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बैंक फिलहाल मजबूत स्थिति में, लेकिन आगे दोहरी चुनौतियों का सामना संभव

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सूचीबद्ध निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का कुल शुद्ध मुनाफा 3.94 लाख करोड़ रुपये रहा जो अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा और वित्त वर्ष 2025 के मुकाबले 7.47 प्रतिशत अधिक है

Last Updated- June 12, 2026 | 12:03 AM IST
Banks

पिछले महीने बैंकों के तिमाही नतीजे जारी होने का सिलसिला थम गया। मगर सूचीबद्ध भारतीय बैंकों के तिमाही प्रदर्शन की पड़ताल करने से पहले यह देख लेते हैं कि वित्त वर्ष 2026 में उनका सफर कैसा रहा था। सूचीबद्ध निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का कुल शुद्ध मुनाफा 3.94 लाख करोड़ रुपये रहा जो अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा और वित्त वर्ष 2025 के मुकाबले 7.47 प्रतिशत अधिक है। निजी क्षेत्र के बैंकों का कुल शुद्ध मुनाफा 4.02 प्रतिशत बढ़कर 1.96  लाख करोड़ रुपये हो गया और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का मुनाफा 11.13 प्रतिशत बढ़कर 1.98 लाख करोड़ रुपये हो गया।सार्वजनिक क्षेत्र के सभी बैंकों का शुद्ध मुनाफा बढ़ गया।

यह बढ़ोतरी 1.65 प्रतिशत (पंजाब नैशनल बैंक) से लेकर 56.18 प्रतिशत (इंडियन ओवरसीज बैंक) के बीच है। दूसरी तरफ चार निजी बैंकों का शुद्ध मुनाफा कम हुआ है। ये बैंक हैं इंडसइंड बैंक (64.69 प्रतिशत), बंधन बैंक (55.43 प्रतिशत),  कोटक महिंद्रा बैंक (14.85 प्रतिशत) और ऐक्सिस बैंक (7.27 प्रतिशत)। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) 80,032 करोड़ रुपये के शुद्ध मुनाफे के साथ लाभ कमाने वाले बैंकों की सूची में सबसे ऊपर है।

वास्तव में कई बैंकों ने वित्त वर्ष 26 में फंसे ऋणों के लिए प्रावधान कम किए हैं। मगर तब भी बैंकिंग उद्योग में कुल प्रावधान 13.2 प्रतिशत बढ़कर 1.27 लाख करोड़ रुपये हो गया। पिछले साल सभी सूचीबद्ध बैंकों का जमा पोर्टफोलियो 11.43 प्रतिशत बढ़ा मगर क्रेडिट पोर्टफोलियो अधिक तेजी से यानी 15.36 प्रतिशत दर से बढ़ा। जमा और ऋण वृद्धि में अंतर निजी बैंकों (12.86 प्रतिशत बनाम 13.94 प्रतिशत) में पीएसबी (11.43 प्रतिशत बनाम 15.36 प्रतिशत) की तुलना में कम है। बड़े बैंकों में एसबीआई का जमा पोर्टफोलियो 11.03 प्रतिशत बढ़ा जबकि ऋण पोर्टफोलियो 17.16 प्रतिशत बढ़ा। कम से कम चार बैंकों ने जमा पोर्टफोलियो में 20 प्रतिशत या उससे अधिक वृद्धि दर्ज की है।

ऋण आवंटन में वृद्धि की बात करें तो आठ बैंक 20 प्रतिशत से अधिक वृद्धि दर्ज करने वाले समूह में हैं। जमा और ऋण वृद्धि में यह अंतर भारतीय बैंकिंग उद्योग के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। किसी बैंक को जुटाई गई प्रत्येक 100 रुपये जमा से 3रुपये नकद आरक्षी अनुपात (सीआरआर) के तौर पर आरबीआई के पास रखना होता है जिन पर उसे कोई ब्याज नहीं मिलता। इसके अलावा 18 रुपये सरकारी बॉन्ड (सांविधिक तरलता अनुपात के रूप में) खरीदने में इस्तेमाल होते हैं। इसका मतलब है कि बैंक के पास ऋण देनेके लिए 79 रुपये ही बच पाते हैं। फिलहाल ज्यादातर बैंक रकम की कमी का सामना कर रहे हैं।

अगर वे ऋण आवंटन में वृद्धि बनाए रखना चाहते हैं तो उन्हें जमा बढ़ाने के तरीके खोजने होंगे। आइए अब मार्च तिमाही के आंकड़ों पर लौटते हैं और इन पर नजर दौड़ाते हैं। शुद्ध गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों की बात करें तो इंडसइंड बैंक 1 प्रतिशत शुद्ध एनपीए के साथ सूची में सबसे ऊपर है। इसके बाद बंधन बैंक (97 आधार अंक) और तीसरे नंबर पर डीसीबी बैंक (89 आधार अंक) है। असल में इनमें 31 में से 23 बैंकों का शुद्ध एनपीए आधा प्रतिशत से भी कम है।

हमने आखिरी बार भारतीय बैंकों को इतनी  अच्छी हालत में कब देखा था? इंडसइंड बैंक का सकल एनपीए भी सबसे ज्यादा (3.43 प्रतिशत) है। इसके बाद बंधन बैंक (3.27 प्रतिशत), पीएनबी (2.95 प्रतिशत), यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (2.82 प्रतिशत), सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया (2.67 प्रतिशत), डीसीबीबैंक (2.45 प्रतिशत),  आईडीबीआई बैंक (2.32 प्रतिशत) और यूको बैंक (2.17 प्रतिशत) का नंबर आता है।

एक और जरूरी पैमाना जो बैंक के मुनाफे में अहम भूमिका निभाता है, वह है शुद्ध ब्याज मार्जिन यानी एनआईएम। आसान शब्दों में कहें तो यह बैंक की धन की लागत और उधार लेने वालों से होने वाली कमाई के बीच का अंतर है। बंधन बैंक का एनआईएम सबसे अधिक (6.2 प्रतिशत) है। इसके बाद आईडीएफसी फर्स्ट बैंक (5.75 प्रतिशत) का नंबर आता है। कई बैंकों का एनआईएम सालाना आधार पर कम हुआ है। सरकारी बैंकों के समूह में बैंक ऑफ महाराष्ट्र का एनआईएम सबसे ज्यादा 3.91 प्रतिशत है जो पहले 4.01 प्रतिशत था। एसबीआई का एनआईएम 3प्रतिशत से गिरकर 2.81 प्रतिशत हो गया।

हालांकि, केवल एनआईएम से पूरी कहानी पता नहीं चलती। किसी बैंक का एनआईएम अधिक हो सकता है क्योंकि वह बिना गारंटी वाले ऋण अधिक देता है और उसके फंसे ऋण बढ़ जाते हैं जबकि दूसरे बैंक का एनआईएम कम हो सकता है मगर ऋण लागत कम होने की वजह से वह फिर भी ठीक-ठाक मुनाफा कमा सकता है। चालू और बचत खाता (कासा) बैंक को पैसे की लागत कम रखने में मदद करते हैं। बैंक ऑफ महाराष्ट्र का कासा सबसे अधिक (52.51 प्रतिशत) है। इसके बाद आईडीएफसी फर्स्ट बैंक (49.8 प्रतिशत), सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया (47.3 प्रतिशत) और आईडीबीआई बैंक (44.59 प्रतिशत) आते हैं। कोटक महिंद्रा बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, ऐक्सिस बैंक और इंडियन ओवरसीज बैंक का कासा कम से कम 40 प्रतिशत है।  एसबीआई का कासा पोर्टफोलियो 39.46 प्रतिशत है और एचडीएफसी बैंक का 34.1 प्रतिशत है।

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा डॉलर की आमद के लिए रास्ते खोलने से बैंकों को रकम की कमी से निपटने में मदद मिल सकती है और लागत भी कम हो सकती है। इससे बैंकों को अपना एनआईएम बेहतर बनाने में मदद मिलेगी। कुल मिलाकर, बैंकों की स्थिति अच्छी है मगर दो मोर्चों पर चुनौतियां हैं। पहली बात तो यह कि उन्हें ऋण आवंटन में वृद्धि के लिए रकम की जरूरत है। दूसरी बात यह कि ऋण खंड के कुछ हिस्सों में दिक्कतें दिखनी शुरू हो गई हैं। आने वाले समय में ऋण लागत शायद उतनी कम न रहे जितनी अभी है।


(लेखक जन स्मॉल फाइनैंस बैंक में वरिष्ठ सलाहकार हैं) 

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First Published - June 12, 2026 | 12:03 AM IST

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