संयुक्त राष्ट्र ने 2026 को ‘अंतरराष्ट्रीय महिला किसान वर्ष’ घोषित किया है। इसका उद्देश्य कृषि-खाद्य मूल्य श्रृंखला में महिलाओं द्वारा निभाई जाने वाली विविध भूमिकाओं को रेखांकित करना है, जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। इसका उद्देश्य उन असमानताओं की ओर ध्यान आकृष्ट करना भी है जिनका सामना महिलाओं को मजदूरी की दरों, संसाधनों तक पहुंच, जमीन के मालिकाना हक, विकास के अवसरों और निर्णय लेने की प्रक्रिया में करना पड़ता है।
यह कदम भारत के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, जहां कृषि कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी 40 फीसदी से अधिक है और वे लगभग 80 फीसदी कृषि कार्य करती हैं। वे कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों, जैसे फसल उत्पादन, बागवानी, दुग्ध उत्पादन, रेशम उत्पादन, मत्स्य पालन और वानिकी की रीढ़ हैं। वे बोआई, पौधरोपण, रोपाई, निराई, गुड़ाई, कपास और कपास की डंडियां तोड़ना, खेतों से सब्जियां तोड़ना या निकालना, फसल कटाई के बाद प्रारंभिक प्रसंस्करण और कृषि उत्पादों की पैकिंग, और घास कटाई, गिरे हुए पेड़ों की टहनियों और कई प्रकार की जंगली जड़ी-बूटियों जैसे छोटे वन उत्पादों को इकट्ठा करने जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य करती हैं। घरेलू पशुओं की देखभाल भी अधिकतर महिलाएं ही करती हैं।
अनुमान है कि महिलाएं एक फसल के मौसम में औसतन लगभग 3,300 घंटे खेतों में काम करती हैं, जो पुरुषों के 1,860 घंटे के कार्य समय से काफी अधिक है। परिवार के लिए खाना पकाने, बच्चों की देखभाल करने और अन्य नियमित घरेलू कार्यों में लगने वाले समय और मेहनत को ध्यान में रखते हुए, महिलाओं का कार्यभार वास्तव में इससे कहीं अधिक है। फिर भी, उन्हें पुरुष किसानों के बराबर दर्जा नहीं मिलता। उन्हें भूमि स्वामित्व से वंचित रखा जाता है (मुश्किल से 13 फीसदी महिलाओं के नाम पर भूमि है), उन्हें अपेक्षाकृत कम मजदूरी दी जाती है, और सरकारी रिकॉर्ड में उन्हें ‘अवैतनिक पारिवारिक कामगार’ के रूप में दर्ज किया जाता है।
संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) द्वारा प्रस्तावित ‘महिला किसानों’ की परिभाषा काफी व्यापक है। इसमें वे सभी महिलाएं शामिल हैं जो औपचारिक या अनौपचारिक रूप से विभिन्न क्षमताओं में कृषि-खाद्य प्रणालियों के प्रबंधन में संलग्न हैं, जैसे किसान, नियमित या अस्थायी श्रमिक, मछुआरे, मधुमक्खी पालक, पशुपालक, वनपाल, प्रसंस्करणकर्ता, व्यापारी, ग्रामीण उद्यमी, पारंपरिक ज्ञान धारक और यहां तक कि महिला कृषि वैज्ञानिक भी। इस परिभाषा के अनुसार, भारतीय कृषि क्षेत्र में कार्यरत महिलाओं में 33 फीसदी श्रमिक (मेहनताना पाने वाली) और 48 फीसदी स्वरोजगार में लगी यानी अपने परिवार के खेतों पर काम करने वाली महिलाएं हैं।
पिछले कुछ दशकों में ग्रामीण पुरुषों, विशेषकर युवाओं का शहरी क्षेत्रों में गैर-कृषि रोजगार की तलाश में पलायन तेजी से बढ़ा है। शिक्षित युवाओं द्वारा उच्च स्तर की दफ्तर वाली नौकरियां और अन्य लोगों द्वारा श्रम कार्य जैसे रोजगार तलाशे जा रहे हैं। कृषि, विशेष रूप से फसल उत्पादन की लाभप्रदता में लगातार गिरावट और भूमि से होने वाली कुल आय में कमी को पलायन के प्रमुख कारणों में से एक माना जाता है। हालांकि, इसका नतीजा यह है कि भारतीय कृषि में महिलाओं की भागीदारी बढ़ती जा रही है, जिससे महिलाओं की जिम्मेदारियां बढ़ रही हैं और कृषि विकास के लिए महिला-केंद्रित नीतियों और कार्यक्रमों पर अधिक जोर देना आवश्यक हो गया है।
कृषि नीति व्यवस्था में इस तरह के व्यापक बदलाव की आवश्यकता पर मार्च में नई दिल्ली में आयोजित कृषि-खाद्य प्रणालियों में महिलाओं पर तीन दिवसीय वैश्विक सम्मेलन में भी बल दिया गया था। इस सम्मेलन में पारित प्रस्तावों में कृषि में महिलाओं का समर्थन करने के लिए नीतियों की पुनर्रचना करने, जागरूकता बढ़ाने, अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने और संसाधनों को जुटाने का आह्वान किया गया। इसके अलावा, इसमें महिला किसानों के लिए भूमि, संसाधन, प्रौद्योगिकी, वित्त और बाजार तक समान पहुंच सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया। भारत सरकार ने भी कृषि विकास के प्रयासों में महिलाओं को अधिक प्रभावी ढंग से एकीकृत करने की अपनी दृढ़ प्रतिबद्धता को दोहराया।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) द्वारा कृषि में महिलाओं की भूमिका पर किए गए अध्ययनों से पता चला है कि समान अवसर मिलने पर महिलाएं उद्यमिता में पुरुषों से पीछे नहीं रहतीं। आईसीएआर की वार्षिक रिपोर्ट 2022-23 में कहा गया है: ‘जब महिलाओं को प्रौद्योगिकी, संसाधनों और सेवाओं तक समान पहुंच मिलती है, तो वे अपने उद्यमों के माध्यम से मजबूत आर्थिक परिणाम उत्पन्न करने में सक्षम होती हैं। ग्रामीण महिलाओं के लिए लघु स्तर पर मुर्गी पालन, पशुपालन और मछली के मूल्यवर्धन से संबंधित उद्यमिता मॉडलों को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है।’
महिला उद्यमशीलता कौशल के महत्त्व का प्रमाण किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के प्रसार में उनकी उल्लेखनीय भूमिका से भी मिलता है। फरवरी के अंत तक अस्तित्व में आए लगभग 10,000 एफपीओ में से 1,175 एफपीओ में 100 फीसदी महिला सदस्य हैं, यानी उनमें महिला सदस्यों की ही पूर्ण हिस्सेदारी है। शेष एफपीओ में से 1,084 में 50 से 99 फीसदी महिला सदस्य हैं। महिला सदस्यों वाले एफपीओ की संख्या के मामले में ओडिशा, झारखंड, बिहार, महाराष्ट्र और तेलंगाना अग्रणी राज्यों में शामिल हैं।
रोचक बात यह है कि प्रख्यात कृषि विशेषज्ञ, दिवंगत एमएस स्वामीनाथन, अक्सर यह मत व्यक्त करते थे कि फसलों को मूल रूप से महिलाओं द्वारा ही घरों के उपभोग लायक बनाया गया था, क्योंकि उन्होंने कृषि की कला और विज्ञान की शुरुआत की। यह भी व्यापक रूप से माना जाता है कि महिलाओं ने ऐतिहासिक रूप से भूमि, जल, वनस्पति और जीव-जंतुओं सहित मूलभूत जीवन-सहायक संसाधनों के संरक्षण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।
अतः यह स्पष्ट है कि भारतीय कृषि में महिलाएं हमेशा से ही आधारशिला रही हैं, अभी भी हैं और आगे भी रहेंगी। इसलिए, उन्हें कृषि-ग्रामीण विकास में प्रभावी भूमिका निभाने के लिए, विशेष रूप से कृषि में पिछड़े क्षेत्रों में उपयुक्त संसाधनों और तकनीकी ज्ञान से सशक्त बनाना आवश्यक है।