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IBC में बदलाव: घर खरीदारों पर बढ़ा फोकस, अब अधर में लटके सपनों और अटके कर्ज को मिलेगी नई उम्मीद

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IBC संशोधन 2026 और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने घर खरीदारों को शक्तिशाली बनाया है। अब बिल्डरों के दिवालिया होने पर खरीदारों के हितों की रक्षा प्राथमिकता पर होगी

Last Updated- April 30, 2026 | 9:24 PM IST
IBC Amendment Bill 2026
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (संशोधन) अ​धिनियम, 2026 का पारित होना संभवतः एक ऐसा घटनाक्रम है जिसकी जरूरत महसूस की जा रही थी। यह संशोधन विधेयक 31 मार्च को लोक सभा में पारित हो गया और इसे राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल गई है। माना जा रहा है कि इससे घर खरीदारों के हितों की रक्षा प्रभावी ढंग से हो पाएगी। ऋण शोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) के तहत रियल एस्टेट कंपनी जेपी इन्फ्राटेक लिमिटेड (जेआईएल) की समाधान प्रक्रिया का लंबे समय तक अटकना इस बात का ठोस उदाहरण है कि घर खरीदारों पर क्या-क्या गुजरती है।

कॉरपोरेट ऋण शोधन अक्षमता समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) अगस्त 2017 में शुरू हुई जब आईडीबीआई बैंक के नेतृत्व वाली एक्सप्रेसवे एवं टाउनशिप डेवलपर कंपनी जेपी इन्फ्राटेक ने लगभग 8,000 करोड़ रुपये के भुगतान में चूक के बाद दिवालियापन के लिए आवेदन किया। इससे लगभग 20,000 घर खरीदार कानूनी अनिश्चितता में फंस गए।

मार्च 2023 में कई समाधान योजनाएं विफल होने के बाद राष्ट्रीय कंपनी विधि पंचाट (एनसीएलटी) ने मुंबई स्थित सुरक्षा समूह की एक समाधान योजना को मंजूरी दी जिसे कर्जदाताओं की समिति (सीओसी) में 98.66 फीसदी वोट मिले। 58 फीसदी मतदान हिस्सेदारी रखने वाले घर खरीदारों ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई। यह एक बड़े रियल एस्टेट सीआईआरपी में इस तरह की पहली घटना थी।

योजना में वित्तीय कर्जदाताओं को लगभग 1,300 करोड़ रुपये के अग्रिम भुगतान के साथ भूमि और गैर-परिवर्तनीय डिबेंचर देने के वादे किए गए थे। सुरक्षा समूह से जुड़ी योजना में कहा गया था कि रुके हुए टाउनशिप में फ्लैट 42 महीनों के भीतर बनकर तैयार हो जाएंगे और सौंप दिए जाएंगे। 97 अधूरे टावरों का निर्माण कार्य फिर से शुरू हो चुका है और क्रियान्वयन कार्यक्रम के अनुसार फ्लैटों की पहली खेप दिसंबर 2027 तक तैयार हो जाएगी।

वित्त मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलता है कि जून 2018 से अब तक हल किए गए 111 रियल एस्टेट ऋण शोधन अक्षमता मामलों के माध्यम से 1,62,000 घर खरीदारों को कब्जा मिल चुका है और लगभग 90,000 घर खरीदार ऐसे चल रहे 210 मामलों का हिस्सा हैं। इनमें 87 मामले एनसीएलटी द्वारा समाधान योजनाओं की मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं जिनसे लगभग 50,000 घर खरीदारों को लाभ हो सकता है।

जेपी मामला घर खरीदारों की सामूहिक शक्ति को दर्शाता है, वहीं अमित नेहरा और अन्य बनाम पवन कुमार गर्ग और अन्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय सीआईआरपी की तकनीकी पेचीदगी में फंसे व्यक्तिगत फ्लैट खरीदारों की रक्षा करता है।

इस मामले में खरीदार ने 2010 और 2011 के बीच औपचारिकताएं पूरी करने के बाद 60.06 लाख रुपये के एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर और 57.56 लाख रुपये का भुगतान कर मोहाली के सेक्टर 99 में प्यूमा रियल्टर्स प्राइवेट लिमिटेड द्वारा विकसित आईआरईओ राइज (गार्डनिया) परियोजना में एक अपार्टमेंट खरीदा था। हालांकि, उसे कभी कब्जा नहीं दिया गया। अक्टूबर 2018 में डेवलपर के खिलाफ सीआईआरपी दायर किया गया मगर उपभोक्ता शिकायत खारिज कर दी गई और फ्लैट खरीदार को अन्य लेनदारों के साथ ऋण शोधन अक्षमता प्रक्रिया में धकेल दिया गया। बाद में समाधान पेशेवर  ने 57.56 लाख रुपये के दावे को वित्तीय ऋण के रूप में स्वीकार कर लिया।

हालांकि, स्वीकृत समाधान योजना में एक शर्त यह डाल दी गई कि ‘देर से दावा करने वाले अपुष्ट दावेदारों’ को केवल 50 फीसदी राशि वापस मिलेगी और उन्हें फ्लैट पर कब्जा करने का कोई अधिकार नहीं होगा। एनसीएलटी (जुलाई 2023) और एनसीएलएटी (जनवरी 2025) दोनों ने इसे स्वीकार कर लिया और फ्लैट मालिक को अपार्टमेंट देने से इनकार कर दिया और दावा सत्यापित और स्वीकार किए जाने के बावजूद जमा की गई राशि का आधा हिस्सा ही मिला।

सर्वोच्च न्यायालय ने 9 सितंबर 2025 को एनसीएलटी और एनसीएलएटी दोनों के आदेशों को पलटते हुए कहा कि एक बार जब किसी घर खरीदार के दावे को समाधान पेशेवर द्वारा सत्यापित और स्वीकार कर लिया जाता है तो उसे देर से दावा करने वाला नहीं कहा जा सकता। न्यायालय ने आदेश दिया कि दो महीने के भीतर संबंधित अपार्टमेंट सौंप दिया जाए। 

इन बातों से स्पष्ट होता है कि एक दशक पुरानी भारत की ऋण शोधन अक्षमता और दिवालियापन प्रणाली अंततः कर्जदाताओं से इतर घर खरीदारों के हितों पर ध्यान केंद्रित कर रही है। न्यायालय के फैसले के अलावा 2026 में हुए आईबीसी संशोधन से यह स्पष्ट होता है कि कैसे यह जटिल कानूनी ढांचा अब लंबे समय से कब्जे का इंतजार कर रहे घर खरीदारों के लिए त्वरित समाधान दे रहा है।

इस संशोधन ने कभी-कभार इस्तेमाल होने वाली त्वरित ऋण शोधन प्रक्रिया समाप्त कर एक नई ऋणदाताओं द्वारा शुरू समाधान प्रणाली पेश की है। नए ढांचे में बकाया ऋण के 51 फीसदी से अधिक हिस्से के धारक निर्दिष्ट वित्तीय ऋणदाता वाणिज्यिक वार्ता शुरू करने के लिए एनसीएलटी की स्वीकृति की प्रतीक्षा करने के बजाय सार्वजनिक घोषणा और समन्वित कार्रवाई के माध्यम से एक संरचित ऋण शोधन अक्षमता प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं।

इस चरण के दौरान कर्जधारक और उसका वर्तमान प्रबंधन दैनिक कार्यों पर नियंत्रण बनाए रखते हैं मगर एक ऋण शोधन अक्षमता विशेषज्ञ पर्यवेक्षण करता है और वीटो शक्तियों का प्रयोग कर सकता है जिससे ‘कर्जधारक के कब्जे में, कर्जदाता के नियंत्रण में’ वाला मॉडल बनता है जो वैश्विक मानकों के अनुरूप है।

इस प्रक्रिया की एक समय सीमा है यानी समाधान योजना तैयार करने और उसे मंजूरी देने के लिए 150 दिनों की आधार अवधि है जो 45 दिनों के लिए बढ़ाई जा सकती है। अगर इस समय सीमा के भीतर कोई व्यवहार्य योजना नहीं बनती है तो कर्जदाता एनसीएलटी के समक्ष पारंपरिक सीआईआरपी में रूपांतरण का अनुरोध कर सकते हैं।

प्रत्येक चरण की एक समय सीमा है। एक बार चूक होने और कानूनी आवश्यकताएं पूरी करने के बाद एनसीएलटी को ऋण शोधन अक्षमता आवेदन स्वीकार करना होगा। संहिता में पहले से मौजूद 14दिन की प्रवेश अवधि अब सख्ती से लागू की जा रही है और अनुपालन न करने पर दंड का प्रावधान है। यानी बिना किसी समय सीमा के सुनवाई का दौर समाप्त हो गया है।

पूर्व संशोधनों में लागू की गई सीआईआरपी पूरा करने की 330 दिन की अधिकतम सीमा को नए नियमों के साथ और मजबूत किया गया है। इससे अनावश्यक मुकदमों और देरी से निजात मिलती है। सीओसी के गठन तक ऋण शोधन अक्षमता आवेदन दाखिल और स्वीकृत होने के बाद वापस नहीं लिया जा सकता है जिससे उस खामी को दूर किया जा सकता है जिसका फायदा प्रवर्तक अक्सर कर्जदाताओं द्वारा समर्थित मामलों को अंतिम समय में टालने के लिए उठाते थे।

संरचना और समय सीमा के अलावा यह संशोधन विभिन्न वर्गों के कर्जधारकों के साथ व्यवहार करने के तरीके को भी स्पष्ट करता है। असहमति जताने वाले वित्तीय कर्जदाताओं को किसी भी समाधान योजना के तहत न्यूनतम भुगतान का आश्वासन दिया जाता है जिससे कानूनी जोखिम कम होते हैं और अल्पांश ऋणदाताओं को निश्चितता मिलती है। साथ ही, व्यक्तिगत गारंटीदाता की संपत्ति मुख्य देनदार के सीआईआरपी से स्पष्ट रूप से जुड़ी होती है। इससे लेनदारों के लिए मुकदमे दायर करने के बजाय संगठित तरीके से गारंटी लागू करना आसान हो जाता है।

यह संहिता अब केवल बैंकों के हितों की रखवाली करने वाला जरिया नहीं बल्कि आम नागरिकों को मिली ताकत है जो शक्तिशाली डेवलपर को अनुबंध पूरा करने से पीछे हटने नहीं देगी।

(लेखक जन स्मॉल फाइनैंस बैंक में वरिष्ठ सलाहकार हैं।)

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First Published - April 30, 2026 | 9:19 PM IST

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