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हर किसी को पसंद है अच्छा GST, लेकिन सिस्टम की खामियां समझते हैं नेता

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विभिन्न दलों के राजनेता इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि माल एवं सेवा कर के वर्तमान ढांचे में आखिर क्या खामियां हैं। बता रहे हैं अजय शाह और अरविंद मोदी

Last Updated- April 17, 2026 | 9:40 PM IST
GST
इलेस्ट्रेशन- अजय कुमार मोहंती

माल एवं सेवा कर (जीएसटी) आज भारत की सफलता पर बोझ की मानिंद हो चुका है। जीएसटी जिस प्रकार काम करता है वह निवेश, निर्यात और उत्पादकता में बाधा डालता है। अमेरिका में संरक्षणवाद और ईरान में युद्ध के कारण उत्पन्न हुई नई आर्थिक तनाव की लहर का सामना करने के दौर में भारत में बेहतर आर्थिक नीति तंत्र की सख्त जरूरत है। अब वक्त आ गया है कि जीएसटी सुधारों को पूरा किया जाए।

जीएसटी के लंबे सफर की शुरुआत तब हुई जब हममें से कुछ लोगों ने 2004 में राजकोषीय जवाबदेही और बजट प्रबंधन यानी एफआरबीएम के कार्यान्वयन पर विजय केलकर रिपोर्ट तैयार की। इस रिपोर्ट में जीएसटी की पूरी रूपरेखा और आर्थिक रणनीति में इसकी महत्ता को दिखाया गया था। सभी महत्त्वपूर्ण विचारों की तरह यह भी एक नए विचार के रूप में शुरू हुआ था। विशेषज्ञ समुदाय में इसे स्वीकार्यता मिली और फिर नीतिगत समुदाय में व्यापक रूप से यह स्वीकार कर लिया गया। नीतिगत सहमति बनने के बाद इस विचार को क्रियान्वयन के लिए तैयार माना गया।

हालांकि, सहमति बनाने के लिए शुरुआत में डिजाइन के मामले में जो समझौते किए गए उससे मूल्यवर्धित कर के बुनियादी सिद्धांतों के साथ ही समझौता हो गया। इन पर सभी राजनीतिक दलों ने समझौता किया। इसलिए इसका दोष तो अधिकांश को साझा करना होगा। अब 2026 में अच्छी बात यह है कि सभी लोग इन गलतियों को स्पष्ट तरीके से देख पा रहे हैं। एक अच्छे और सरल कर का महत्त्व अब सभी समझते हैं।

एकल कम दर, व्यापक आधार, पूर्ण इनपुट टैक्स क्रेडिट, पारंपरिक अप्रत्यक्ष करों मसलन विभिन्न उपकर का अंत, निर्यात की शून्य रेटिंग और सीमा पर ही आयात पर जीएसटी। अब भारतीय राजनीति में इस बात पर सहमति है कि जीएसटी को इन क्षेत्रों में सुधार करने की आवश्यकता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1 जुलाई 2017 को संसद के केंद्रीय कक्ष में जीएसटी को ‘गुड ऐंड सिंपल टैक्स’ (अच्छा और सरल कर) बताया था लेकिन अनेक दरें, उपकर, जीएसटी छूट और इनपुट टैक्स क्रेडिट में जटिलताएं आधार को खंडित कर चुकी हैं जिससे सरलता और दक्षता दोनों कमजोर हो गई हैं। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जीएसटी परिषद की हालिया ब्रीफिंग में जोर देकर कहा कि जीएसटी राजस्व मजबूत हैं और यह व्यवस्था स्थिर हो रही है। हालांकि राजस्व में सुधार डिजाइन की गुणवत्ता का संकेतक नहीं है। वास्तविक विपरीत प्रभाव जिसकी वित्त मंत्रालय को चिंता करनी चाहिए वह है आर्थिक वृद्धि।

पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने तर्क दिया कि ‘जीएसटी बहुत जटिल है और इसे कम दरों की दिशा में ले जाना चाहिए।’ यह निदान दिशा के लिहाज से सही है लेकिन अधूरा है। जीएसटी की कमजोरियां केवल दरों की बहुलता तक सीमित नहीं हैं। उदाहरण के लिए, यदि क्रेडिट श्रृंखला भंग रहती है तो एक सरल दर संरचना भी दक्षता नहीं ला सकती।

राहुल गांधी ने 2017 से 2019 के बीच चुनावी भाषणों में बार-बार जीएसटी को ‘गब्बर सिंह टैक्स’ कहा है, खासकर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के संदर्भ में। छोटे व्यवसायों पर सही में बोझ है लेकिन यह वर्तमान भारतीय जीएसटी डिजाइन की कमजोरियों को दर्शाता है, न कि उस जीएसटी को जो सही तरीके से लागू किया जाए। सीमा-प्रभाव, अनुपालन की जटिलताएं और टूटी क्रेडिट श्रृंखलाएं अनौपचारिकता को कम करने के बजाय उसमें इजाफा करती हैं।

द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम के एमके स्टालिन का कहना है कि जीएसटी राज्यों की राजकोषीय स्वायत्तता पर असर डालता है। यह चिंता थोड़ी अतिरंजित जान पड़ती है। राज्यों को जीएसटी राजस्व का 71 फीसदी हिस्सा मिलता है और प्रमुख गैर जीएसटी कर आधार पर उनका पूर्ण नियंत्रण है। उदाहरण के लिए अल्कोहल, ईंधन और संपत्ति आदि। एक प्रमुख कठिनाई इस बात में भी है कि राज्यों ने जीएसटी परिषद में अपनी भूमिका का उपयोग अपने हितों को प्रतिबिंबित करने के लिए किस तरह से किया है।

आम आदमी पार्टी के राघव चड्ढा ने 2024 में राज्य सभा में पॉपकॉर्न जैसी रोजमर्रा की चीजों पर विविध जीएसटी दरों की आलोचना की थी। ऐसी विसंगतियां इस विभाजित व्यवस्था के लक्षण हैं। इन ढांचों को जीएसटी परिषद के भीतर मंजूरी हासिल है।

जवाबदेही की कमी को साफ तौर पर महसूस किया जा सकता है। तृणमूल कांग्रेस के अभिषेक बनर्जी ने तर्क दिया है कि ‘जीएसटी ने राज्यों की वित्तीय स्थिति को नुकसान पहुंचाया है और उपभोक्ताओं पर बोझ डाला है।’ हालांकि, उपभोक्ताओं पर बोझ मुख्य रूप से छूटों और इनपुट टैक्स क्रेडिट पर लगाए गए प्रतिबंधों से उत्पन्न होता है।

समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने कहा है कि ‘जीएसटी ने अनुपालन को जटिल बना दिया है और व्यापारियों को नुकसान पहुंचाया है।’ अनुपालन की चुनौतियां खुद जीएसटी से नहीं बल्कि संरचनात्मक डिजाइन से उत्पन्न होती है। अनेक दरें, सीमा-प्रभावों की असंगतियां और क्रेडिट प्रतिबंध जटिलता को बढ़ाते हैं। सरलीकरण के लिए केवल दरें कम करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि एक स्वच्छ क्रेडिट श्रृंखला को बहाल करना आवश्यक है।

तृणमूल कांग्रेस की ही ममता बनर्जी ने तर्क दिया है कि ‘जीएसटी ने राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता को कमजोर कर दिया है।’ राज्यों के पास जीएसटी परिषद में दो-तिहाई मतदान शक्ति है और उन्होंने इसके सभी प्रमुख निर्णयों का समर्थन किया है। उनके पास जीएसटी को आकार देने में भी महत्त्वपूर्ण शक्तियां हैं। इसलिए मुद्दा स्वायत्तता का नुकसान नहीं, बल्कि राज्यों में परिष्कृत सार्वजनिक-वित्त नीति और जीएसटी परिषद में उनकी शक्तियों का प्रयोग है।

वाईएसआर कांग्रेस के वाईएस जगन मोहन रेड्डी ने कहा है कि ‘जीएसटी ने केंद्र पर निर्भरता बढ़ा दी है।’ राजस्व की अनिश्चितता एक खंडित आधार संरचना और छूटों को दर्शाती है। इनपुट टैक्स क्रेडिट को बहाल करके कर की अखंडता को मजबूत करना स्थिरता और वित्तीय क्षमता दोनों में सुधार करेगा।

तेलुगु देशम पार्टी और बीजू जनता दल दोनों ने चिंता जताई है कि ‘जीएसटी ने राज्यों के लिए राजस्व की अनिश्चितता पैदा की है।’ फिर भी इन दलों द्वारा शासित राज्यों ने जीएटसी परिषद के उन निर्णयों में हिस्सा लिया और उनका समर्थन किया, जिन्होंने छूटों और दरों के फैलाव के माध्यम से आधार को खंडित किया। इसलिए उत्पन्न दबाव संस्थागत बाधाओं जितना ही सामूहिक नीति विकल्पों को भी दर्शाता है।

केरल के लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट ने जीएसटी को प्रतिगामी करार दिया है। उसके मुताबिक एक स्वच्छ जीएसटी, जिसमें पूर्ण इनपुट टैक्स क्रेडिट, व्यापक आधार और लक्षित प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण शामिल हो, वर्तमान संरचना की तुलना में अधिक प्रगतिशील होगा।

भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में लगभग सभी एक बेहतर जीएसटी चाहते हैं जिसमें छह तत्व हों: पहला, 8-12 फीसदी जैसी एकल कम दर, एक व्यापक आधार, पूर्ण इनपुट टैक्स क्रेडिट, सभी पारंपरिक अप्रत्यक्ष करों मसलन उपकरों आदि का खात्मा, निर्यात की शून्य रेटिंग और आयात पर सीमा पर ही जीएसटी।

अब आवश्यकता एक और क्रमिक समायोजन की नहीं, बल्कि एक नई राजनीतिक चर्चा की है। संसद में एक समर्पित, पूरे दिन की चर्चा जो केवल जीएसटी डिजाइन, उसकी संरचनात्मक विकृतियों और जीएसटी परिषद की भूमिका पर केंद्रित हो। यही सभी राजनीतिक दलों को अपनी असंतुष्टि को सुधारों पर साझा सहमति में बदलने में मदद करेगी।


(लेखक क्रमश: एक्सकेडीआर फोरम में शोधकर्ता और पुणे इंटरनैशनल सेंटर एवं एक्सकेडीआर फोरम से संबद्ध हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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First Published - April 17, 2026 | 9:28 PM IST

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