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विदेशी कर्मचारियों के ईपीएफ योगदान पर सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई

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गत वर्ष नवंबर में दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्पाइसजेट और एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स की उन याचिकाओं को खारिज कर दिया था जिनमें 2008 और 2010 की अधिसूचना को चुनौती दी गई थी।

Last Updated- March 13, 2026 | 8:52 AM IST
Supreme Court

सर्वोच्च न्यायालय गुरुवार को इस बात का परीक्षण करने पर सहमत हो गया कि क्या भारत में काम कर रहे विदेशी कर्मचारियों को कर्मचारी भविष्य निधि योजना, 1952 के तहत कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) में योगदान करने की आवश्यकता है?

न्यायमूर्ति पीएस नरसिंह और आलोक अराधे के पीठ ने एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स द्वारा दायर याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है, जिसमें ईपीएफ योजना के पैरा 83 की वैधता को चुनौती दी गई है, जो ‘अंतरराष्ट्रीय कर्मचारियों’ के भविष्य निधि योगदान को नियंत्रित करता है। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि जब तक मामला लंबित है, तब तक याचिकाकर्ताओं के खिलाफ ईपीएफ अधिनियम की धारा 7ए के तहत शुरू की गई कार्यवाही में अंतिम आदेश पारित नहीं किए जाएं।

इसमें वास्तविक चुनौती पैरा 83 से संबंधित है, जिसे 2008 और 2010 में सरकारी अधिसूचनाओं के माध्यम से पेश किया गया था। इस प्रावधान ने भारत में काम करने वाले विदेशी कर्मचारियों के लिए भविष्य निधि योगदान का एक विशेष ढांचा तैयार किया। यह प्रावधान तब पेश किया गया जब भारत ने कई देशों के साथ सामाजिक सुरक्षा समझौते करने शुरू किए ताकि विभिन्न न्याय क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए सामाजिक सुरक्षा कवरेज का समन्वय किया जा सके।

इन व्यवस्थाओं का लक्ष्य दोहरे सामाजिक सुरक्षा योगदान को रोकना, लाभ की संभावना सुनिश्चित करना, और कर्मचारियों को अस्थायी रूप से दूसरे देश में रोकना है। ईपीएफ ढांचे के तहत, ‘अंतरराष्ट्रीय कर्मचारी’ की परिभाषा में व्यापक तौर पर उन विदेशी नागरिकों को शामिल किया जाता है जो भारत में ईपीएफ अधिनियम के अंतर्गत आने वाले प्रतिष्ठानों में कार्यरत हैं। ऐसे कर्मचारियों का भविष्य निधि में योगदान करना आवश्यक है, जब तक कि वे ‘अलग कर्मचारी’ के रूप में योग्य न हों। जैसे कि वे कर्मचारी जो पहले से ही अपने देश की सामाजिक सुरक्षा प्रणाली के अंतर्गत आते हैं और जिनका भारत के साथ सामाजिक सुरक्षा समझौता हुआ है।

ऐसे समझौतों के अभाव में विदेशी कर्मचारियों को ईपीएफ में योगदान करना ही होता है भले ही उनके वेतन का स्तर कुछ भी हो। इसके विपरीत, भारतीय कर्मचारी केवल वैधानिक वेतन सीमा तक ही अनिवार्य रूप से कवर होते हैं। प्रवासी कर्मचारियों को नियुक्त करने वाली कंपनियों ने इन प्रावधानों को चुनौती दी है। उनका तर्क है कि ये अल्पकालिक नियुक्तियों के लिए भी योगदान को अनिवार्य बनाते हैं, जबकि संचित निधि की निकासी को सेवानिवृत्ति आयु तक सीमित कर देते हैं।

गत वर्ष नवंबर में दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्पाइसजेट और एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स की उन याचिकाओं को खारिज कर दिया था जिनमें 2008 और 2010 की अधिसूचना को चुनौती दी गई थी। अदालत ने माना कि केंद्र सरकार को विदेशी नागरिकों तक ईपीएफ योजना का विस्तार करने का अधिकार है और भविष्य निधि के उद्देश्यों के लिए अंतरराष्ट्रीय कर्मचारियों को एक अलग वर्ग के रूप में मानना संवैधानिक रूप से अनुमेय है। इसके बाद एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स ने उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है।

सुनवाई के दौरान, एलजी के अधिवक्ता ने कहा कि विभिन्न उच्च न्यायालयों द्वारा प्रकट भिन्न-भिन्न विचारों ने इस मुद्दे पर अनिश्चितता पैदा कर दी है और सुप्रीम कोर्ट द्वारा समाधान की आवश्यकता है। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) ने अदालत को बताया कि वह भारत के सामाजिक सुरक्षा समझौतों को लागू करने के लिए जिम्मेदार नोडल एजेंसी है। उसने चेतावनी दी कि पैरा 83 को रद्द करना व्यापक अंतरराष्ट्रीय प्रभाव डाल सकता है और यह विएना संधि के तहत ‘भौतिक उल्लंघन’ के समान हो सकता है, क्योंकि यह प्रावधान ऐसे समझौतों को लागू करने के लिए भारत के ढांचे का हिस्सा है।

ईपीएफओ ने यह भी बताया कि भारत ने लगभग 20 देशों के साथ सामाजिक सुरक्षा समझौते किए हैं और हाल ही में यूनाइटेड किंगडम के साथ एक समझौता अंतिम रूप दिया है। इन बातों पर ध्यान देते हुए, अदालत ने ईपीएफओ को निर्देश दिया कि वह संबंधित संधियों और सामग्रियों का संकलन रिकॉर्ड पर प्रस्तुत करे ताकि पीठ को इस मुद्दे पर निर्णय लेने में सहायता मिल सके।

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First Published - March 13, 2026 | 8:52 AM IST

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