सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद महिला सशक्तिकरण के संकेतकों के बीच खाई बढ़ती जा रही है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के तीन चरणों के विश्लेषण से यह खुलासा हुआ है। ये तीन चरण लगभग एक दशक को कवर करते हैं।
विश्लेषण से पता चलता है कि उन उपायों में काफी सुधार हुआ है जहां सरकार सीधे तौर पर प्रभाव डाल सकती हैं। इनमें वित्तीय समावेशन, डिजिटल ऐक्सेस, स्कूली शिक्षा, मासिक धर्म स्वच्छता और पारिवारिक निर्णय लेने में भागीदारी। मगर काम के लिए भुगतान और संपत्ति के स्वामित्व जैसे आर्थिक मामलों में अधिक फायदा नहीं हुआ है।
इस महीने जारी एनएफएचएस-6 (2023-24) की एनएफएचएस 5 (2019-21) और एनएफएचएस-4 (2015-16) से तुलना करने पर पता चलता है कि भारत ने महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के मुकाबले उनकी पहुंच और क्षमताओं का विस्तार करने में तेजी से प्रगति की है। इन दोनों के बीच का अंतर लगातार बढ़ा है।
आंकड़ों से पता चलता है कि वित्तीय समावेशन में सुधार की रफ्तार सबसे तेज रही। अपनी बचत बैंक खाता रखने वाली 15 से 49 वर्ष की महिलाओं की हिस्सेदारी 2015-16 में 53 फीसदी थी जो बढ़कर 2019-21 में 78.6 फीसदी और 2023-24 में 89 फीसदी हो गई। इस प्रकार एक दशक के दौरान इसमें 36 फीसदी की वृद्धि हुई।
डिजिटल ऐक्सेस के मामले में भी ऐसी ही रफ्तार दिखी। निजी मोबाइल फोन रखने वाली महिलाओं की हिस्सेदारी एनएफएचएस-4 में 45.9 फीसदी थी जो बढ़कर एनएफएचएस-5 में 53.9 फीसदी और एनएफएचएस-6 में 63.6 फीसदी हो गई। इसी प्रकार इंटरनेट के उपयोग में भी वृद्धि हुई। इस मामले में पिछले दो चरणों के आंकड़े ही उपलब्ध हैं। इंटरनेट के उपयोग में महिलाओं की हिस्सेदारी 2019-21 में 33.3 फीसदी थी जो बढ़कर 2023-24 में 64.3 फीसदी हो गई।
स्कूली शिक्षा में धीरे-धीरे सुधार हुआ। स्कूल में दाखिला लेने वाली छह साल और इससे अधिक उम्र की लड़कियों की हिस्सेदारी एनएफएचएस-4 में 68.8 फीसदी थी जो बढ़कर एनएफएचएस-5 में 71.8 फीसदी और एनएफएचएस-6 में 73.7 फीसदी हो गई।