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बचाव, पुनरुद्धार और सुधार: IBC के पहले दशक ने भारत की क्रेडिट संस्कृति को बदला

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दिवालिया एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता के पहले दशक का अंत सकारात्मक बैलेंस शीट के साथ हो रहा है। बता रहे हैं एम एस साहू और राघव पांडेय

Last Updated- May 28, 2026 | 10:22 PM IST
IBC
इलेस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा

भारत जब बाजार अर्थव्यवस्था बना कारोबारी चक्र की गतिविधियां – विस्तार, मुश्किल और विफलता भी स्वाभाविक रूप से आ गईं। वृद्धि के दौर में बनी कई कंपनियां होड़ गहरी होने पर कदमताल नहीं कर पाईं। वे होड़ में पिछड़ गईं, आर्थिक रूप से काम की नहीं रहीं मगर निकासी की प्रभावी व्यवस्था नहीं होने के कारण बनी रहीं। इन मृतप्राय कंपनियों ने संसाधन तो खर्च किए मगर उत्पादकता में विशेष योगदान नहीं किया, जिसका असर आर्थिक वृद्धि पर भी पड़ा।

उनके लगातार बने रहने का असर नीचे तक गया। चूंकि ये कंपनियां कर्ज चुकाने में नाकाम रहीं, इसलिए बैंकों और खास तौर पर सरकारी बैंकों की बैलेंस शीट बिगड़ने लगी। नतीजे में कमजोर कंपनियों और कमजोर बैंकों का सिलसिला बन गया। यही दोहरी बैलेंस शीट की समस्या थी, जिसने निवेश और ऋण दोनों पर असर डाला।

उस समय मौजूद व्यवस्था इस पंगुता को खत्म करने में नाकाफी साबित हुई। इसी से निपटने के लिए संस्थागत व्यवस्था के रूप में दिवालिया एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) बनाई गई। विचार यह था कि जो कंपनियां चलने लायक नहीं हैं उन्हें समय पर निकलने का मौका दिया जाए, अहम कारोबारों को बचाया जाए, कर्ज के मामले में अनुशासन बने और कर्ज के रास्ते खोले जाएं। 10 वर्ष बाद आज यह देखने का सही समय है कि इसने अब तक क्या हासिल किया।

आईबीसी की सबसे स्पष्ट उपलब्धि रही है कि उसने कंपनियों के संकट का समाधान बाजार के जरिये किया। मार्च 2026 तक 1,419 कंपनियां स्वीकृत समाधान योजनाओं के साथ दिवालियापन से बाहर आ गईं और ऐसी कंपनियों का अनुपात बढ़ता जा रहा है। इससे पता चलता है कि लगातार विधायी हस्तक्षेपों के जरिये बचाव की गुंजाइश बढ़ी है, जबकि न्यायिक और नियामक दृष्टिकोण परिसमापन को अवांछनीय परिणाम मानकर टालने की कोशिश करते रहे।

ऋणदाताओं ने समाधान योजनाओं से 4.32 लाख करोड़ रुपये की वसूली की है। स्वीकृत दावों में लगभग दो-तिहाई रकम छोड़ देने (हेयरकट) का जो दावा किया जाता है, वह भ्रामक हो सकता है क्योंकि अक्सर दावे बढ़ा-चढ़ाकर किए जाते हैं जबकि दिवालियापन तक पहुंचते-पहुंचते कंपनियों की संपत्ति का मूल्य बहुत घट चुका होता है। अधिक सार्थक पैमाना है परिसमापन मूल्य। समाधान योजनाओं से परिसमापन मूल्य का औसतन 167 प्रतिशत मिला है।

महत्त्वपूर्ण बात है कि आईबीसी से समाधान पाने वाली कंपनियों के परिचालन में समाधान के बाद नई जान आ गई। पांच वर्ष के भीतर बिक्री और पूंजीगत व्यय दोगुने हो गए, परिसंपत्ति का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा और उन कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण लगभग 2.8 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 9 लाख करोड़ रुपये हो गया। नतीजतन कारखाने फिर चालू हुए, आपूर्ति श्रृंखलाएं फिर काम करने लगीं, नौकरियां बचीं और उत्पादक परिसंपत्तियों का आर्थिक इस्तेमाल होने लगा।

परिसमापन के आंकड़े सावधानी से देखने चाहिए। आईबीसी के तहत कुल मिलाकर 3,003 कंपनियां परिसमापन में गईं, लेकिन ज्यादातर के बचने की असली संभावना बहुत कम थी। उनकी परिसंपत्तियां स्वीकार किए गए दावों की बमुश्किल 5 प्रतिशत थीं और हर पांच में से चार कंपनियां दिवालियापन में आने से पहले ही बीमार थीं या ठप पड़ी थीं। आईबीसी ने उन कंपनियों को निकासी का व्यवस्थित रास्ता ही दिया, जो प्रक्रिया शुरू होने से बहुत पहले ही विफल हो चुकी थीं। फिर भी भारत में परिसमापन की घटनाएं अमेरिका के बराबर हैं और यूनाइटेड किंगडम तथा ऑस्ट्रेलिया की तुलना में काफी कम हैं।

फिर भी ज्यादातर कंपनियां बंद करने के बजाय बचाई गई हैं। समाधान योजनाओं ने 78 प्रतिशत संकटग्रस्त परिसंपत्तियों को बचाया और परिसमापन केवल 22 प्रतिशत का हुआ। समाधान योजनाएं, वापसी, समझौते, अपील और परिसमापन के दौरान बचाव जैसे पुनर्जीवन के सभी तरीके देखें तो फिर जीवित हुई कंपनियों की संख्या खत्म हुई कंपनियों से ज्यादा है।

बैंकिंग प्रणाली का पटरी पर लौटना बताता है कि आईबीसी का कितना आर्थिक असर हुआ। संकटग्रस्त संपत्तियों से अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की वसूली का सबसे बड़ा हिस्सा आईबीसी से ही आया है, जो वसूली की अन्य प्रक्रियाओं से ज्यादा है। सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां 2018 में 14.8 प्रतिशत थीं, जो 2025 तक घटकर 2.2 प्रतिशत ही रह गईं। भारतीय रिजर्व बैंक अब ‘दोहरी बैलेंस शीट के लाभ’  की बात करता है, संकट की नहीं।

अंतरराष्ट्रीय आकलन भी यही कहते हैं। विश्व बैंक के कारोबारी सुगमता संकेतकों में दिवालियापन सुलझाने के मामले में भारत की रैंकिंग तीन वर्षों में ही 136 से बढ़कर 52 हो गई। वैश्विक रेटिंग एजेंसियों ने ऋणदाताओं के मजबूत संरक्षण और बेहतर वसूली परिणामों को स्वीकार किया।

शायद आईबीसी का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रभाव औपचारिक समाधान आंकड़ों से बाहर है। जो प्रवर्तक ऋणदाताओं को अनदेखा करते थे, दिवालिया कार्यवाही के डर से या उसके शुरू होते ही बकाया चुकाने लगे हैं। करीब 15 लाख करोड़ रुपये डीफॉल्ट के लगभग 32,000 आवेदन दाखिल होने से पहले ही वापस ले लिए गए, जिससे पता चलता है कि कानून के तहत कितना अधिक पुनर्गठन हुआ।

फिर भी बैलेंस शीट पूरी तरह बेदाग नहीं है। समयसीमा आईबीसी की सबसे बड़ी कमजोरी है। जो प्रक्रिया कुछ महीनों में पूरी हो सकती है, वह अक्सर वर्षों तक खिंच जाती है और कई बार तो शुरुआत होने में ही एक वर्ष से ज्यादा लग जाता है। न्यायाधिकरणों में कर्मचारियों की कमी और प्रवर्तकों, ऋणदाताओं तथा सरकारी अधिकारियों द्वारा बार-बार मुकदमों ने प्रणाली को हर कदम पर अटकाया है। हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने बताया कि लगभग 400 स्वीकृत समाधान योजनाएं अंतिम मंजूरी की बाट जोह रही हैं और कुछ तो कई वर्ष से अटकी हैं।

एक और बड़ी कमी है ऐसे मामलों से निपटने की है, जहां कंपनी ने जानबूझकर ऐसा लेनदेन किया है, जिससे ऋणदाताओं को कम पैसा मिले। ऐसे मामलों में वरीयता प्राप्त, अवमूल्यित, धोखाधड़ीपूर्ण और जबरन वसूली वाले ऋण लेन-देन शामिल होते हैं। ये कार्यवाही अहम हैं क्योंकि वे ही संकटग्रस्त कंपनियों से गलत तरीके से निकाली गई संपत्ति वापस लाती हैं और समाधान योजनाओं को ज्यादा कारगर बना सकती हैं। फिर भी 4 लाख करोड़ रुपये से अधिक के दावों वाली हजारों ऐसी याचिकाएं लंबित हैं और बड़ी कीमत समाधान प्रक्रिया के बाहर फंसी हुई है।

संहिता के जरिये होने वाले बंटवारे पर भी चिंता हुई हैं। परिचालन के लिए कर्ज देने वालों को अक्सर कम रकम मिलती है और रेहन लेने वाले वित्तीय ऋणदाता रेहन संपत्ति की कीमत से ज्यादा रकम पा जाते हैं। कई समाधान प्रक्रियाएं कंपनियों को पुनर्जीवित करने के बजाय कर्ज वसूली की कवायद लगने लगी हैं, इससे कंपनियां बजाने का आईबीसी की मूल सिद्धांत कमजोर होता है।

संहिता उन क्षेत्रों में भी संघर्ष कर रही है जहां हितधारक बिखरे हुए हैं। जैसे रियल एस्टेट में वित्तीय ऋणदाता का दर्जा पाने के बाद भी मकान खरीदार अक्सर लंबी दिवालिया कार्यवाही में फंसे रहते हैं, कब्जा नहीं ले पाते हैं, ऊहापोह बनी रहती है और नतीजे पर उनका जोर कम होता है।

शायद आईबीसी का सबसे महत्वाकांक्षी वादा भी पूरा नहीं हो सका है। व्यक्तियों और साझेदारी फर्मों को दिवालियापन समाधान की सुविधा देने वाला संहिता का भाग तीन एक दशक बाद भी बड़े पैमाने पर लागू नहीं हो पाया है। इसलिए असफल उद्यमी अरसे तक नाकामी का बोझ और कलंक ढोते रहते हैं और नई आर्थिक शुरुआत का वादा साकार नहीं हो पाता।

ईमानदारी से पढ़ें तो आईबीसी के पहले दशक ने कई कमियों के बाद भी आर्थिक संकट से निपटने का भारत का नजरिया काफी बदल दिया है। इसने ऋण अनुशासन बहाल किया, असफल कंपनियों को निकलने का मार्ग दिया, वसूली बढ़ाई, व्यवहार्य उद्यमों को नया जीवन दिया, बैंकिंग प्रणाली मजबूत की और बकायेदारों का व्यवहार बुनियादी तौर पर बदल दिया। जिस व्यवस्था की जगह आईबीसी आई, उसके मुकाबले इसकी बैलेंस शीट सकारात्मक बनी हुई है।


(साहू इनसॉल्वेंसी लॉ अकैडमी में एमेरिटस फेलो हैं और भारत के दिवालियापन एवं ऋणशोधन बोर्ड के अध्यक्ष रह चुके हैं तथा पांडेय राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, दिल्ली में स्नातकोत्तर दिवालियापन कार्यक्रम के निदेशक हैं। लेख में निजी विचार हैं)

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First Published - May 28, 2026 | 10:22 PM IST

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