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जमीनी हकीकत: वायु प्रदूषण से निपटने के लिए हो सार्थक पहल, तैयारियों के बीच असल समस्या पर किसी का ध्यान ही नहीं

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2019 में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MOEFCC) ने राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) की शुरुआत की जिसका मकसद शहरों की वायु गुणवत्ता को सुधारना था।

Last Updated- August 12, 2024 | 11:40 PM IST
Delhi Air Pollution

वायु प्रदूषण की समस्या अब घातक हो चुकी है। अब यह बहस का मुद्दा भी नहीं है। हम लोगों में से अधिकांश लोग जो गैस चैंबर जैसे शहरों में जी रहे हैं, उन्हें मालूम है कि सांस लेने के लिए यह हवा सही नहीं है। लेकिन हम इसके बारे में क्या कर रहे हैं? यहीं से समस्या उतनी ही गहरी हो जाती है जितनी कि इस प्रदूषित हवा में हम सांस लेने के लिए बाध्य हैं। हम यह जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर हम साफ नीले आसमान और स्वस्थ फेफड़े की लड़ाई में जीत हासिल क्यों नहीं कर पा रहे हैं।

वर्ष 2019 में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MOEFCC) ने राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) की शुरुआत की जिसका मकसद शहरों की वायु गुणवत्ता को सुधारना था। इस कदम का अर्थ यह है कि उच्चतम न्यायालय के बजाय सरकारें वायु प्रदूषण पर कार्रवाई करेंगी।

प्रदूषण की समस्या से सबसे ज्यादा जूझने वाले 131 शहरों के लिए साफ हवा के लक्ष्य तय किए गए। इन शहरों को वर्ष 2017 की तुलना में 2024 तक हवा के ठोस प्रदूषित कणों में 20-30 प्रतिशत की कमी लाने का लक्ष्य दिया गया था जिसे बाद में बढ़ाकर वर्ष 2019-20 की तुलना में वर्ष 2025-26 तक 40 प्रतिशत कर दिया गया।

आप यह कह सकते हैं कि यह अच्छी बात है। इससे भी अच्छी बात यह थी कि 15वें वित्त आयोग ने 42 शहरों और मुख्य शहरी केंद्रों से जुड़े अधिक आबादी वाले 7 शहरी क्षेत्रों को सीधे तौर पर अनुदान दिया जिनकी आबादी 10 लाख से ज्यादा है ताकि वे वायु प्रदूषण को कम करने की दिशा में काम कर सकें। बाकी शहरों के लिए मंत्रालय ने फंड मुहैया कराए। इस तरह वर्ष 2025-26 तक पांच वर्ष की अवधि के लिए लगभग 20,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया।

इतना ही नहीं प्रत्येक राज्य सरकार और प्रत्येक शहर को एक प्रदूषण के स्रोतों से जुड़े अध्ययन के आधार पर कार्ययोजना बनाने की जरूरत है ताकि कार्रवाई की प्राथमिकता तय की जा सके। फंडिंग प्रदर्शन से जुड़ी है जिसके लिए शहरों को हवा के प्रदूषण स्तर में सुधार और ‘बेहतर हवा’ वाले दिनों की संख्या में बढ़ोतरी दिखानी होगी। आमतौर पर हवा का गुणवत्ता सूचकांक 200 से कम होने पर ही अच्छा माना जाता है। वर्ष 2022 में मंत्रालय ने स्वच्छ वायु सर्वेक्षण के नाम की रैंकिंग शुरू की थी जिसमें उन शहरों की पहचान की गई जो घातक प्रदूषण को कम करने के लिए कदम उठा रहे थे।

असल समस्या यह है कि प्रदूषण दूर करने की सारी तैयारियों में ही हम मुख्य काम को ही भूल गए हैं। मेरे सहकर्मी इस कार्यक्रम का गहराई से अध्ययन कर चुके हैं और उन्होंने पाया है कि सबसे बड़ी समस्या यह है कि NCAP के तहत सिर्फ पीएम10 प्रदूषण को ही मुख्य प्रदूषक माना जाता है। इसका मतलब है कि सारे उपाय सिर्फ पीएम10 को कम करने के इर्द-गिर्द ही घूम रहे हैं, न कि पीएम 2.5 को कम करने पर जोर है जो प्रदूषक कणों का बहुत छोटा रूप है और यह कई बीमारियों को जन्म देता है। ये इतने छोटे होते हैं कि खून में भी घुस जाते हैं और सिर्फ अस्थमा और फेफड़ों को ही नुकसान नहीं पहुंचाते हैं बल्कि दिल की बीमारियां भी पैदा करते हैं।

दरअसल, पीएम10 बड़े कण होते हैं जो धूल के कण हैं और ये खुद प्रदूषण नहीं फैलाते। ये समस्या तब बनते हैं जब इन पर विषाक्त पदार्थ चिपक जाते हैं और यह ज्यादातर वाहनों या फैक्ट्रियों जैसी जगहों से निकलते हैं। हमें इस पर ध्यान देना जरूरी है, लेकिन इसके साथ ही हमें सड़कों पर बढ़ते वाहनों से निकलने वाले प्रदूषण, कोयले का इस्तेमाल करने वाली फैक्ट्रियों से निकलने वाले धुएं, कचरे को खुली जगहों पर जलाने से होने वाले प्रदूषण और इनमें से सबसे खराब, खाना बनाने के लिए जैव ईंधन के इस्तेमाल से होने वाले प्रदूषण को भी कम करने के लिए सख्त कदम उठाने होंगे। ये न सिर्फ हवा को दूषित करते हैं बल्कि महिलाओं की सेहत पर भी बुरा असर डालते हैं।

धूल जैसे प्रदूषक को नियंत्रित करने पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है क्योंकि इसके लिए विशेषतौर पर कोई जिम्मेदार नहीं है जबकि वाहनों से निकलने वाले प्रदूषण के लिए वाहन निर्माता और कोयला जलाने वाले बिजलीघरों के लिए बिजली उत्पादक जिम्मेदार होते हैं। मेरे सहकर्मियों की समीक्षा में पाया गया है कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए दिए गए पैसे का 64 प्रतिशत, सड़क बनाने, सड़कें चौड़ी करने, गड्ढे भरने, पानी का छिड़काव और सड़क साफ करने पर खर्च किया गया है। भले ही सड़कों के गड्ढे भरना कितना भी जरूरी हो, लेकिन हम भारतीय लोग जानते हैं कि यह काम कभी पूरा नहीं होगा। यह एक बेकार कवायद है और हैरानी की बात है कि इसे प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर किया जा रहा है। यह सही तरीका नहीं है। दूसरी समस्या यह है कि पीएम10 के स्तर में कमी और शहरों द्वारा की गई कार्रवाइयों के बीच कोई वास्तविक संबंध नहीं है।

वास्तव में इसका उलटा ही हो रहा है यानी जो शहर प्रदूषण कम करने में सबसे आगे होते हैं, वही कभी-कभी सबसे कम कार्रवाई करते हैं। इस बेमेलपन के कारण नीतिगत भ्रांतियां पैदा होती हैं और हमें यह पता नहीं चलता कि प्रदूषण का सामना करने के लिए क्या किया जाना चाहिए, क्या चीजें काम कर रही हैं और किस जगह काम कर रही हैं।

हवा प्रदूषण के मुद्दे को सरकार ने बहुत महत्त्व दिया है, लेकिन इसे केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित नहीं रखा जा सकता। हमें वास्तविक कदम उठाने की जरूरत है। यह हमारे सांस लेने वाली हवा से जुड़ी है और हमें पता होना चाहिए कि हवा प्रदूषण सभी को समान रूप से प्रभावित करता है, चाहे वे अमीर हों या गरीब। यह पानी के प्रदूषण जैसा नहीं है, जहां अमीर लोग अपने घरों में पानी की गुणवत्ता बनाए रख सकते हैं या बोतलबंद पानी पी सकते हैं। हवा हर वक्त सांस लेने के लिए जरूरी है और वायु को शुद्ध करने का यंत्र हर जगह की हवा साफ नहीं कर सकता।

(लेखिका सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट से जुड़ी हैं)

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First Published - August 12, 2024 | 10:47 PM IST

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