ईरान और इजरायल-अमेरिका युद्ध का नतीजा जो भी हो और भले ही यह लड़ाई आने वाले कुछ दिनों या सप्ताहों में खत्म हो जाए, मगर एक बात तो तय है कि भारत को अब अपनी ऊर्जा निर्भरताओं पर नए सिरे से गंभीरता से विचार करना होगा। अन्य क्षेत्रों पर निर्भरता भी जरूरी है मगर ऊर्जा आपूर्ति फिलहाल उसके लिए काफी अहम हो गई है।
ऊर्जा क्षेत्र में हमें अधिक आत्मनिर्भरता की आवश्यकता है, शायद रक्षा क्षेत्र से भी अधिक। खाना पकाने की गैस की मौजूदा कमी देश के हर घर और रेस्तरां मालिक को झकझोर रही है। यह स्थिति इस बात की तरफ स्पष्ट इशारा है कि ऊर्जा पर आत्मनिर्भरता देश के लिए कितनी जरूरी हो गई है। ईंधन की किल्लत रक्षा क्षेत्र में एक सीमित झटके से भी कहीं अधिक राजनीति को प्रभावित कर सकती है।
तेल एवं गैस आयात पर अत्यधिक निर्भरता को देखते हुए हमें न केवल तेल के भंडार बढ़ाने होंगे (और गैस के भी यथासंभव अधिक से अधिक भंडार बढ़ाने चाहिए) बल्कि नए रास्ते तलाशने की दिशा में प्रयास और तेज करने होंगे। हम तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) पर 60-65 फीसदी आयात निर्भरता के साथ आगे नहीं बढ़ सकते। इस आयात का ज्यादातर हिस्सा केवल एक अस्थिर क्षेत्र यानी पश्चिम एशिया से आता है।
व्यापक ऊर्जा सुरक्षा स्तर पर भारत सही दिशा में आगे बढ़ रहा है। गैर-जीवाश्म ईंधन से चलने वाली बिजली उत्पादन क्षमता का हिस्सा अब 509 गीगावॉट की कुल स्थापित क्षमता के 50 फीसदी से अधिक हो गया है। मगर समस्या कुछ क्षेत्रों पर केंद्रित निर्भरता से संबंधित है जो नीतिगत प्राथमिकताओं से प्रेरित है। गैस आपूर्ति के लिए पश्चिम एशिया पर बढ़ती निर्भरता का सीधा संबंध घरेलू खाना पकाने की गैस की खपत में भारी वृद्धि और परिवहन क्षेत्र में गैस के बढ़ते इस्तेमाल से है।
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य शमिका रवि ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर एक पोस्ट में कहा,‘भारतीय परिवार अब खाना पकाने (एलपीजी) और परिवहन दोनों के लिए पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भर हैं। एलपीजी और परिवहन ईंधन दोनों मासिक बजट में 7.5 से 10.2 फीसदी हिस्सेदारी रखने लगे हैं। इससे हमारे परिवार तेल आपूर्ति में किसी भी व्यवधान के प्रति दोहरे रूप से संवेदनशील हो जाते हैं। यह संवेदनशीलता 2011 में इस पैमाने पर मौजूद नहीं थी जब ग्रामीण क्षेत्रों में एलपीजी का उपयोग बहुत अधिक नहीं होता था।
प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयासों के बीच हमने जीवाश्म ईंधन के घरेलू उत्पादन को कम महत्त्व दिया है। अगले दो दशकों में जीवाश्म ईंधन काफी महत्त्वपूर्ण रहने वाला है क्योंकि यह वह समय है जब भारत को अपने जनसांख्यिकीय लाभांश का अधिकतम लाभ उठाना होगा। जीवाश्म ईंधन के प्रति उदासीनता की कोई गुंजाइश नहीं है चाहे जलवायु कार्यकर्ता और पर्यावरणविद कुछ भी कहें। अगर हमें डॉनल्ड ट्रंप से कोई एक सलाह लेनी चाहिए तो वह यह है ‘खुदाई करो, खूब खुदाई करो’। इसका अर्थ है अधिक और तेजी से अन्वेषण और उत्पादन में निवेश करना।
हमें ट्रंप को इस बात के लिए भी धन्यवाद देना चाहिए कि उन्होंने हमारी कमजोरियों को उजागर किया। पश्चिम एशिया पर हमारी निर्भरता (विशेषकर होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरने वाले आपूर्ति स्रोतों पर) टिकाऊ नहीं है। पश्चिम एशिया के प्रमुख तेल और गैस उत्पादक देश स्ट्रेट की ओर जाने वाले संकरे जलमार्ग के दोनों ओर स्थित हैं मगर अब वे ईरान की सुरक्षा प्राथमिकताओं के अधीन हैं। बहरीन, कतर, ओमान, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और यहां तक कि सऊदी अरब का अधिकांश उत्पादन इसी रास्ते से होकर गुजरता है।
वास्को डी गामा को औपनिवेशिक काल के बाद के भारतीय इतिहास में अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता है मगर यह सच है कि उन्होंने केप ऑफ गुड होप के रास्ते भारत के लिए एक वैकल्पिक मार्ग खोजा। अगर हम पश्चिम एशियाई जीवाश्म ईंधन का आयात पर निर्भर रहते हैं तो हमारे सामने यही चुनौती है होर्मुज स्ट्रेट से बचते हुए एक नया मार्ग खोजना।
भारत के आईएमईसी गलियारा (भारत-पश्चिम एशिया-यूरोप आर्थिक कॉरिडोर) के प्रस्ताव में यूएई, सऊदी अरब, जॉर्डन, इजरायल और ग्रीस से होकर गुजरने वाले परिवहन बुनियादी ढांचे का निर्माण शामिल है। इनमें से कुछ देशों को ईरान का खतरा है जिससे पश्चिम एशिया में व्यापक शांति समझौते के बिना गलियारा अव्यावहारिक हो सकता है।
ईरान को और अधिक प्रयास करने की आवश्यकता है क्योंकि उसकी धर्मतांत्रिक सरकार ने यहूदी-विरोध एवं इजरायल को नष्ट करने की प्रतिबद्धता को अपने व्यापक इस्लामी मिशन के मूल में रखा है। वह हिजबुल्लाह (लेबनान), हूती विद्रोहियों (यमन) और हमास (गाजा) जैसे संगठनों का भी समर्थन करता है। ईरान की परमाणु महत्त्वाकांक्षाओं को रोकने से कहीं अधिक इजरायल की सीमाओं पर मंडरा रहे इन खतरों पर लगाम लगाना आवश्यक है और यह केवल ईरान ही कर सकता है। इजरायल और अमेरिका ने ईरानी नेतृत्व पर निशाना साधकर खेल और बिगाड़ दिया है क्योंकि अब नए लोग बातचीत या किसी तरह की संधि करने की हालत में नहीं होंगे। निकट भविष्य में आईएमईसी कारगर नहीं होने वाला है।
होर्मुज स्ट्रेट में आपूर्ति बाधित होने पर हमें वैकल्पिक स्रोतों की आवश्यकता होगी। पश्चिम एशिया पर निर्भरता हमारे लिए केवल अस्थायी विकल्प है। युद्ध समाप्त होने के बाद हम इस क्षेत्र का इस्तेमाल कम कीमतों पर भंडार बढ़ाने या जमा करने के लिए कर सकते हैं। मध्यम अवधि में हमें कतर, यूएई और सऊदी अरब से होर्मुज स्ट्रेट और लाल सागर के उन क्षेत्रों से दूर नौवहन क्षमता विकसित करने का आग्रह करना चाहिए जिन्हें यमन के हूती विद्रोही निशाना बना सकते हैं।
निश्चित रूप से हमें तेल और गैस के घरेलू अन्वेषण और उत्पादन में तेजी लानी चाहिए खासकर अंडमान के पास हाल ही में हुई खोजों के बाद। हमें खाना पकाने के लिए उपयुक्त चूल्हों का उपयोग करते हुए एथनॉल के इस्तेमाल में भी तेजी लानी चाहिए। हालांकि, यह बात केवल ऊर्जा क्षेत्र तक ही सीमित नहीं है कि हमें दुनिया के अशांत क्षेत्रों में आपूर्ति के कुछ ही स्रोतों पर अत्यधिक निर्भरता कम करनी चाहिए। आयात और निर्यात दोनों ही क्षेत्रों में, सभी महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में यही हमारा मार्गदर्शक सिद्धांत होना चाहिए।
ऊर्जा के अलावा तीन क्षेत्र विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। पहली बात यह है कि हम दुर्लभ खनिजों से लेकर इलेक्ट्रॉनिक पुर्जों और अन्य चीजों तक हर चीज में चीनी आपूर्तिकर्ताओं पर अत्यधिक निर्भर हैं। उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन महत्त्वपूर्ण हैं मगर व्यापार करने में आसानी उससे भी अधिक अहम है। दूसरा, हमारी सॉफ्टवेयर सेवाएं उत्तरी अमेरिका खासकर अमेरिका पर बहुत अधिक केंद्रित हैं। मगर मुनाफा ही सब कुछ नहीं है।
इन्फोसिस, टीसीएस और विप्रो जैसी कंपनियों को अगले 10 वर्षों में दुनिया के दूसरे बाजारों में कारोबार बढ़ाने लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। गैर-अमेरिकी और घरेलू भारतीय व्यापार में उनकी हिस्सेदारी में काफी वृद्धि होनी चाहिए,और उत्पादों और स्वतंत्र प्लेटफॉर्मों का उनके व्यवसाय में बड़ा हिस्सा होना चाहिए।
गूगल से लेकर माइक्रोसॉफ्ट, मेटा और एक्स तक विदेशी तकनीकी प्लेटफार्मों पर हमारी निर्भरता एक रणनीतिक कमजोरी है। चिंता की बड़ी वजह यह है कि ये कंपनियां अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा संरचना में गहराई से शामिल हैं। अगर उन्हें भारतीय हितों और अमेरिकी हितों में से किसी एक को चुनना पड़े तो यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि वे किस तरफ झुकेंगे।
हमारे पास स्वयं के स्वतंत्र ईमेल, मेसेजिंग, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, आर्टिफिशल इंटेलिजेंस मॉडल, कार्यालय और क्लाउड सेवाएं होनी चाहिए जो बड़ी अमेरिकी तकनीकी कंपनियों के प्रभाव को संतुलित कर सकें। हमारा डेटा अदालतों द्वारा निर्देशित किए जाने के अलावा, कभी भी अमेरिकी सरकार के साथ साझा नहीं किया जाना चाहिए। हमें यह बात भी जेहन में रखनी चाहिए कि आत्मनिर्भरता के भी कुछ नुकसान हैं। मसलन लागत बढ़ेगी और मुनाफा कम होगा। मगर रणनीतिक स्वायत्तता के लिए इतनी कीमत तो चुकानी पड़ती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)