रतिशत इस कोष में योगदान देंगे, जिसकी ऊपरी सीमा गिग वर्कर्स को दिए जाने वाले कुल भुगतान का 5 प्रतिशत होगी।
नवंबर 2025 में श्रम संहिता लागू होने के बहुत पहले ही कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) में इस तरह की योजना पर चर्चा शुरू हो गई थी। एक अन्य अधिकारी ने बताया कि अक्टूबर 2025 में केंद्रीय न्यासी बोर्ड (सीबीटी) की बैठक के दौरान सदस्यों को सूचित किया गया था कि प्रस्तावित ईपीएफओ 3.0 फ्रेमवर्क के तहत गिग वर्कर्स की योजना के लिए सॉफ्टवेयर विकसित किए जा रहे हैं।
इस संहिता के लिए मसौदा नियमों में गिग वर्कर्स के लिए पात्रता की शर्तों का भी प्रस्ताव है। लाभ पाने के लिए इन वर्कर्स को एक वित्त वर्ष में किसी एग्रीगेटर के साथ कम से कम 90 दिन काम करना होगा। जो लोग कई प्लेटफॉर्म पर काम करते हैं, उन्हें कुल मिलाकर 120 दिन काम करना होगा। इस प्रावधान का गिग वर्कर्स के यूनियनों और आलोचकों ने विरोध करते हुए तर्क दिया कि काम के दिनों की ये शर्तें बड़ी संख्या में ऐसे गिग वर्कर्स को बाहर कर सकती हैं जो पार्ट टाइम, रुक-रुककर या मौसमी तौर पर प्लेटफॉर्म पर काम करते हैं।
अधिकारियों ने बताया कि मंत्रालय काम के दिनों की शर्त पर फिर से विचार करने को तैयार है, अगर इस वजह से कामगारों का एक बड़ा तबका, खासकर मौसम के मुताबिक प्लेटफॉर्म पर काम करने वाली महिलाएं इस योजना से बाहर रह जाती हैं।
गिग वर्कर्स एसोसिएशन (गिगवा) के ऑर्गेनाइजिंग सेक्रेटरी नितेश कुमार दास ने कहा, ‘एग्रीगेटर्स के इंश्योरेंस देने के अपने नियम होते हैं और हर प्लेटफॉर्म अलग-अलग तरह का कवरेज देता है। ये नियम बहुत अलग-अलग होते हैं और कामगारों को एक जैसा सुरक्षा कवच नहीं देते। कुछ कंपनियां तो कामगारों के परिवार के करीबी सदस्यों को भी बीमा योजना में शामिल नहीं करतीं। ज्यादातर एग्रीगेटर्स कामगारों के माता-पिता को भी बीमा कवरेज नहीं देते।’