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उत्तर भारत में वायु प्रदूषण: मानव जनित संकट, अस्थायी उपायों से आगे स्थायी नीति की जरूरत

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उत्तर भारत का हर निवासी इस बात से अवगत होगा कि दशकों से वायु प्रदूषण की स्थिति बदतर होती जा रही है

Last Updated- January 20, 2026 | 11:20 PM IST
Air Pollution

ओडिशा में चक्रवात, उत्तराखंड में भूस्खलन, असम में बाढ़, दिल्ली में प्रदूषण। ये मौसमी घटनाएं हैं जिनसे भारतीय जूझते रहते हैं। लेकिन बाढ़ और चक्रवात के विपरीत, दिल्ली और पूरे उत्तर भारत में प्रदूषण पूरी तरह से इंसान की गतिविधियों के कारण होता है। ऐसे में प्रभावी कदम उठाकर इसे काफी हद तक कम किया जा सकता है। उत्तर भारत का कोई भी निवासी इस बात से अवगत होगा कि दशकों से वायु प्रदूषण की स्थिति बदतर होती जा रही है और इसके कारणों की पहचान करने तथा इसे कम करने के लिए प्रभावी नीति तैयार करना संभव होना चाहिए। इसके कारणों की पहचान करना कठिन नहीं है।

भारत जीवाश्म ईंधन जलाने से उत्पन्न ताप ऊर्जा पर निर्भर है। आय में वृद्धि के साथ-साथ वाहनों की संख्या भी बढ़ रही है, जो काफी हद तक जीवाश्म ईंधन से ही संचालित होते हैं। ऊर्जा के इस्तेमाल में ताप ऊर्जा की हिस्सेदारी कम किए बिना इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) का इस्तेमाल करने से कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा।
औद्योगिक गतिविधियां भी वायु गुणवत्ता को बदतर करने में योगदान देती हैं। किसान पराली जलाते हैं क्योंकि यह खेतों को दोबारा बोआई के लिए तैयार करने का सबसे सस्ता तरीका है। निर्माण कार्य भी कण प्रदूषण का एक और स्रोत है, और मॉनसून के बाद निर्माण कार्य में मौसमी उछाल देखी जाती है। दीवाली के समय प्रदूषण और बढ़ जाता है। जब तापमान गिरता है, तो वायु गुणवत्ता और भी खराब हो जाती है। सर्दियों में बारिश कम होती है, इसलिए हवा भी साफ नहीं हो पाती।

हालांकि, प्रदूषण के कारणों का पता लगाना तो केवल पहला कदम है। प्रदूषण को कम करने के लिए इंसान की गतिविधियों के स्वरूप में बदलाव लाना कई बाधाओं से भरा है। भारत को आने वाले दशकों तक ताप ऊर्जा का उपयोग करना ही पड़ेगा। निर्माण कार्य को रोकना आर्थिक दृष्टि से बेहद हानिकारक होगा। दीवाली का त्योहार हमेशा रहेगा, और वाहनों का आवागमन कभी नहीं रुकेगा।

घरों में हीटिंग और खाना पकाने की बात करें तो, गैस और बिजली के इस्तेमाल से काफी सुधार हुआ है, हालांकि अन्य स्रोतों से प्रदूषण बढ़ने से यह सुधार बेअसर हो गया है। निर्माण तकनीक में सुधार करके धूल कणों को कम किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए नई तकनीक की आवश्यकता होगी और बड़ी संख्या में कर्मचारियों को नए कौशल सिखाने होंगे।

किसानों को दोष देना सरासर बेवकूफी है। अगर उन्हें स्वच्छ और सस्ते विकल्प नहीं दिए गए, तो वे पुरानी प्रथाओं को ही अपनाते रहेंगे। देश के अन्य हिस्सों में सर्दियों में तापमान ज्यादा रहता है जिससे वायु गुणवत्ता में उलटफेर कम होता है, और अन्य जगहों पर किसान पराली साफ करने के लिए पशुओं, बत्तखों आदि का इस्तेमाल करते हैं। सर्दियों में हर जगह वायु गुणवत्ता में गिरावट आती है, ले​किन उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में यह सबसे खराब स्थिति होती है।

ग्रेडेड रिस्पॉन्स ऐक्शन प्लान (ग्रेप) जैसे उपाय केवल अस्थायी समाधान मात्र हैं। पराली हटाने के लिए सुझाए गए बायोमास संग्रहण की योजनाओं में लाखों एकड़ भूमि को साफ करने के लिए व्यापक रसद और इंजीनियरिंग संबंधी समस्याएं शामिल हैं, साथ ही प्रदूषण के प्रभाव को कम करते हुए बिजली उत्पादन के वास्ते बायोमास को संकुचित और भस्म करने के लिए नवीन तकनीकों का उपयोग करना भी आवश्यक है। इसमें काफी खर्च होगा और ऐसी प्रणाली को लागू करने में दशकों लग सकते हैं।

इस संबंध में किसी भी नीति के लिए कई राज्यों के बीच समन्वय के साथ-साथ एक केंद्रीय पहल की भी आवश्यकता होगी। राजनीतिक बाधाओं को देखते हुए यह और भी मुश्किल हो जाता है। हर सर्दियों में आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो जाता है, जिसमें विभिन्न राज्य सरकारें एक-दूसरे पर आरोप लगाती हैं। उन्हें एक समन्वित नीति के कार्यान्वयन पर सहमत कराना व्यावहारिक रूप से असंभव लगता है।

आंकड़ों को भी ठीक से प्रस्तुत नहीं किया गया है। उदाहरण के लिए, मुख्य आंकड़ों में आमतौर पर उन दिनों की संख्या बताई जाती है जब एक्यूआई स्वीकार्य स्तर पर होता है। यह जानकारी तभी उपयोगी है जब इसकी तुलना बारिश वाले दिनों की संख्या से की जाए। उत्तर भारत में 2025 में मॉनसून लंबा चला, जिससे कई दिनों तक हवा साफ रही। वर्ष 2026 में मॉनसून की कमी से स्थिति बदल सकती है। अधिक बारिश वाला वर्ष यह नहीं दर्शाता कि मौजूदा नीति से कोई फर्क पड़ रहा है या नहीं। प्रस्तुत किए गए मासिक औसत एक्यूआई भी ज्यादा जानकारी नहीं देते, क्योंकि औसत आंकड़े उच्चतम स्तर को कम करके दिखाते हैं, जबकि प्रदूषण का उच्चतम स्तर जानना महत्त्वपूर्ण होता है।

उदाहरण के लिए, यह दावा करना कि दिल्ली में 200 दिन तक एक्यूआई स्वीकार्य स्तर पर था, यह नहीं बताता कि उच्च एक्यूआई वाले दिनों में स्थिति कितनी खराब रही होगी। एक भयावह उदाहरण लें जहां इसी तरह के आंकड़े भ्रामक साबित हो सकते हैं: द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हिरोशिमा और नागासाकी पर केवल एक-एक दिन बमबारी की गई थी, जबकि लंदन, टोक्यो और बर्लिन पर सैकड़ों बार बमबारी की गई थी।

आंकड़ों की गलत प्रस्तुति से नीतियों की आलोचना करना मुश्किल हो जाता है। अंततः, सफाई अभियान की पहल नागरिक समाज द्वारा इसे चुनावी मुद्दा बनाने या भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को लेकर चिंतित राजनेताओं द्वारा ही की जानी चाहिए। चीन ने ओलिंपिक की मेजबानी के लिए बोली लगाने के साथ ही सफाई अभियान शुरू किया। भारत में, इसका समकक्ष उदाहरण विदेशी क्रिकेट टीमों द्वारा उत्तर भारत में खेलने से इनकार करना हो सकता है। यह वास्तव में एक ऐसा मुद्दा हो सकता है जिस पर विचार करना उचित होगा क्योंकि यह मतदाताओं की भावनाओं को प्रभावित कर सकता है।

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First Published - January 20, 2026 | 9:44 PM IST

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