इस स्तंभ में वित्त वर्ष के पहले महीने यानी अप्रैल में आम तौर पर बीते वर्ष बैंकिंग एवं वित्तीय क्षेत्र में हुए घटनाक्रम पर चर्चा होती है। इस परंपरा को जारी रखते हुए आइए उन रुझानों का विश्लेषण करते हैं जिन्होंने वित्त वर्ष 2025-26 (वित्त वर्ष 2026) की दशा-दिशा तय की। मगर पहले आंकड़ों का अध्ययन करते हैं।
कई कारणों से खबरों में रहने वाला रुपया पिछले वर्ष 9.83 फीसदी टूट गया। इस बीच, विदेशी मुद्रा भंडार 676.3 अरब डॉलर से बढ़कर 697.1 अरब डॉलर हो गया। अप्रैल 2025 की शुरुआत में 10 वर्ष की अवधि के बॉन्ड पर यील्ड 6.48 फीसदी थी जो वित्त वर्ष के अंत तक बढ़कर 7.04 फीसदी हो गई जबकि 364 दिन के ट्रेजरी बिल पर यील्ड 6.3 फीसदी से घटकर 5.65 फीसदी हो गई। संयोगवश फरवरी और दिसंबर 2025 के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने रीपो दर में 1.25 फीसदी अंक की कटौती कर 5.25 फीसदी कर दी।
खुदरा मुद्रास्फीति अप्रैल 2025 में 3.16 फीसदी थी मगर यह फरवरी में बढ़कर 3.21 फीसदी हो गई। मध्य मार्च तक बैंक जमा वृद्धि 10.8 फीसदी थी जो पिछले वर्ष दर्ज 10.3 फीसदी से थोड़ी अधिक थी मगर ऋण पोर्टफोलियो में अधिक तेज 13.8 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज हुई।
निफ्टी और सेंसेक्स दोनों शेयर बाजार सूचकांकों में गिरावट दर्ज की गई। पिछले छह वर्षों में सूचकांकों का सबसे कमजोर प्रदर्शन रहा। हालांकि, म्युचुअल फंड उद्योग के प्रबंधन के तहत परिसंपत्तियों में लगातार तीसरे वित्त वर्ष में कम से कम 20 फीसदी की वृद्धि हुई।
अब रुझानों की बात करते हैं। आरबीआई पूरे साल नियमों को सरल बनाने में व्यस्त रहा। लगभग 9,000 परिपत्र निरस्त कर उन्हें 11 श्रेणियों की विनियमित संस्थाओं के लिए 238 मास्टर निर्देशों में समेट दिया गया। यह हाल के दशकों में शासन और अनुपालन को आसान बनाने वाले सबसे महत्त्वपूर्ण सुधारों में से एक है। हालांकि, यह प्रक्रिया वर्षों से चल रही थी मगर नियामक ने वित्त वर्ष 2026 में इसे तेज कर दिया। आरबीआई अब समयबद्ध और दूरदर्शी नियामक हस्तक्षेपों की जिम्मेदारी लेने की योजना बना रहा है।
भारत में विदेशी बैंकों से जुड़े बदलाव देखने को भी मिले। आरबीआई ने ब्लैकस्टोन को फेडरल बैंक लिमिटेड में 9.99 फीसदी तक हिस्सेदारी हासिल करने की अनुमति दी जिससे वह इसका का सबसे बड़ा शेयरधारक बन गया। वैकल्पिक परिसंपत्ति प्रबंधक कंपनी ब्लैकस्टोन ने अपनी सहयोगी कंपनी एशिया 2 टॉपको 13 पीटीई लिमिटेड के माध्यम से कोच्चि स्थित इस पुराने निजी बैंक में 6,197 करोड़ रुपये का निवेश किया।
इस सौदे के तहत ब्लैकस्टोन को फेडरल बैंक के बोर्ड में एक गैर-कार्यकारी निदेशक को नामित करने का अधिकार मिला। अमेरिका स्थित निजी इक्विटी फर्म वारबर्ग पिंकस एलएलसी और अबू धाबी निवेश प्राधिकरण (एडीआईए) ने आईडीएफसी फर्स्ट बैंक लिमिटेड में तरजीही इक्विटी निर्गम के माध्यम से 7,500 करोड़ रुपये के निवेश किए।
वारबर्ग पिंकस ने कर्रेंट सी इन्वेस्टमेंट्स बीवी के जरिये 4,876 करोड़ रुपये निवेश किया और एडीआईए ने अपनी पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी प्लैटिनम इनविक्टस बी 2025 आरएससी के माध्यम से 2,624 करोड़ रुपये का निवेश किया। कर्रेंट सी इन्वेस्टमेंट्स बीवी के पास अब आईडीएफसी फर्स्ट बैंक में 9.44 फीसदी और प्लैटिनम इनविक्टस बी 2025 आरएससी के पास 5.08 फीसदी हिस्सेदारी है।
इस बीच, एमिरेट्स एनबीडी बैंक (ईएनडीबी) को आरबीएल बैंक लिमिटेड की 74 फीसदी चुकता इक्विटी खरीदने की आरबीआई से मंजूरी मिल गई है। इस मंजूरी के लिए निवेशक को आरबीएल में कम से कम 51 फीसदी हिस्सेदारी रखनी होगी और सौदा पूरा होने के बाद यह भारतीय निजी बैंक दुबई स्थित ऋणदाता की सहायक कंपनी बन जाएगी। अब तक भारत में विदेशी बैंकों की ऐसी केवल दो स्थानीय सहायक कंपनियां -डीबीएस बैंक इंडिया लिमिटेड और स्टेट बैंक ऑफ मॉरीशस लिमिटेड- हैं।
बाजार नियामक के मानदंडों के अनुरूप ईएनबीडी को आरबीएल के प्रवर्तक के रूप में माने जाने पर आरबीआई को कोई आपत्ति नहीं होगी। विदेशी बैंक को अपनी तीन स्थानीय शाखाओं को आरबीएल में विलय करने के लिए एक वर्ष का समय दिया गया है और उसका मतदान अधिकार 26 फीसदी तक सीमित है।
अंत में, जापानी दिग्गज सूमीतोमो मित्सुई बैंकिंग कॉरपोरेशन (एसएमबीसी) ने येस बैंक लिमिटेड में 24.9 फीसदी हिस्सेदारी हासिल कर ली। शुरुआत में इसने भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) और कुछ अन्य ऋणदाताओं से शेयरों की द्वितीयक खरीद के माध्यम से 20 फीसदी हिस्सेदारी हासिल की थी। एसएमबीसी को येस बैंक में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर 24.99 फीसदी तक करने की आरबीआई से मंजूरी मिल गई है। इस सौदे के बाद एसएमबीसी येस बैंक का सबसे बड़ा शेयरधारक बन गया है। एसएमबीसी के दो प्रतिनिधि राजीव वीरवल्ली कन्नन और शिनिचिरो निशिनो निजी बैंक के बोर्ड में शामिल हो गए हैं।
आरबीएल और येस बैंक के सौदों में अंतर है। आरबीएल बैंक के मामले में नया धन आएगा जिससे इसकी पूंजी मजबूत होगी और इसके बहीखाते में वृद्धि होगी। येस बैंक का सौदा ‘बिक्री की पेशकश’थी। इसमें पैसा विक्रेताओं को मिला, बैंक को नहीं।
ये सभी घटनाएं बैंकिंग क्षेत्र में हुईं। हालांकि, वित्तीय क्षेत्र का सबसे बड़ा सौदा गैर-बैंकिंग क्षेत्र में हुआ। जापान के एमयूएफजी बैंक ने, जो भारत में सवा सौ साल से अधिक समय से (अपने पूर्ववर्ती स्वरूप, योकोहामा स्पेसी बैंक के माध्यम से) मौजूद है, श्रीराम फाइनैंस लिमिटेड में 39,618 करोड़ रुपये में 20 फीसदी हिस्सेदारी तरजीही आवंटन के माध्यम से हासिल की।
अब, उस घटना की बात करते हैं जो पिछले साल होने वाली थी मगर नहीं हुई। जी हां, मैं आईडीबीआई बैंक लिमिटेड के सौदे की बात कर रहा हूं। सरकार ने अक्टूबर 2022 में आईडीबीआई बैंक के विनिवेश की प्रक्रिया शुरू की थी और संभावित खरीदारों से अभिरुचि पत्र आमंत्रित किए थे।
बैंक में सरकार की 45.48 फीसदी और भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) की 49.24 फीसदी हिस्सेदारी है। दोनों की मिलाकर संयुक्त हिस्सेदारी 94.72 फीसदी है। दोनों मिलकर बैंक में 60.72 फीसदी हिस्सेदारी बेचने की योजना बना रहे थे। यह बिक्री 2025 तक पूरी होनी थी। मगर ऐसा नहीं हुआ। मार्च में ऐसी खबरें आईं कि सरकार ने बैंक में बहुल हिस्सेदारी के लिए बोलियां रद्द कर दी हैं क्योंकि प्रस्ताव न्यूनतम अपेक्षित मूल्य से कम थे जबकि आईडीबीआई बैंक ने स्टॉक एक्सचेंज को सौंपी जानकारी में कहा कि उसे विनिवेश प्रक्रिया के संबंध में सरकार से कोई सूचना नहीं मिली है।
नवीनतम खबरों से पता चलता है कि सरकार मौजूदा बोलियां रद्द करने के पक्ष में नहीं है बल्कि इस प्रक्रिया को आगे बढ़ने के तरीकों की तलाश कर रही है। जब ऐसा होगा तो आईडीबीआई बैंक का ‘निजीकरण’ निश्चित रूप से एयर इंडिया के निजीकरण से कम समय लेगा।
एचडीएफसी बैंक लिमिटेड में जो हुआ उसका जिक्र किए बिना यह चर्चा पूरी नहीं हो सकती। इसके गैर-कार्यकारी अध्यक्ष अतनु चक्रवर्ती ने 17 मार्च को यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया कि ‘पिछले दो वर्षों में बैंक के भीतर कुछ घटनाएं और व्यवहार’ उनके ‘व्यक्तिगत मूल्यों और नैतिकता’ के अनुरूप नहीं थे।
आरबीआई ने बैंक को एक तरह से पाक-साफ करार दिया है मगर विश्लेषक अभी भी इस बात पर विचार कर रहे हैं कि असल समस्या क्या है।
(लेखक जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड में वरिष्ठ सलाहकार हैं)