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लोन लेने वाली महिलाओं की बढ़ी तादाद मगर नहीं बनेगी बात, दो-तिहाई अब भी फॉर्मल सिस्टम से बाहर

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भारत में उधार लेने वाली महिलाओं पर अब कुल 76 लाख करोड़ रुपये का कर्ज हो गया है, जो देश की भारतीय बैंकिंग एवं वित्तीय प्रणाली में कुल कर्ज का 26 प्रतिशत है

Last Updated- May 28, 2026 | 10:27 PM IST
Indian Women

भारत में उधार लेने वाली महिलाओं पर अब कुल 76 लाख करोड़ रुपये का कर्ज हो गया है, जो देश की भारतीय बैंकिंग एवं वित्तीय प्रणाली में कुल कर्ज का 26 प्रतिशत है। महिलाओं पर 2017 में करीब 16 लाख करोड़ रुपये कर्ज था, जो 20 प्रतिशत सालाना चक्रवृद्धि दर से बढ़ा है।

नीति आयोग, ट्रांसयूनियन सिबिल, माइक्रोसेव कंसल्टिंग (एमएससी) और महिला उद्यमिता मंच ने मिलकर अप्रैल में ‘फ्रॉम बॉरोअर्स टु बिल्डर्स: विमेन ऐंड इंडियाज इवॉल्विंग क्रेडिट मार्केट’ रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इसके मुताबिक महिलाओं द्वारा लिया जाने वाला कर्ज 2017 और 2025 के बीच आठ वर्ष में 4.8 गुना हो गया।  इससे उपलब्धता के कारण समावेशन से शुरू हुई भागीदारी धीरे-धीरे बढ़ने का संकेत मिलता है और यह भी पता चलता है कि कैसे अधिक से अधिक महिलाएं बड़ी रकम के खुदरा और कारोबारी ऋण ले रही हैं।

डीबीएस बैंक इंडिया लिमिटेड के मार्च में जारी अध्ययन ‘विमेन ऐंड फाइनैंस’ के मुताबिक 2025 में लगभग 36 प्रतिशत महिलाओं पर कर्ज था। इसमें यह भी कहा गया है कि शहरी भारत में 69 प्रतिशत महिला उद्यमी वित्तीय मामलों में स्वयं निर्णय लेती हैं।

सबसे पहले हम पहले अध्ययन पर गौर करते हैं।  इसके मुताबिक ऋण की प्रक्रिया तेजी से डिजिटल होने के कारण शुरुआती बाधाएं कम हुई हैं और छोटे-मोटे ऋण से आगे बढ़कर महिलाएं खुदरा और कारोबारी कर्ज ले रही हैं। ऋण में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के ये दो अहम कारण बताए गए हैं। महिलाओं द्वारा कारोबार के लिए कर्ज सबसे तेजी से बढ़ा है और इसका हिस्सा 2017 के 16 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 25 प्रतिशत हो गया है।

दिसंबर 2017 से दिसंबर 2025 के बीच उन महिलाओं की संख्या 9 प्रतिशत सालाना बढ़ी, जिन पर कर्ज चल रहे थे। 2017 में केवल 19 प्रतिशत महिलाओं ने कर्ज लिए थे, जो संख्या 2025 में बढ़कर 36 प्रतिशत हो गई और अब कर्ज की पात्र हर तीन महिलाओं में से एक औपचारिक तंत्र से कर्ज ले रही है।

नीति आयोग की 2017 से 2025 की रिपोर्ट में कर्ज लेने वाली महिलाओं को तीन श्रेणियों में रखा गया है। इनमें सूक्ष्म वित्त से कर्ज लेने वाली, खुदरा ऋण लेने वाली और कारोबारी ऋण लेने वाली महिलाएं हैं। इस दौरान ऋणों की हिस्सेदारी बदली है। खुदरा ऋण कुल ऋण में 71 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ अब भी सबसे ऊपर है। मगर सबसे तेजी कारोबारी ऋण में आई, जिसका हिस्सा 16 प्रतिशत से बढ़कर 25 प्रतिशत हो गया है। सूक्ष्म वित्त केवल 4 प्रतिशत रह गयी है और इसमें खुदरा तथा कारोबारी ऋण के मुकाबले बहुत कम तेजी आ रही है, जिससे पता चलता है कि महिलाएं उद्यम शुरू करने में जुट रही हैं।

महिलाएं कर्ज को नियम से चुका भी रही हैं और कर्ज में चूक करने की उनकी दर बहुत कम है। युवा महिलाएं सोना गिरवी रखकर या वाहन के लिए कर्ज भी ले रही हैं। मगर सबसे निर्णायक बदलाव कारोबारी ऋण के मामले में दिखा है, जहां कर्ज लेने वाली महिलाओं की संख्या पिछले तीन वर्ष में 31 प्रतिशत सालाना बढ़ी है, जो कुल वाणिज्यिक ऋण में वृद्धि की रफ्तार से दोगुनी है। 36 प्रतिशत महिलाओं का ऋण लेना बहुत अच्छी बात है मगर पात्रता रखने वाली करीब दो-तिहाई महिलाएं अब भी औपचारिक ऋण व्यवस्था से बाहर हैं।

अब डीबीएस बैंक इंडिया की ‘विमेन ऐंड फाइनैंस’ देखें तो इसके मुताबिक ज्यादा से ज्यादा महिलाएं वित्तीय फैसले खुद लेने लगी हैं। भारत में 1,342 महिलाओं पर किए गए इस सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि इनमें से 69 प्रतिशत उद्यमी वित्तीय फैसले वे खुद लेती हैं। ग्रामीण क्षेत्र में कमाने वाली 60 प्रतिशत महिलाएं और 58 प्रतिशत धनी महिलाएं अपने फैसले खुद लेती हैं।

इस सर्वेक्षण के मुताबिक कमाने वाली 76 प्रतिशत ग्रामीण महिलाओं को अपना पैसा खुद संभालने का भरोसा है, जबकि केवल 67 प्रतिशत धनाढ्य महिलाओं और 58 प्रतिशत महिला उद्यमियों में ऐसा भरोसा दिखा। जो महिलाएं वित्तीय फैसले खुद नहीं लेतीं, वे इसके लिए भरोसेमंद निजी संबंधों पर निर्भर रहती हैं। सर्वेक्षण में शामिल 55 प्रतिशत धनाढ्य महिलाएं इसके लिए पति या साथी से बात करती हैं और 50 प्रतिशत महिला उद्यमी ऐसा करती हैं। कमाऊ ग्रामीण महिलाओं में यही आंकड़ा 73 प्रतिशत है।

सर्वेक्षण में शामिल 64 प्रतिशत धनाढ्य और 73 प्रतिशत उद्यमी महिलाओं के लिए नया मकान या संपत्ति खरीदना बड़ी प्राथमिकता है, लेकिन कमाऊ ग्रामीण महिलाओं में 73 प्रतिशत की प्राथमिकता बच्चों को अच्छी शिक्षा है। महिला उद्यमियों में 44 प्रतिशत और धनाढ्यों में 29 प्रतिशत बैंकिंग, कर्ज आदि के लिए ऐप तथा वेबसाइट जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म को सबसे पसंद करती हैं। 36 प्रतिशत धनाढ्य महिलाओं ने डिजिटल माध्यमों और व्यक्तिगत बातचीत के मिले-जुले मॉडल को तरजीह ती। मगर कमाऊ ग्रामीण महिलाओं में 47 प्रतिशत ने बैंक की शाखा तक जाने में ही भरोसा जताया।

डिजिटल माध्यम को महिला उद्यमी सबसे ज्यादा अपनाती हैं। सर्वेक्षण में शामिल 84 प्रतिशत महिलाएं यूपीआई और 59 प्रतिशत बैंकिंग ऐप का सक्रियता से इस्तेमाल करती हैं। धनाढ्य महिलाओं में 77 प्रतिशत ने यूपीआई और 52 प्रतिशत ने बचत-बैंकिंग ऐप के इस्तेमाल की बात कही।

दिलचस्प है कि कमाऊ ग्रामीण महिलाओं में 82 प्रतिशत स्मार्टफोन इस्तेमाल करती हैं मगर डिजिटल वित्तीय सेवाएं बहुत कम ने अपनाई हैं। सर्वेक्षण में शामिल ऐसी 44 प्रतिशत ग्रामीण महिलाओं को ऐप्स के बारे में जानकारी नहीं होने, 37 प्रतिशत ऑनलाइन घोटालों का डर होने और 31 प्रतिशत इंटरनेट सुचारु नहीं होने के कारण इससे दूर रहती हैं।

ग्रामीण विकास मंत्रालय की ‘लखपति दीदी योजना’ वाली झांकी ने 2025 के गणतंत्र दिवस पर सबका ध्यान खींचा। इसमें उद्यमों के जरिये महिलाओं का आर्थिक सशक्तीकरण दर्शाया गया और 2023 में शुरू इस योजना को केंद्र में रखा गया। योजना का मकसद स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) के सदस्यों के लिए कम से कम 1 लाख रुपये सालाना आय पक्की करना है। सरकार के हालिया बयानों के मुताबिक लगभग 3 करोड़ महिला एसएचजी सदस्य ‘लखपति दीदी’ बन चुकी हैं। लक्ष्य को बढ़ाकर 2029 तक 6 करोड़ तय कर दिया गया है।


(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक और जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड में वरिष्ठ सलाहकार हैं) 

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First Published - May 28, 2026 | 10:27 PM IST

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