भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने मुश्किल फैसला लेते हुए हुए डॉलर के प्रवाह के लिए रास्ते खोल दिए हैं। जून की मौद्रिक नीति में विदेशी पूंजी को आकर्षित करने के लिए पांच सूत्री रणनीति की घोषणा की गई है। सबसे पहले, वह सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को बाह्य वाणिज्यिक उधार जुटाने को प्रोत्साहित करने के लिए 30 सितंबर तक रियायती विदेशी मुद्रा स्वैप की पेशकश करेगा।
दूसरा, वह बैंकों द्वारा तीन से पांच साल की अवधि के लिए अनिवासी भारतीय जमा जुटाने की पूरी हेजिंग लागत वहन करेगा। यह सुविधा भी 30 सितंबर तक खुली रहेगी। मौद्रिक नीति के बाद मीडिया से बातचीत में आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि इन जमाओं पर नकद आरक्षित अनुपात और सांविधिक तरलता अनुपात जैसी आरक्षित आवश्यकताएं लागू नहीं होंगी।
तीसरा, विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए आरबीआई ने तथाकथित ‘पूर्ण रूप से सुलभ मार्ग’ के तहत सरकारी प्रतिभूतियों के दायरे को बढ़ाया है। 15, 30 और 40 वर्षों की अवधि वाले सभी नए दीर्घकालिक बॉन्डों को इसमें शामिल किया जा रहा है। इसके अलावा, बॉन्ड बाजार में विदेशी निवेशकों के अल्पकालिक निवेश पर लगी सीमा को भी हटाया जा रहा है।
चौथा, शेयर बाजार में कारोबार करने वाले इक्विटी शेयरों में अनिवासी भारतीयों और भारतीय मूल के विदेशी नागरिकों (ओसीआई) द्वारा भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) में पंजीकरण के बिना निवेश पर लगी सीमा को हटाया जा रहा है और यही सुविधा भारत के बाहर रहने वाले सभी व्यक्तियों (पीआरओआई) को भी दी जा रही है।
आखिर में, निर्यात से प्राप्त आय को भारत में वापस लाने की पुरानी नौ महीने की समय-सीमा को बहाल किया जा रहा है। पिछले साल नवंबर में आरबीआई ने इसे बढ़ाकर 15 महीने कर दिया था। इन पांचों उपायों के संयुक्त प्रभाव से डॉलर के प्रवाह में वृद्धि होगी। मल्होत्रा को उम्मीद है कि निवेश का प्रवाह ‘उचित’ और ‘स्वस्थ’ रहेगा।
बाजार को 40 से 50 अरब डॉलर के बीच निवेश आने की उम्मीद है। इस साल 12 मई तक कुल सरकारी बॉन्ड पोर्टफोलियो (लगभग 112.42 लाख करोड़) में विदेशी संस्थागत निवेशकों का निवेश 3.75 लाख करोड़ डॉलर से थोड़ा अधिक था। नए नियम और पात्र विदेशी निवेशकों के लिए सरकारी प्रतिभूतियों पर अर्जित ब्याज पर लगने वाले 20 फीसदी विदहोल्डिंग टैक्स और 12.5 फीसदी दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ कर को हटाने से विदेशी निवेशकों को भारतीय बॉन्ड खरीदने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा।
एक तरह से देखा जाए तो यह भारतीय बॉन्ड बाजार का अंतरराष्ट्रीयकरण है। वैश्विक स्तर पर बहुत कम देश इस तरह के कर लगाते हैं। इससे वैश्विक बॉन्ड सूचकांकों को भारतीय बॉन्डों को शामिल करने की प्रेरणा भी मिलेगी। इन्हें जेपी मॉर्गन इमर्जिंग मार्केट्स बॉन्ड इंडेक्स और अन्य उभरते बाजार सूचकांकों में शामिल किया जा चुका है, लेकिन प्रमुख ब्लूमबर्ग ग्लोबल एग्रीगेट इंडेक्स ने परिचालन और बाजार अवसंरचना के आकलन लंबित होने के कारण इन्हें अभी तक शामिल नहीं किया है।
इन सभी उपायों से दो उद्देश्य पूरे होंगे: डॉलर का प्रवाह बैंकों के सामने मौजूद कोष संकट को दूर करेगा और मुद्रा के अवमूल्यन को रोकेगा। बैंकों से अपेक्षा की जाती है कि वे हेजिंग लागत का लाभ अपने ग्राहकों को देंगे, जिससे ब्याज दर भी कम होगी। इससे बैंकों को अपने शुद्ध ब्याज मार्जिन में सुधार करने में मदद मिलेगी।
नवीनतम उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 में वार्षिक ऋण वृद्धि 15.4 फीसदी है, जबकि इसके पिछले साल यह 12.1 फीसदी थी। उम्मीद के मुताबिक, आरबीआई की दर निर्धारण संस्था, छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने सर्वसम्मति से नीतिगत रीपो दर को 5.25 फीसदी पर अपरिवर्तित रखने का फैसला किया है।
आरबीआई का रुख तटस्थ बना हुआ है। आरबीआई के वृद्धि और मुद्रास्फीति के अनुमान में भी कोई हैरानी की बात नहीं है। आरबीआई ने वित्त वर्ष 2027 के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि का अनुमान 6.9 फीसदी से घटाकर 6.6 फीसदी कर दिया है, साथ ही इसमें कुछ जोखिमों की आशंका भी जताई है। तिमाहीवार अनुमान के अनुसार, पहली तिमाही में वृद्धि 6.6 फीसदी, दूसरी तिमाही में 6.3 फीसदी, तीसरी तिमाही में 6.5 फीसदी और चौथी तिमाही में 6.8 फीसदी रहने का अनुमान है।
यदि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान जारी रहता है, वित्तीय बाजार लंबे समय तक अस्थिर रहते हैं और अल नीनो का प्रभाव पड़ता है, तो वृद्धि दर और भी कम हो सकती है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) मुद्रास्फीति की बात करें तो, वित्त वर्ष 2026 के लिए अनुमान पहले के 4.6 फीसदी से बढ़कर 5.1 फीसदी हो गया है, जिसमें वृद्धि की संभावना भी है। यहां, तिमाहीवार अनुमान पहली तिमाही में 4.2 फीसदी है। दूसरी तिमाही में 5.1 फीसदी, तीसरी तिमाही में 5.9 फीसदी और चौथी तिमाही में 5.4 फीसदी मुद्रास्फीति का अनुमान है। मुख्य मुद्रास्फीति 4.7 फीसदी रहने का अनुमान है।
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, वस्तुओं की कीमतों में उतार-चढ़ाव और मॉनसून के दौरान अपर्याप्त वर्षा इसके जोखिम कारक हैं। 5.1 फीसदी मुद्रास्फीति का अनुमान कच्चे तेल की औसत कीमत 95 डॉलर प्रति बैरल मानकर लगाया गया है।
गवर्नर के वक्तव्य में कहा गया है, ‘हम चुनौतियों का सामना करने के लिए नीतियां लागू करेंगे और साथ ही देश के व्यापक आर्थिक आधारभूत सिद्धांतों को और मजबूत करने के लिए उपाय करेंगे।’
सबसे अहम सवाल यह है कि आरबीआई रीपो दर कब बढ़ाएगा? चूंकि सीपीआई मुद्रास्फीति 5.1 फीसदी रहने का अनुमान है, इसलिए रीपो दर 5.25 फीसदी पर नहीं रह सकती। वास्तविक दरों (मुद्रास्फीति के अनुसार समायोजित ब्याज दरें) पर बहस में पड़े बिना, यह मानना सुरक्षित है कि यदि मुद्रास्फीति वास्तव में 5.1 फीसदी पर स्थिर रहती है, तो रीपो दर को कम से कम 6 फीसदी तक बढ़ाना होगा। क्या आरबीआई अक्टूबर की नीति तक इंतजार करेगा, जब तक उसे पता चलेगा कि भारत में कितना विदेशी धन आया है? विदेशी धन प्रवाह के लिए समय सीमा सितंबर में समाप्त होगी।
लेकिन, अगर भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं और कमजोर मॉनसून अगले महीने तक मुद्रास्फीति को और बिगाड़ देते हैं, जिससे आरबीआई को मुद्रास्फीति का अनुमान और बढ़ाना पड़ता है, तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा अगर अगस्त में ही ब्याज दरों में इस साल की पहली बढ़ोतरी हो जाए।
(लेखक जन स्मॉल फाइनैंस बैंक के वरिष्ठ सलाहकार हैं)