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चीन ने AI में अपनाया अलग रास्ता: लेट-मूवर एडवांटेज से मिल सकता है फायदा

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आर्टिफिशल इंटेलिजेंस एक ऐसा क्षेत्र है जहां देरी से प्रवेश करने पर अधिक लाभ होता दिख रहा है। बता रहे हैं श्याम सरन

Last Updated- April 14, 2026 | 9:56 PM IST
AI
इलेस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा

शांघाई में एक हालिया सम्मेलन में आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) के क्षेत्र में चीन की रणनीति की झलक देखने को मिली। आयोजन में चीन के एआई संबंधी प्रयासों के अगुआ एकत्रित हुए जो इसके विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और राज्य तथा निजी निगमों के नेटवर्क से संबद्ध हैं। वे यह चर्चा करने के लिए एकत्रित हुए थे कि चीन ने एआई के क्षेत्र में क्या प्रगति की है, उसकी क्या सफलताएं रही हैं और भविष्य की योजनाएं क्या हैं?

यह भारत के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक और रुचिकर होना चाहिए, जिसके एआई मिशन के लक्ष्य काफी महत्त्वाकांक्षी हैं, लेकिन अभी तक भारतीय संसाधनों और क्षमताओं के अनुरूप कोई रणनीति स्पष्ट रूप से प्रस्तुत नहीं की गई है।

चीन ने अपने लिए एआई के जो मानक तय किए हैं उसे देखते हुए वह जीत को लेकर आश्वस्त है। यह आत्मविश्वास इतना अधिक है कि इसने दंभ का रूप ग्रहण कर लिया है। वे केवल अमेरिका को ही अपना प्रतिस्पर्धी मानते हैं। बाकी कोई देश तो उसके आसपास भी नहीं है। भारत को तस्वीर में कहीं गिना ही नहीं जा रहा है। अमेरिका के साथ होड़ में चीन अमेरिका से अलग रणनीति का इस्तेमाल कर रहा है।

अमेरिका में जहां गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, मेटा, ऐपल, एमेजॉन और एनवीडिया जैसी कुछ कंपनियां ही इस काम में लगी हैं वहीं चीन में इस क्षेत्र में कई संस्थान काम कर रहे हैं। अमेरिका के बारे में कहा गया कि वह ‘जादुई समाधान’ तलाश रहा है। यानी एक विशिष्ट स्वामित्व वाली आर्टिफिशल जनरल इंटेलिजेंस (एजीआई), जो सभी मानवीय समस्याओं का समाधान कर देगी। दूसरी ओर, चीन एक सर्वव्यापी, मुक्त-स्रोत और गहराई से अंतर्निहित एआई नेटवर्क का निर्माण कर रहा है, जो भौतिक और आर्थिक दुनिया के हर पहलू में समाया हुआ है, लेकिन जिस पर पार्टी-राज्य का रणनीतिक नियंत्रण है।

अकादमिक स्रोत ​शिन्हुआ जैसे विश्वविद्यालयों में निहित है जिन्हें पूरब के एमआईटी के रूप में जाना जाता है। इंस्टीट्यूट ऑफ एआई इंडस्ट्री रिसर्च यहीं है। पीकिंग यूनिवर्सिटी बुनियादी शोध और एआई के एथिक्स का नेतृत्व करती है जबकि शांघाई की फुदान यूनिवर्सिटी एआई को वित्त और अर्थशास्त्र से जोड़ने का केंद्र है।

कारोबारी नेतृत्व करने वालों की बात करें तो उनमें अलीबाबा का क्वेन मॉडल और बाइटडांस आदि शामिल है जो टिकटॉक और दोउयिन के अपने भारी भरकम दृश्य और टेक्स्ट डेटा के साथ शक्तिशाली मॉडल तैयार करती हैं। आईफ्लाइटेक जैसी कंपनियां वॉयस और अनुवाद पर ध्यान केंद्रित किए हुए हैं जबकि सेंसटाइम जैसी कंपनियां दृश्य संबंधी काम कर रही हैं। प्रयोगशालाओं और बाजार के बीच एक लगातार विशिष्ट फीडबैक लूप कायम हैं।

सम्मेलन ने विनिर्माण और रोबोटिक्स में, औषधि उद्योग में और रक्षा क्षेत्र में (स्वॉर्म तकनीक और स्वायत्त लॉजिस्टिक्स विकसित करने के लिए) इस ‘ऐप्लीकेशन’ मॉडल के उदाहरण प्रस्तुत किए। यह दृष्टिकोण मुक्त-स्रोत के प्रति नीति प्रतिबद्धता पर आधारित है, जो तेजी से आत्मसात करने की अनुमति देता है। लक्ष्य है एआई का ‘लिनक्स’ बनना। यानी एक बुनियादी परत, जिसे हर कोई अपना सकता है क्योंकि यह निःशुल्क और कुशल है। यह वैश्विक तकनीकी मानक स्थापित कर सकता है, जबकि अमेरिका अपने श्रेष्ठ मॉडलों को स्वामित्व के पीछे छिपाकर रखता है।

एक से अधिक वक्ताओं ने चेतावनी दी कि अमेरिका में एक विशाल एआई बुलबुला बन रहा है, जिसमें अरबों डॉलर लगातार और अधिक शक्तिशाली मॉडलों की खोज में लगाए जा रहे हैं, जबकि उत्पादकता लाभ और संभावित मुनाफे अभी भी मुख्यतः भविष्य की अपेक्षाएं हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी गिरावट का पैमाना 2007-2008 के वैश्विक वित्तीय संकट से कहीं अधिक होगा, जिसके परिणाम आज भी सामने आ रहे हैं।

सबसे दिलचस्प बातचीत में से एक चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के ‘पार्टी स्कूल’ के एक वरिष्ठ पदाधिकारी के साथ हुई, जो पार्टी के लिए वैचारिक स्रोत का काम करता है। उन्होंने पार्टी के युवा कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों के बीच चल रही एक सक्रिय बहस का जिक्र किया, जिसका विषय था – आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के वर्चस्व वाले भविष्य में पार्टी की प्रासंगिकता और भूमिका। कुछ लोगों ने यह तर्क दिया था कि एआई वाले भविष्य में पार्टी अपना औचित्य खो सकती है, और समाजवाद या पूंजीवाद जैसे किसी भी ‘वाद’ के लिए शायद कोई जगह न बचे। लेकिन ऐसे ‘भ्रामक’ विचारों को पूरी तरह से खारिज कर दिया गया।

यह ज़ोर देकर कहा गया कि एआई को सही दिशा देने के लिए पार्टी के विवेक और मार्गदर्शन की ज़रूरत और भी ज़्यादा होगी, और एआई चीन के लिए एक समाजवादी भविष्य को बढ़ावा देने में पार्टी के हाथों में एक शक्तिशाली हथियार बन जाएगा। पार्टी यह सुनिश्चित करेगी कि एआई केवल शेयरधारकों का फायदा करने के बजाय, पूरे समाज की भलाई के लिए काम करे। यह देखना दिलचस्प था कि पार्टी के मंचों पर इस तरह की बहसें हो रही थीं।

भारत को एआई विकास की दिशा में एक मितव्ययी मार्ग अपनाना होगा। भारत के पास अमेरिका और चीन जैसे संसाधन नहीं हैं। भारत एआई मिशन ने लगभग 10,300 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं, जो तुलनात्मक रूप से मामूली राशि है। अमेरिकी या चीनी मॉडलों पर निर्भर रहना, भले ही वे मुक्त-स्रोत हों, जोखिम पैदा करता है। लेकिन अवसर मौजूद हैं। चीन की तरह भारत भी ‘ऐप्लीकेशन-प्रथम’ दृष्टिकोण अपना रहा है। ‘भाषिणी’ जैसे प्रोजेक्ट एआई का उपयोग करके भारत की 22 आधिकारिक भाषाओं के बीच बाधाओं को तोड़ रहे हैं।

एआई का ‘इंडिया स्टैक’ में एकीकरण, जिसमें डिजिटल पहचान और भुगतान शामिल हैं, सामाजिक उपयोगिता पर स्पष्ट ध्यान केंद्रित करता है। भारतीय स्टार्टअप छोटे भाषा मॉडलों (80 लाख से 1 अरब पैरामीटर वाले एसएलएम) का उपयोग कर रहे हैं, ताकि लागत-प्रभावी समाधान तैयार किए जा सकें, जो स्थानीय उपकरणों पर चल सकें और विदेशी क्लाउड्स पर डेटा प्रवाह की आवश्यकता न हो।

ग्राफिक प्रोसेसिंग यूनिट्स (जीपीयू) वह ‘तेल’ हैं जिन पर एआई चलता है। एक सामान्य कंप्यूटर में केंद्रीय प्रोसेसिंग यूनिट्स (सीपीयू) क्रमिक रूप से, एक समय में एक कदम उठाती है, जबकि जीपीयू समानांतर रूप से काम करते हैं। जब जेमिनाई या चैटजीपीटी जैसे एआई ‘सोचते’ हैं, तो वे विशाल मात्रा में डेटा को कई, लगभग एक साथ होने वाले चरणों में संसाधित करते हैं। भारत का लक्ष्य है कि वर्तमान 38,000 जीपीयू के भंडार को वर्ष के अंत तक 1,00,000 तक बढ़ाया जाए और 2030 तक 10 से 20 लाख तक पहुंचाया जाए।

सरकार स्टार्टअप्स द्वारा ऐप्लीकेशन विकास को प्रोत्साहित करने के लिए जीपीयू ‘टाइम’ को केवल 65 रुपये प्रति घंटे की सब्सिडी दर पर सेवा के रूप में उपलब्ध करा रही है। अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। अमेरिका के पास फिलहाल 50 से 70 लाख जीपीयू का भंडार है, और चीन के पास 15 से 25 लाख। अमेरिका का लक्ष्य 2035 तक 2.5 से 3 करोड़ जीपीयू तक पहुंचना है और चीन उसी तारीख तक 1 से 1.5 करोड़ तक पहुंचने की योजना बना रहा है।

एआई एक ऐसा क्षेत्र है जहां देर से आने का लाभ भारत में अधिक आशाजनक प्रतीत होता है। चीन की तरह, भारत के लिए भी यह समझदारी होगी कि वह एजीआई के ‘जादुई समाधान’ का पीछा करने के बजाय आर्थिक और सामाजिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाने वाले ऐ​प्लिकेशन पर ध्यान केंद्रित करे।


(लेखक पूर्व विदेश सचिव हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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First Published - April 14, 2026 | 9:56 PM IST

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