उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को वर्ष 2009 के बंबई उच्च न्यायालय के दो फैसलों को पलटते हुए उद्योगों जिसमें रिलायंस इंडस्ट्रीज भी शामिल है, को 2000 से 2005 के बीच कैप्टिव पावर प्लांट से उत्पन्न बिजली पर दी गई ड्यूटी छूट को निरस्त कर दिया। ये अपीलें उच्च न्यायालय के 5 अक्टूबर और 7 नवंबर 2009 के फैसलों के खिलाफ थीं, जिनमें राज्य सरकार द्वारा छूट वापस लेने संबंधी अधिसूचनाओं को को अमान्य ठहराया गया था और संबंधित अवधि के लिए उद्योगों को पूर्ण ड्यूटी राहत देने का निर्देश दिया गया था।
अपीलों को स्वीकार करते हुए न्यायमूर्ति पामिडीघंटम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे के पीठ ने कहा कि राज्य सरकार को बिजली अधिनियम की धारा 5 के तहत दी गई छूट को वापस लेने या उसमें संशोधन करने का अधिकार है।
अदालत ने कहा, ‘हम राज्य सरकार के इस अधिकार को बरकरार रखते हैं कि वह धारा 5 के तहत दी गई छूट को वापस ले या उसमें संशोधन करे। एक अप्रैल, 2010 की अधिसूचनाएं, एक अप्रैल 2001 के संदर्भ में अपनी-अपनी तारीख से एक वर्ष की अवधि पूरी होने के बाद ही प्रभावी होंगी’।
फैसले की विस्तृत प्रति अभी आना बाकी है। यह विवाद महाराष्ट्र की 1993 की औद्योगिक नीति से जुड़ा है, जिसमें निवेश को बढ़ावा देने के लिए कैप्टिव पावर यूनिट से उत्पन्न और उपभोग की जाने वाली बिजली पर ड्यूटी छूट दी गई थी। इस नीति के तहत रिलायंस इंडस्ट्रीज सहित कई कंपनियों ने ऐसे संयंत्र स्थापित करने में भारी निवेश किया था। यह छूट बंबई बिजली शुल्क अधिनियम, 1958 के तहत जून 1993 से जारी अधिसूचनाओं के माध्यम से लागू की गई थी।
हालांकि राज्य सरकार ने 1 अप्रैल 2000 की अधिसूचना के जरिए यह छूट वापस ले ली और प्रति यूनिट 30 पैसे का शुल्क लगाया। जिसे बाद में 4 अप्रैल 2001 की अधिसूचना के जरिए घटाकर 15 पैसे प्रति यूनिट कर दिया गया। उद्योगों ने इस फैसले को ‘प्रॉमिसरी एस्टॉपल’ के सिद्धांत का उल्लंघन बताते हुए चुनौती दी थी क्योंकि उन्होंने पहले की नीति पर भरोसा कर निवेश किया था।
हालांकि 16 जून 2005 को यह छूट भविष्य के लिए बहाल कर दी गई। लेकिन राज्य ने 1 अप्रैल 2000 से 30 अप्रैल 2005 के बीच की अवधि के लिए इसका लाभ देने से इनकार कर दिया। मांग नोटिस जारी होने और जनवरी 2007 में आपत्तियां खारिज होने के बाद कंपनियों ने उच्च न्यायालय का रुख किया।