अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप से पद पर रहते हुए अगर एक काम की अपेक्षा थी तो वह यह कि वह चीन का मुकाबला करेंगे। अपने पूरे राजनीतिक करियर में और उससे पहले भी उन्होंने बार-बार कहा है कि अमेरिका और चीन के बीच व्यापार की शर्तें अनुचित हैं। हालांकि पिछले सप्ताह उनकी चीन यात्रा से निकला बड़ा सबक यही है कि ट्रंप की प्रमुख परियोजना नाकाम रही है। उन्होंने बस हार मान ली है।
चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने भी जब अमेरिका-चीन संबंधों की वर्तमान स्थिति को ‘रचनात्मक रणनीतिक स्थिरता’ बताया तो उनका यही आशय था। इसका अर्थ यह भी है कि इस समय कोई बात बिगाड़ने की कोशिश नहीं कर रहा बल्कि वास्तव में संबंध सुधारने की कोशिश हो रही है। दूसरा, कोई विघटनकारी बदलाव अपेक्षित नहीं है और इस प्रकार चीन का उभार बिना बाधा जारी रहेगा। ट्रंप ने राष्ट्रपति का पद संभालते समय इसकी उम्मीद नहीं की होगी। परंतु जब उन्होंने पूरी दुनिया पर शुल्क लगाने का सिलसिला शुरू किया तो उनके लिए सबसे स्पष्ट सबक यही था कि कंबोडिया या वियतनाम जैसे देशों के पास पलटवार करने का कोई तरीका नहीं हो सकता, यूरोपीय संघ आदि के देश शायद ऐसा करने को तैयार न हों, लेकिन चीन न केवल अमेरिका को आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचाने में सक्षम है बल्कि ऐसा करने के लिए वह पूरी तरह तैयार भी है।
इस प्रकार हम एक विरोधाभासी स्थिति में पहुंच गए कि एक व्यापार नीति जिसे मूल रूप से चीनी आपूर्ति श्रृंखलाओं और विनिर्माण की अतिरिक्त क्षमता के जवाब में तैयार किया गया और उचित ठहराया गया था, उसे चीन को छोड़कर बाकी सभी के खिलाफ इस्तेमाल किया गया। ट्रंप को उनकी बुद्धिमानी के लिए नहीं जाना जाता है लेकिन वह बहुत जल्दी यह समझ गए कि शुल्क की धमकी देकर चीन को रियायतों के लिए विवश नहीं किया जा सकता है।
दुर्लभ खनिजों और उनसे बने आवश्यक उत्पादों जैसे मैग्नेट आदि पर उसका नियंत्रण पर्याप्त प्रतिरोधक है। बहुत जल्दी एक गतिरोध उभर आया जिसे तोड़ने का कोई तरीका ट्रंप के पास नहीं था।
इस यात्रा के दौरान बाहर आने वाली तमाम खबरें इस नई वास्तविकता को दर्शाती थीं। प्रमुख बातें ताइवान पर केंद्रित रहीं और जो भी बातें सामने आईं वे अमेरिका की नहीं चीन की मंशा के अनुसार ही बाहर आईं। यह चीन की प्राथमिकता का मुद्दा है। ट्रंप उन तमाम मुद्दों पर मौन रहे जिन पर वह लंबे समय से चिंता जताते रहे हैं। इनमें चीन के खुले तौर पर अपनाए जा रहे व्यापारिक स्वार्थ से लेकर, इस्पात और रसायनों तक अहम उद्योगों में उसकी अतिरिक्त क्षमता जैसी बातें शामिल हैं।
दूसरी ओर, अमेरिका में चीन-विरोधी नीति निर्माता और पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चिंतित नीति-निर्माता यह मानेंगे कि स्थिति इससे भी बदतर हो सकती थी। वास्तविक चिंता यह थी कि ट्रंप की लंबे समय से प्रतीक्षित यात्रा एक नए जी-2 के अनौपचारिक गठन को जन्म दे सकती है और क्षेत्र की सुरक्षा के प्रति उनकी स्पष्ट उदासीनता तथा पश्चिम पर ध्यान केंद्रित करने से वे मूलतः चीन के पड़ोस में प्रभाव क्षेत्र के अधिकार को स्वीकार कर लेंगे जिसमें लंबे समय से अमेरिका के सहयोगी और साझेदार भी शामिल हैं।
ट्रंप यह कहते हुए पाए गए कि वह अमेरिकी सैन्य बलों के ‘9,500 मील दूर जाकर युद्ध लड़ने’ को लेकर उत्साहित नहीं हैं जो ताइवान की स्वतंत्रता की घोषणा से उत्पन्न हो सकता है, लेकिन उन्होंने इस द्वीप की अमेरिकी रक्षा को लेकर ‘रणनीतिक अस्पष्टता’ की नीति से और अधिक दूरी नहीं बनाई, जो हाल के वर्षों में एक सामान्य चलन रहा है। बताया जाता है कि शी चिनफिंग ने बंद कमरों में हुई बैठकों में इस विषय पर और साथ ही ताइवान को हथियारों की बिक्री पर, विशेष रूप से 14 अरब डॉलर के सौदे पर, जोर डाला। जिसके बारे में ट्रंप ने कहा कि वह बहुत जल्दी निर्णय लेंगे। चीनी मीडिया के मुताबिक राष्ट्रपति ने कहा कि ताइवान का प्रश्न चीन-अमेरिका संबंधों में सबसे महत्त्वपूर्ण मुद्दा है।
दूसरी ओर, चीन को भी वह सब कुछ नहीं मिला जिसकी उसे चाह थी। ट्रंप द्वारा चिनफिंग की अत्यधिक प्रशंसा ने प्रचार मशीन को पर्याप्त सामग्री दी लेकिन राष्ट्रपति के साथ एयर फोर्स वन में गए बड़े कारोबारियों की फौज को किसी बड़े कारोबारी सौदे के रूप में कामयाबी नहीं मिली। उदाहरण के लिए, एनवीडिया के जेनसन हुआंग भी उनमें शामिल थे लेकिन चीन को किस उच्च-स्तरीय चिप तक पहुंच मिलेगी इस पेचीदा प्रश्न का समाधान इस यात्रा में नहीं हुआ। दूसरी ओर, हुआंग ने अपनी चिरपरिचित चमड़े की जैकेट पहनकर एक स्ट्रीट फूड मार्केट में झाझियांग सॉस वाली नूडल्स खाई। यह खबर चीन की अति-राष्ट्रवादी इंटरनेट जमात को इस तथ्य से भटकाने के लिए पर्याप्त थी कि देश को जिन महत्त्वपूर्ण तकनीकी रियायतों की चाह थी, वे उसे नहीं मिल पाईं।
ट्रंप की एक दिक्कत यह है कि उन्होंने एक साथ बहुत सारी चीजों पर ध्यान केंद्रित किया है। यदि वह चीन के साथ गतिरोध समाप्त करना चाहते हैं तो ऐसे में होर्मुज स्ट्रेट के रूप में एक और गतिरोध कतई मददगार नहीं साबित हो सकता है। उन्होंने दावा किया कि शी ने उन्हें आश्वस्त किया कि ईरान को चीनी हथियार नहीं मिलेंगे, लेकिन बैठक पर चीन की अपनी रिपोर्ट ने इस विषय पर कोई नई बात नहीं कही।
एक वर्ष बीतने के बाद शायद ट्रंप इस तथ्य को स्वीकार करने लगे हैं कि वह दुनिया को अपनी इच्छानुसार नहीं बदल सकते। यहां तक कि अमेरिका को नया रूप देना भी शायद बहुत कठिन कार्य हो सकता है। अगर वह केवल व्हाइट हाउस को नया रूप देने पर ही संतोष कर लें तो भी हमें बहुत चकित नहीं होना चाहिए। निश्चित रूप से यही वह मुख्य सबक प्रतीत होता है जो उन्होंने चीन की राजकीय यात्रा से लिया। अपने सोशल नेटवर्क ट्रुथ सोशल पर उन्होंने पीपल्स ग्रेट हॉल के बाहर शी चिनफिंग के साथ अपनी एक तस्वीर पोस्ट की और कहा, ‘चीन के पास एक बॉलरूम है, और अमेरिका के पास भी होना चाहिए!’ उन्होंने विवादास्पद नए व्हाइट हाउस विंग को ‘सितंबर 2028 के आसपास’ में खोलने का वादा किया।
अदालतों ने उनकी इस पसंदीदा निर्माण परियोजना को आगे बढ़ने से रोकने की कोशिश की है। फिर भी यह कहीं अधिक संभावित है कि तब तक व्हाइट हाउस में एक नया बॉलरूम होगा, बजाय इसके कि वे शी के साथ अपने गतिरोध को तोड़ पाएं।