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जंगली जानवरों के आतंक से अरबों की फसलों का नुकसान, गंभीर होता जा रहा है मानव-वन्यजीव संघर्ष

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जंगली जानवरों के हमलों से फसलों की बर्बादी और किसानों का घाटा बढ़ रहा है, लेकिन जटिल कानून और सुस्त प्रशासनिक प्रक्रियाएं सरकारी राहत नीतियों में बड़ी बाधा हैं

Last Updated- May 17, 2026 | 9:36 PM IST
Nilgai
एक गेंहू के खेत में खड़ी नीलगाय | फाइल फोटो

जंगली जानवरों के आतंक से किसानों की फसलें बरबाद हो रही हैं और इससे उनके आर्थिक नुकसान में भारी बढ़ोतरी हो रही है। इस कारण देश के कई हिस्सों में खेती करना मुश्किल होता जा रहा है। अब यह संघर्ष सिर्फ बाघ, हाथी और तेंदुए जैसे बड़े जानवरों तक सीमित नहीं रहा है बल्कि जंगली सुअर, नीलगाय, अन्य खुर वाले पशु और सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाले बंदर भी इसमें शामिल हैं। यह एक ऐसा तथ्य है जिस पर कोई चर्चा नहीं करना चाहता और न ही इसे सुलझाने में हमारी कोई दिलचस्पी है। संरक्षण से जुड़े लोग इस चर्चा से बचना चाहते हैं और उनके लिए यह शायद सही भी है क्योंकि अगर कोई टकराव होता है, तो उसका दोष मनुष्यों पर ही है। 

हम जानते हैं कि इंसान, जंगली जानवरों के आवास को नष्ट कर रहे हैं और उन्हें आसान भोजन और शिकार की तलाश में जंगलों से बाहर आने के लिए मजबूर कर रहे हैं। यह संघर्ष आंशिक रूप से सफल वन्यजीव संरक्षण का भी परिणाम है, जिसने जानवरों की संख्या बढ़ा दी है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि इस बहाने हम किसानों की स्थिति पर ध्यान न दें।

हम इस मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल देते हैं और चूंकि इससे गरीब प्रभावित होते हैं, इसलिए इसे नजरअंदाज करना और भी आसान हो जाता है। वर्ष 2025 में ‘मानव-वन्यजीव संघर्ष: महाराष्ट्र में शुद्ध कृषि घाटे का अनुमान’ शीर्षक वाली रिपोर्ट, पुणे के गोखले इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिक्स ऐंड इकनॉमिक्स द्वारा तैयार की गई है। इस शोध के मुताबिक राज्य में वन्यजीवों के कारण होने वाला शुद्ध कृषि नुकसान सालाना लगभग 10,000 करोड़ रुपये से 40,000 करोड़ रुपये तक हैं। रिपोर्ट के मुताबिक यह आंकड़ा भी वास्तविकता से कम है।

चिंताजनक बात यह है कि इस अध्ययन में पाया गया कि 62 फीसदी किसानों ने जानवरों के हमलों के कारण अपनी फसल का रकबा कम कर दिया। किसानों ने जानवरों द्वारा की जाने वाली फसल क्षति को मुख्य समस्या बताया और इसके बाद असमय बारिश और उत्पाद के लिए कम बाजार कीमतों का स्थान है। वहीं एक-तिहाई किसानों ने कहा कि ये नुकसान उनकी आय में कमी के मुख्य कारण हैं।

ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय, कनाडा और भारत के सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ स्टडीज द्वारा वर्ष 2021 में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक कर्नाटक के किसान हर साल 1 से 3 महीने की आय जंगली जानवरों के हमलों में खो देते हैं। एक हाथी के कारण, एक किसान को 20 फीसदी या उससे अधिक नुकसान हो सकता है। वर्ष 2025 में कर्नाटक के कोडगु जिले का अध्ययन बताता है कि करीब 50फीसदी किसानों को सालाना लगभग 90,000 रुपये का नुकसान हुआ जिस कारण कई लोग कर्ज में डूब गए।

हिमाचल प्रदेश के वन विभाग के अनुमान के मुताबिक, सालाना फसल क्षति लगभग 500 करोड़ रुपये है और यदि बाड़ लगाने और अन्य सुरक्षा उपायों की अप्रत्यक्ष लागत शामिल की जाए तो यह कम से कम 1,500 करोड़ रुपये तक पहुंच जाती है।

तमिलनाडु के पश्चिमी घाट में इस वर्ष किए गए अध्ययन में भी इस बात की पुष्टि होती है। इस अध्ययन के मुताबिक 90 फीसदी किसानों ने वन्यजीव संघर्ष को प्रमुख उत्पादन जोखिम बताया और उनकी करीब 50-60 फीसदी फसलों को मुख्य रूप से जंगली सुअर, मोर और हाथियों ने नुकसान पहुंचाया। देशभर में ‘डाउन टु अर्थ’ की जांच में भी यही कहानी सामने आई। आमदनी घटना, आजीविका के साधन में कमी और बढ़ता कर्ज। अब सवाल यह है कि इस संबंध को कैसे दोबारा संतुलित किया जाए और मानव तथा पशुओं के बीच सह-अस्तित्व की कोई व्यवस्था कैसे बनाई जाए?

अब तक भारत सरकार की प्रतिक्रिया धीमी, बेहद असंगत और निराशाजनक रही है। अच्छी बात यह है कि सरकार अब इस संकट की गंभीरता को स्वीकार कर रही है। वर्ष 2026 के जून-जुलाई खरीफ सीजन से, सरकार ने राष्ट्रीय फसल बीमा योजना, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में जंगली जानवरों के कारण होने वाले नुकसान को शामिल किया है।

किसानों को नुकसान की रिपोर्ट दर्ज करने के लिए 72 घंटे का समय दिया जाता है, जिसे ड्रोन के माध्यम से सत्यापित किया जाएगा और उसके बाद मुआवजे का भुगतान किया जाएगा। यह कितना कारगर साबित होगा, यह देखने वाली बात है क्योंकि योजना में पहले से ही कई कमियां हैं। इसके अलावा, किसानों को मुआवजा देने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। 

गोखले संस्थान की रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि जब जंगली जानवरों के हमलों से प्रभावित 25 फीसदी किसानों ने मुआवजे के लिए आवेदन किया तब केवल 1-2 फीसदी को ही नुकसान के अनुसार भुगतान मिला। अधिकांश किसानों को योजना की जानकारी ही नहीं थी या वे इसकी जटिल प्रशासनिक प्रक्रियाओं को समझ नहीं पाए। 

सबसे बड़ा मुद्दा केरल है जहां यह समस्या सिर्फ इंसानों और जानवरों के बीच संघर्ष नहीं रह गई बल्कि केंद्र और राज्य के बीच विवाद भी बन गई है। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की धारा 62 के तहत केवल केंद्र सरकार ही किसी जंगली जानवर को ‘हानिकारक’ घोषित कर सकती है ताकि वन विभाग उसे मार सके। केंद्र सरकार विशेष जानवरों के लिए भी ऐसा करने में हिचकिचा रही है। केरल सरकार ने वर्ष 2024-25 में अपना वन्यजीव सुरक्षा विधेयक पेश किया जिसमें जंगली सुअर के हमलों को राज्यव्यापी आपदा घोषित किया गया और इस जानवर को ‘हानिकारक’ श्रेणी में रखा।

इस साल फरवरी में, केरल के राज्यपाल ने आखिरकार इस विधेयक को राष्ट्रपति के पास मंजूरी के लिए भेजने की अनुमति दी। यह विधेयक किसानों को खुद जंगली सुअर मारने की अनुमति नहीं देता बल्कि यह अधिकार लाइसेंस प्राप्त निशानेबाजों को देता है, जिन्हें पंचायतों के माध्यम से बुलाकर जानवर को नियंत्रित किया जा सके।

पिछले साल के अंत में राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड ने रीसस मकाक बंदर को फिर से अनुसूची 2 में शामिल करने की सिफारिश की, जिससे उन्हें मारना मुश्किल हो जाएगा। यह सिफारिश पशु अधिकार समूहों के दबाव में आई, लेकिन इसमें यह तथ्य नजरअंदाज किया गया कि वन विभाग भी मानता है कि बंदर अब एक समस्या बन चुके हैं और नसबंदी के प्रयासों के बावजूद उनकी संख्या नियंत्रित नहीं हुई। मैं इसे असंवेदनशील निर्णय कहूंगी। ऐसा करने से केवल संघर्ष बढ़ेगा और यह कम नहीं होगा। यह न तो संरक्षण के लिए अच्छा है और न ही किसानों के लिए।

(लेखिका सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट से जुड़ी हैं) 

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First Published - May 17, 2026 | 9:36 PM IST

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