वर्ष 2023 में मैं सिंगापुर में पश्चिम एशिया पर आयोजित एक सम्मेलन में शामिल हुआ था। वहां खाड़ी देशों, अमेरिका और इजरायल के प्रतिभागी खुद ही अपनी पीठ थपथपा रहे थे। उस क्षेत्र ने एक हद तक शांति और सुरक्षा हासिल कर ली थी। सितंबर 2020 में संपन्न अब्राहम समझौते ने संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, मोरक्को और सूडान के बीच संबंधों को सामान्य बनाने में मदद की थी।। माना जा रहा था कि सऊदी अरब तथा अन्य खाड़ी देश कतर, कुवैत और ओमान भी इसी रास्ते पर चलेंगे।
जब फिलिस्तीन का मुद्दा उठा तब अमेरिका, इजरायल और खाड़ी के कुछ देशों के प्रतिभागियों का कहना था कि भले ही यह मसला हल नहीं हुआ है लेकिन इसका बेहतर प्रबंधन किया गया है। अमेरिका ने कहा कि वह इस क्षेत्र में सैन्य मौजूदगी बनाए रखेगा लेकिन सुरक्षा मुहैया कराने की जिम्मेदारी मोटे तौर पर अमेरिका के साझेदार देशों पर है जिनमें इजरायल अहम है। दिलचस्प बात है कि आई2यू2 (भारत, इजरायल, यूएई और अमेरिका) समूह को क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए अहम बताया गया।
29 सितंबर 2023 को, हमास के इजरायल पर आतंकी हमले से सिर्फ आठ दिन पहले, तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन ने घोषणा की थी कि ‘मध्य पूर्व दुनिया के सबसे शांतिपूर्ण और स्थिर हिस्सों में से एक है।’ इसके बाद गाजा में और फिर ईरान से जुड़ी हिंसक घटनाओं की श्रृंखला ने सुलिवन को पूरी तरह गलत साबित कर दिया।
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में, अमेरिका अब यह दिखावा नहीं कर सकता कि वह सुदूर मौजूद एक संतुलनकारी शक्ति है। वह सीधे हस्तक्षेप कर रहा है ताकि क्षेत्र का भू-राजनीतिक परिदृश्य बदला जा सके। बदलाव तो होगा लेकिन अमेरिका के हित में नहीं।
यह हमें अमेरिकी सेंट्रल कमांड यानी सेंटकॉम की ओर ले जाता है और उस भूमिका की ओर भी, जो यह पश्चिम एशिया में सुरक्षा बनाए रखने में निभाता है। सभी छह खाड़ी देश सऊदी अरब, यूएई, कतर, बहरीन, कुवैत और ओमान सेंटकॉम के सदस्य हैं। इजरायल मूल रूप से सदस्य नहीं था क्योंकि खाड़ी और अरब देशों ने उसकी मौजूदगी का विरोध किया था। उसे इसके बजाय यूरोप स्थित अमेरिकी सैन्य कमान यूकॉम में शामिल किया गया था। लेकिन जब 2020 में अब्राहम समझौते संपन्न हुए, तो जनवरी 2021 में इजरायल को चुपचाप सेंटकॉम में शामिल कर लिया गया।
इसका अर्थ है कि इजरायल और अरब देशों के बीच व्यावहारिक सुरक्षा सहयोग कुछ समय से जारी है। वे अमेरिका के नेतृत्व वाले मिडिल ईस्ट एयर डिफेंस (एमईएडी) सिस्टम में शामिल किए गए हैं, जो पूरे क्षेत्र में रडार और इंटरसेप्टर का नेटवर्क संचालित करता है। हाल ही में ईरान से जुड़े युद्ध में इजरायल पर ईरान के हमलों के दौरान, कई खाड़ी साझेदारों ने कथित तौर पर रडार डेटा साझा किया या अपने हवाई क्षेत्र का उपयोग ईरानी ड्रोन और मिसाइलों को रोकने तथा अमेरिकी और इजरायली हमलों को ईरानी लक्ष्यों पर सक्षम बनाने के लिए करने की अनुमति दी। यह दावा करना सही नहीं है कि उन्होंने अमेरिका को ईरान पर हमले के लिए अपनी भूमि का उपयोग नहीं करने दिया।
भारत अक्टूबर 2020 में सेंटकॉम का पर्यवेक्षक बना और जल्द ही उसने बहरीन में सेंटकॉम के नौ सैनिक विंग (नैवकॉम) में एक प्रतिनिधि तैनात किया। भारत सेंटकॉम के तहत संयुक्त समुद्री बलों (सीएमएफ) का सदस्य है, जिसमें 47 सदस्य हैं और यह समुद्री सुरक्षा और समुद्री डकैती-रोधी टास्क फोर्स में भाग लेता है। इससे भारतीय नौ सेना को सेंटकॉम साझेदारों के साथ अपनी गतिविधियों को समन्वित करने की सुविधा मिलती है।
इससे संकेत मिलता है कि सेंटकॉम के साथ हमारा रिश्ता जितना दिखता है उससे कहीं अधिक करीब है। इस पृष्ठभूमि में, ईरान युद्ध पर प्रतिक्रिया देने और अधिक संतुलित रुख अपनाने में भारत के पास कम विकल्प रहे होंगे। भारत के कम सहयोगी रुख पर ईरान के आधिकारिक बयानों का स्वर नरम रहा है, लेकिन ईरानी मीडिया खुलकर आलोचनात्मक रहा है। अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमलों में सहभागी होने का आरोप भारत पर लगाया गया है। इसकी आलोचना की गई है कि जब अमेरिका ने भारतीय नौ सेना द्वारा आयोजित मिलन नौसैनिक अभ्यास में शामिल होकर लौट रहे एक ईरानी जहाज को डुबो दिया जिसमें युवा नौ सैनिक कैडेट थे और जो श्रीलंका के तट से दूर अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में गुजर रहा था, तब भारत ने आवाज नहीं उठाई।
हालांकि यह आरोप अप्रमाणित हैं लेकिन ईरानी मीडिया ने भारत पर जानते हुए भी हमले की योजना को रोकने में विफल रहने का आरोप लगाया है। ईरान के चाबहार बंदरगाह के मामले में, जिसे भारत अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक वैकल्पिक पहुंच के रूप में विकसित कर रहा था, भारत पर आर्थिक परित्याग का आरोप लगाया गया है। इसके विपरीत पाकिस्तान की प्रशंसा की गई है कि वह एक मित्र देश, एक भरोसेमंद साझेदार और एक सच्चा मध्यस्थ है और शांति के लिए अथक प्रयास कर रहा है। भारत-ईरान संबंध अब एक निम्न स्तर पर पहुंचते प्रतीत होते हैं।
ईरान युद्ध उस क्षेत्र के देशों के बीच नया समीकरण बना रहा है और भारत को इन परिवर्तनों के अनुसार खुद को ढालना होगा। संयुक्त अरब अमीरात ने पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) से बाहर निकलने की घोषणा की है और अब वह अपने तेल उत्पादन पर ओपेक द्वारा निर्धारित उत्पादन सीमा का पालन नहीं करेगा। वह अपने खाड़ी साझेदारों की ईरान के खिलाफ कठोर रुख न अपनाने के लिए खुलकर आलोचना करता रहा है। वह पाकिस्तान के मध्यस्थता प्रयासों से भी असंतुष्ट है, क्योंकि उसका मानना है कि इससे ईरान की स्थिति मजबूत होती है। भारत ने खुद को संयुक्त अरब अमीरात के साथ तेजी से जोड़ा है। भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने भी वहां का दौरा किया और प्रधानमंत्री स्तर की यात्रा की संभावना भी है। यह लंबी अवधि में लाभकारी होगा या नहीं, यह देखना बाकी है।
भारत के दीर्घकालिक हित इस ओर संकेत करते हैं कि ईरान के साथ संबंधों को तुरंत बचाना आवश्यक है। भारत के प्रति नकारात्मक भावनाएं ईरानी सरकार और जनता में गहराई से पैठने के पहले ऐसा करना होगा। ईरान भारत के लिए इतना महत्त्वपूर्ण है कि संबंधों को शत्रुतापूर्ण बनने देना उचित नहीं होगा। यह संभावित रूप से एक महत्त्वपूर्ण ऊर्जा साझेदार भी बना रह सकता है।
चाहे संघर्ष जारी रहे या शांति समझौता हो, ईरान ने यह क्षमता प्रदर्शित की है कि वह होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरने वाले यातायात को गंभीर रूप से बाधित और प्रभावित कर सकता है। यह दबाव न केवल खाड़ी देशों पर बल्कि भारत जैसे प्रमुख ऊर्जा आयातकों पर भी लागू होता है। और इन व्यावहारिक तर्कों से परे, लोगों के बीच रिश्तों का आयाम भी है। यह एक ऐसा देश है जिसके साथ हम सदियों से ऐतिहासिक संबंध और सांस्कृतिक निकटता साझा करते हैं। इसका कुछ तो माेल होना चाहिए।
(लेखक पूर्व विदेश सचिव हैं। ये उनके निजी विचार हैं)