उद्योग के जानकार इसे लॉजिस्टिक्स क्षेत्र के लिए चिंता की बात मानते हैं, जबकि ज्यादातर मूल उपकरण विनिर्माता (ओईएम) इसे उम्मीद के रूप में देखते हैं। यानी निकट भविष्य में रिप्लेसमेंट (पुराने को हटाकर नए का इस्तेमाल) से होने वाली वृद्धि की लहर के तौर पर। भारत तेजी से पुराने हो रहे ट्रकों के बेड़े की समस्या से जूझ रहा है। साल 2003 के बाद पंजीकृत इसके कुल बेड़े का लगभग 42 प्रतिशत हिस्सा पहले ही 12 साल की अवधि पूरी कर चुका है, क्योंकि रिप्लेसमेंट मांग में कई कारणों से देरी हुई है।
एन्वायरोकैटेलिस्ट की ओर से साझा आंकड़ों के अनुसार भारत में साल 2003 के बाद से पंजीकृत मौजूदा बेड़े का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा उद्योग की दो दिग्गज कंपनियों – टाटा मोटर्स (58 प्रतिशत) और अशोक लीलैंड (27 प्रतिशत) के पास है। इससे पता चलता है कि रिप्लेसमेंट में बड़े हिस्सेदारी इन दोनों कंपनियों की होगी। आंकड़ों से यह भी संकेत मिलता है कि 12 साल से ज्यादा पुराने मौजूदा बेड़े में अधिकांश हिस्सेदारी महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, हरियाणा और उत्तर प्रदेश की है। कुल मिलाकर यह हिस्सेदारी लगभग 41 प्रतिशत है।
पिछले पांच वर्षों के दौरान औसत आयु भी बढ़कर लगभग 9.5 वर्ष के सर्वकालिक शीर्ष स्तर तक पहुंच चुकी है, जबकि पहले यह करीब 7 से 7.5 वर्ष थी। इससे भी खास बात यह कि इन वाहनों का लगभग 61 प्रतिशत हिस्सा पहले से ही आठ साल से ज्यादा पुराने वाहनों का है। भारतीय ट्रक उद्योग को उम्मीद है कि ट्रकों का यह पुरानापन बाजार के सबसे बड़े संचालक के रूप में काम करेगा। इससे अगले पांच वर्षों के दौरान सालाना 3 से 5 प्रतिशत की स्थिर वृद्धि दर प्राप्त होगी।
एन्वायरोकैटेलिस्ट के संस्थापक और प्रमुख विश्लेषक सुनील दहिया ने कहा, ‘साल 2003 के बाद से पंजीकृत कुल 45 लाख वाहनों में से लगभग 19 लाख 12 वर्ष से ज्यादा पुराने हैं और उनमें से कुछ अब भी सड़क पर हो सकते हैं। इसका मतलब है कि पारंपरिक केंद्रों में अगले चार से पांच वर्षों में रिप्लेसमेंट मांग से बिक्री को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है, जबकि नई मांग के स्रोत विस्तृत हो रहे लॉजिस्टिक हब और बंदरगाह होंगे। वर्तमान में इन पुराने ट्रकों का बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और गुजरात में पंजीकृत है।
सबसे खास बात यह है कि इन ट्रकों में लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा दो कंपनियों – टाटा मोटर्स और अशोक लीलैंड का है। इससे पता चलता है कि अगर ये कंपनियां भविष्य के लिए तैयार नहीं होती हैं और ईवी की दिशा में बढ़ने के साथ तालमेल नहीं बिठाती हैं, तो वे अपनी बाजार हिस्सेदारी गवां सकती हैं।’
इस पर इसलिए गौर किया जाना चाहिए कि उद्योग ने पिछले तीन वर्षों में से दो वर्षों में ऋणात्मक वृद्धि दर्ज की है, जो साल 2023 के 2,57,806 वाहनों की तुलना में घटकर साल 2024 में 2,37,558 और साल 2025 में 2,35,857 रह गई।
उद्योग की अशोक लीलैंड और डेमलर इंडिया कमर्शियल वेहिकल्स जैसी कंपनियों ने संकेत दिया है कि उद्योग अगले कुछ वर्षों के दौरान एक अंक में मध्य स्तर की वृद्धि देख सकता है। अशोक लीलैंड के मुख्य वित्तीय अधिकारी केएम बालाजी ने कहा, ‘सायम के आंकड़ों के आधार पर साल 2024-25 तक के पिछले 15 वर्षों में 38 लाख ट्रकों की बिक्री हुई है। इनमें से बीएस-6 वाहनों की संख्या लगभग 13.3 लाख या कुल बेड़े की लगभग 35 प्रतिशत है, जबकि बीएस-4 लगभग 8,40,000 हैं। इसका मतलब यह है कि तकरीबन 16.7 लाख वाहन बीएस 3 या कम स्तर वाले हैं। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि 40 प्रतिशत से अधिक बेड़े की औसत आयु 12 वर्ष से अधिक है।’