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2026 का तेल संकट: 1970 के दशक जैसा खतरा या नए बदलाव की आहट?

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2026 का तेल संकट 1970 के दशक से अलग है। नवीकरणीय ऊर्जा, बेहतर बैंकिंग नीतियों और रक्षा इंजीनियरिंग के दम पर वैश्विक अर्थव्यवस्था इस झटके से पार पा सकती है

Last Updated- May 01, 2026 | 9:29 PM IST
CRUDE OIL
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

फारस की खाड़ी की नाकाबंदी संभवतः कुछ समय तक जारी रहेगी। मान लेते हैं कि तेल की कीमत 160 डॉलर प्रति बैरल पर स्थिर हो जाएगी, जो युद्ध शुरू होने से पहले की कीमत से लगभग दोगुनी है। इसके अल्पकालिक प्रभाव स्पष्ट हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रवासियों से हासिल होने वाली आय में गिरावट, माल निर्यात में कमी और ऊर्जा के लिए बढ़े हुए आयात बिल का सामना।

लेकिन एक अधिक रणनीतिक दृष्टिकोण से, 2027 और उसके बाद की स्थिति को देखते हुए हमें काम कर रही शक्तियों की पहचान करनी होगी और समायोजन प्रक्रिया को समझना होगा। इसमें अनुमान शामिल होगा, लेकिन इसे आर्थिक इतिहास और व्यापक आर्थिक सिद्धांतों पर आधारित किया जा सकता है।

सत्तर के दशक का झटका बनाम 2026 का झटका

1970 का दशक हमें संदर्भ प्रदान करता है। दुनिया ने 1973 और 1979 में कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी उछाल देखीं। हम उन झटकों की कार्यप्रणाली और उनके समाधान को समझते हैं। यह हमें आज की स्थिति को समझने में मदद देता है। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में तेल और गैस का हिस्सा 1970 के दशक के 62 फीसदी से घटकर आज 55 फीसदी हो गया है। वैश्विक अर्थव्यवस्था अधिक ऊर्जा-सक्षम हो गई है: सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के प्रति डॉलर पर 7.9 मेगाजूल से घटकर 5.3 मेगाजूल, यानी 33 फीसदी का फायदा। वैश्विक तेल-गहनता प्रति डॉलर जीडीपी पर 117.6 ग्राम से घटकर 69.4 ग्राम हो गई है, यानी 41 फीसदी की कमी।

भारत की ऊर्जा संरचना में तेल और गैस का हिस्सा 1970 के दशक के 13 फीसदी से बढ़कर आज 31 फीसदी हो गया है, यानी 139 फीसदी की वृद्धि। भारत में तेल-गहनता 63 ग्राम तेल प्रति डॉलर जीडीपी पर स्थिर बनी हुई है।

कीमतों में व्यवधान का आकार अलग है। 1970 के दशक में कीमतें 12 गुना बढ़ीं, 2.9 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 35 डॉलर प्रति बैरल तक जा पहुंचीं। ब्रेंट वर्तमान में 109 डॉलर प्रति बैरल के आसपास है। मान लीजिए कि मौजूदा स्थिति में कीमतें दो गुना बढ़ जाती हैं, यानी 80 डॉलर से 160 डॉलर तक पहुंचती हैं। बाजार संतुलन के लिए ऐसी कीमत चाहिए जो आपूर्ति और मांग को संतुलित करे।

अभी यह तय नहीं हुआ है कि 160 डॉलर संतुलन मूल्य है या नहीं। हमारी आशा है कि इतने कीमत समायोजन से वैश्विक आपूर्ति बढ़ेगी और मांग उतनी घटेगी जितनी आवश्यक है। यदि समायोजन इसी स्तर पर पूरा होता है, तो यह झटका 1970 के दशक की तुलना में हल्का होगा।

आयातक अर्थव्यवस्थाओं से निर्यातक अर्थव्यवस्थाओं की ओर धन का स्थानांतरण वैश्विक व्यापक आर्थिक व्यवधान का एक और दृष्टिकोण है। 1980 में यह स्थानांतरण विश्व जीडीपी का 2.5 फीसदी था। वर्तमान अनुमान बताता है कि यह स्थानांतरण उसका एक फीसदी होगा।

कैसी प्रतिक्रिया देगी दुनिया?

हमें व्यापक आर्थिक नीति के संस्थागत ढांचे पर ध्यान देना होगा। 1970 के दशक में केंद्रीय बैंकों के पास स्पष्ट नॉमिनल आधार नहीं था और उन्होंने गलतियां कीं, जिससे व्यापक आर्थिक अस्थिरता उत्पन्न हुई। आधुनिक व्यापक अर्थशास्त्र उन्हीं गलतियों के जवाब में बना, जो तेल संकट के दौरान वैश्विक प्रतिक्रिया में हुई थीं। मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारण, लचीली विनिमय दर,खुले पूंजी खाते ये सभी 1970 के दशक की कठिनाइयों से उत्पन्न हुए। आज, मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारण करने वाले केंद्रीय बैंक वैश्विक जीडीपी के बड़े हिस्से की निगरानी करते हैं। प्रमुख केंद्रीय बैंक कीमतों के झटके के जवाब में 1970 के दशक की गलतियों को नहीं दोहराएंगे।

ऊर्जा की मांग अल्पकाल में कम मूल्य का लचीलापन दिखाती है। समय के साथ, लगातार ऊंची कीमतें व्यवहार बदल देती हैं। परिवार और कंपनियां लगातार विकल्प तलाशते हैं। आज तकनीकी सीमाएं ऐसे विकल्प उपलब्ध कराती हैं, जो 1970 के दशक में मौजूद नहीं थे। उदाहरण के लिए, 50 साल पहले परिवहन पर जीवाश्म ईंधन का एकाधिकार था। आज, इलेक्ट्रिक वाहन एक व्यवहार्य विकल्प प्रदान करते हैं।

नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बदलाव पूरी दुनिया में तेजी से हो रहा है। यूरोप में रूसी राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन की ऊर्जा ब्लैकमेलिंग ने नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी में प्रति वर्ष एक प्रतिशत अंक की वृद्धि को प्रेरित किया। 2026 का मूल्य झटका दुनिया भर में नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा दे रहा है। 1970 के दशक में ऐसा कुछ नहीं था।

धन के प्रवाह का अनुसरण

हमें पेट्रो डॉलर के पुनर्चक्रण की जांच करनी होगी। पेट्रो डॉलर के पुनर्चक्रण का मतलब है तेल आयातक देशों को जो अतिरिक्त राजस्व हो रहा है उसको वापस वै​श्विक वित्तीय व्यवस्था में निवेश करना। ऊंची तेल कीमतें उपभोग कर की तरह काम करती हैं। आयातक अर्थव्यवस्थाओं (जैसे भारत) से निर्यातक अर्थव्यवस्थाओं की ओर आय स्थानांतरित होती है। इस आय का आगे का उपयोग वैश्विक मांग के पैटर्न को निर्धारित करता है। यह धन वैश्विक मांग में वापस कैसे आता है? पेट्रो डॉलर पुनर्चक्रण की प्रक्रिया 1970 के दशक के अनुभव से अलग होगी।

फारस की खाड़ी में रुकावट खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) देशों के लिए निर्यात मात्रा को सीमित करती है, जिससे राजस्व की कमी होती है। लाल सागर तक पाइपलाइन जैसी वैकल्पिक पारगमन अधोसंरचना स्थापित करना उनके लिए एक रणनीतिक आवश्यकता है। एक महत्त्वपूर्ण परिदृश्य वह है जिसमें संप्रभु संपत्ति का उपयोग होर्मुज स्ट्रेट की बाधा को दूर करने के लिए किया जाता है। इसके लिए वैश्विक वित्तीय बाजारों में परिसंपत्तियों की बिक्री और बॉन्ड जारी करके संपत्ति का उपयोग करना होगा।

इस परिदृश्य में, फारस की खाड़ी क्षेत्र में विशाल निर्माण और इंजीनियरिंग परियोजनाओं के लिए पूंजीगत व्यय होगा, जो संभवतः प्रति वर्ष 150 अरब डॉलर तक हो सकता है। साथ ही, भू-राजनीतिक वातावरण सैन्य क्षमता में निवेश की मांग करता है। ड्रोन और मिसाइल हमलों से बचाव के लिए नए रक्षा प्रणालियों की खरीद में लगभग 100 अरब डॉलर प्रति वर्ष की आवश्यकता होगी। इस प्रकार हम इंजीनियरिंग और रक्षा खरीद के इस संयोजन को जीसीसी से वैश्विक अर्थव्यवस्था में प्रति वर्ष 250 अरब डॉलर की नई मांग के रूप में देख सकते हैं।

1970 के दशक में पेट्रो डॉलर पुनर्चक्रण प्रक्रिया वित्तीय प्रवाह से संचालित थी। वैश्विक वित्तीय प्रणाली इसके लिए तैयार नहीं थी। कई देशों ने पूंजी नियंत्रण का उपयोग किया, विनिमय दरें कठोर थीं और मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारण नहीं था। आज, पेट्रो डॉलर पुनर्चक्रण इंजीनियरिंग और रक्षा खरीद के साथ-साथ वित्तीय प्रवाह का संयोजन होगा, जो एक बेहतर वैश्विक वित्तीय प्रणाली में होगा। यह वैश्विक व्यापक अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर वातावरण का वादा करता है।

भारत पर प्रभाव

पश्चिम एशिया में चलने वाली कई परियोजनाएं वैश्विक कंपनियों द्वारा पूरी की जाएंगी जिनमें भारतीय श्रमिक काम करेंगे। भारतीय श्रमिकों से आने वाले प्रेषण में सुधार होगा।

नवीकरणीय ऊर्जा, ड्रोन और मिसाइलें, तेल और गैस इंजीनियरिंग ये तीन क्षेत्र निर्यात बाजारों में महत्त्वपूर्ण हैं। घरेलू वातावरण इन क्षेत्रों में अपेक्षाकृत शांत है। भारतीय कंपनियां पश्चिम एशिया में आने वाले इंजीनियरिंग उछाल से और वैश्विक स्तर पर नवीकरणीय ऊर्जा तथा रक्षा क्षेत्र की वृद्धि से राजस्व प्राप्त करने की कोशिश करके अच्छा कर सकती हैं। यदि ईरान या रूस में शासन सामान्य होता है, तो वहां भी पुनर्निर्माण होगा। अगर घरेलू नीति-निर्माता नवीकरणीय ऊर्जा और अत्याधुनिक सैन्य निर्यात के लिए स्थानीय नीति वातावरण को बेहतर बनाते हैं तो यह भी मददगार होगा।

(लेखक एक्सकेडीआर फोरम में शोधकर्ता हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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First Published - May 1, 2026 | 9:29 PM IST

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