अपने सबसे संकरे स्थान पर होर्मुज स्ट्रेट की चौड़ाई 40 किलोमीटर से भी कम है। सामान्य समय में इस संकरे मार्ग के भीतर दो सावधानीपूर्वक निर्धारित गलियारों से 100 से अधिक जहाज गुजरते हैं लेकिन वे केवल तेल और गैस के रूप में ही करोड़ो डॉलर मूल्य का माल ले जाते हैं। जहाज यातायात के लिहाज से जिब्राल्टर स्ट्रेट और डोवर स्ट्रेट अभी भी अधिक व्यस्त हैं। डोवर, ताइवान स्ट्रेट तथा लाल सागर के मुहाने पर स्थित बाब-अल-मंदेब से लगभग समान मूल्य का माल गुजरता है। और इन सभी की तुलना में मलक्का स्ट्रेट बहुत बड़ा प्रतीत होता है, जहां से वैश्विक व्यापार का करीब 30 फीसदी हिस्सा गुजरता है।
परंतु जैसा कि दुनिया को आभास हो रहा है, इनमें से किसी भी मार्ग पर यात्रा पर प्रतिबंध वैश्विक स्तर पर परस्पर जुड़ी अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचाते हैं। इजरायल और अमेरिका द्वारा हमले के बाद ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर देने से दुनिया भर के देशों में संकट जैसी स्थिति पैदा हो गई है। भारत में इसका तात्कालिक प्रभाव रसोई गैस की कीमत और उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ाने के रूप में सामने आया है। लेकिन समय के साथ अन्य प्रभाव भी महसूस होने लगेंगे।
उदाहरण के लिए, अमोनिया और यूरिया की कमी के कारण खाद की आपूर्ति घट सकती है। मौजूदा विश्व में आपूर्ति श्रृंखलाओं की जटिलता का मतलब यह है कि लगभग सभी क्षेत्र दूरस्थ महासागरों में नौ वहन की स्वतंत्रता पर निर्भर करते हैं। यदि होर्मुज स्ट्रेट पूरी तरह नहीं खुलता है, तो भारत में पॉलिएस्टर निर्माता प्रभावित होंगे, क्योंकि वर्तमान में लगभग 100 फीसदी एथिलीन ग्लाइकॉल होर्मुज से जुड़ा हुआ है।
उद्योग का कहना है कि संकट के शुरुआती हफ्तों में फाइबर की कीमतें 30 फीसदी या उससे अधिक बढ़ गईं और रंगों तथा सहायक कच्चे माल की कीमतें 15 से 30 फीसदी तक बढ़ीं। इस्पात उद्योग ने बताया कि भारत के चूना पत्थर फ्लक्स आयात का करीब 80 फीसदी हिस्सा रस-अल-खैमाह अमीरात में स्थित मीना साकर बंदरगाह से आता है, जो होर्मुज के ठीक दक्षिण-पश्चिम में है। इसी तरह सल्फ्यूरिक एसिड, जो विशिष्ट रसायनों के उत्पादन और इस प्रकार महत्त्वपूर्ण खनिजों के प्रसंस्करण आदि के लिए आवश्यक है, वह भी इन्हीं रास्तों पर निर्भर है।
दूसरे शब्दों में, यदि आप होर्मुज स्ट्रेट को बंद कर देते हैं, तो आप दुनिया को बंधक बना सकते हैं। ईरान की यही कोशिश है और वह कुछ हद तक सफल भी हो रहा है। यह स्पष्ट है कि उसने अभी तक पूरी ताकत नहीं लगाई है। यमन में अपने हूती सहयोगियों के माध्यम से, वह लाल सागर से होने वाले व्यापार को भी सीमित कर सकता है।
यह सवाल बनता है कि आखिर अमेरिका ने इस संभावना का पूर्वानुमान क्यों नहीं लगाया। आंशिक रूप से, संभवतः यह वर्तमान प्रशासन की सामान्य अक्षमता और अति-आत्मविश्वास का परिणाम है। लेकिन कुछ हद तक शायद इसलिए भी कि आज की दुनिया में हम इस विचार के अभ्यस्त नहीं हैं कि ऐसे महत्त्वपूर्ण जलमार्ग बंद हो सकते हैं। खुला और स्वतंत्र नौवहन दशकों से सामान्य रहा है, और इसने वैश्विक, जुड़ी हुई व्यापारिक अर्थव्यवस्था के निर्माण की अनुमति दी है, जो हर जगह जीवन स्तर और समृद्धि में सहयोग करती है।
लेकिन ऐतिहासिक दृष्टि से, यह एक अनोखा विशेषाधिकार है जो हमें पिछले दशकों में मिला है। हमारे वर्तमान युग से पहले, इन महत्त्वपूर्ण जलमार्गों पर नियंत्रण के लिए संघर्ष होता था, क्योंकि वह धन, जो आज उपभोक्ता कल्याण का समर्थन करता है, पहले उन लोगों की विलासिताओं में लगता था जो इन स्ट्रेट की देखरेख करने वाले किलों या महलों के स्वामी थे।
पूर्व में पुर्तगाली साम्राज्य का निर्माण 16वीं शताब्दी की शुरुआत में ऐसे स्थानों पर कब्जा करने के इर्द-गिर्द हुआ था: मलक्का, अदन और होर्मुज। करीब एक सदी या जितने समय तक उन्होंने होर्मुज पर शासन किया, वहां का उनका आश्रित राज्य असाधारण रूप से समृद्ध बताया जाता था, जो जहाजों से वसूले गए शुल्कों के माध्यम से इस शान-शौकत का खर्च उठा सकता था।
मलक्का में, पुर्तगालियों ने स्थानीय सुल्तानों द्वारा संचालित मौजूदा शुल्क प्रणाली को अपने हाथ में ले लिया, जो 5-8 फीसदी का पारगमन कर लगाती थी। यह उस समय के लिए अपेक्षाकृत कम था। जब तक यह पारदर्शी रूप से लागू होता व्यापार भी शिकायत नहीं करते थे और स्थानीय अधिकारी जलमार्गों को समुद्री डाकुओं से मुक्त रखने का अच्छा काम करते। बेशक, कुछ लोग कह सकते हैं कि ये अधिकारी और साम्राज्य स्वयं बेहतर कपड़े पहने समुद्री लुटेरों से अधिक कुछ नहीं थे।
जब ईरान और अमेरिका दावा करते हैं कि स्थानीय नौ सैनिक शक्तियों के रूप में उन्हें उन क्षेत्रों से गुजरने वाले जहाजों पर शुल्क लगाने का अधिकार है जिन्हें वे नियंत्रित करते हैं, तो वे उन्हीं संकरे मार्गों का केवल मुद्रीकरण कर रहे हैं, जैसा कि विभिन्न देशों ने अतीत में किया है। आज हमें यह साझा मानदंडों का उल्लंघन प्रतीत होता है, तो यह पिछली शताब्दी की विशिष्ट उपलब्धियों का ही प्रतिबिंब है, और हमें इस बात पर विचार करने के लिए प्रेरित करना चाहिए कि ऐसे सिद्धांतों पर आधारित कोई भी समृद्धि कितनी भंगुर होती है।
जब जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने अपने देश की ‘मुक्त और खुले हिंद-प्रशांत’ की इच्छा को परिभाषित किया था, तो इसका कारण यह था कि उन्होंने इस नाजुकता को पहचाना था, और यह भी कि चीनी आक्रामकता विशेष रूप से ताइवान स्ट्रेट या फर्स्ट आइलैंड चेन के अन्य संकरे जलमार्गों का बंद होना उनके देश में जीवन और आजीविका को कैसे प्रभावित करेगा। जब लोग चिंतित होते हैं कि चीन नौ वहन की स्वतंत्रता को सीमित करेगा, तो यह कोई मामूली, सैद्धांतिक मुद्दा नहीं है जिसकी केवल कानूनी पंचाटों में चर्चा की जाए।
संकट के दौरान ईरान या अमेरिका से शुल्क चुकाने के लिए मोलतोल करना किसी एक देश के हित में हो सकता है, लेकिन यह छोटी सोच है। सिंगापुर, जो मलक्का स्ट्रेट के जरिये होने वाले व्यापार से लाभ कमाता है लेकिन इसे सैन्य रूप से नियंत्रित नहीं कर सकता, पहले ही यह बात स्पष्ट कर चुका है। उसका आर्थिक अस्तित्व इस बात पर निर्भर करता है कि मलेशिया और इंडोनेशिया समुद्र के कानून में निर्धारित पारगमन मार्ग के सिद्धांत को मान्यता दें। वह इसे कमजोर होने की अनुमति नहीं दे सकता और उसने कहा है कि वह ईरान से बातचीत नहीं करेगा।
पिछले 80 वर्षों में जीवन स्तर में भारी वृद्धि और गरीबी में तेज गिरावट अचानक नहीं हुई है। वह ऐसे मानदंडों का परिणाम हैं जैसे नौ वहन की स्वतंत्रता, जो हमें अपनी समृद्धि में निवेश करने की अनुमति देती है बिना हर छोटे राज्य से बातचीत किए या अपने व्यापारियों की रक्षा के लिए जहाज भेजे। लेकिन ऐसे मानदंडों की रक्षा और पालन करना आवश्यक है।
अगर सचमुच युद्ध के बाद बनी वैश्विक व्यवस्था टूट जाती है, जैसा कि कुछ लोग चाहते हैं, और उसकी जगह किसी तरह की ‘वैश्विक प्रतिस्पर्धी अराजकता’ ले लेती है—भले ही उस नई व्यवस्था को ‘बहुध्रुवीयता’ जैसा कोई भारी-भरकम नाम दे दिया जाए या न दिया जाए—तो हमें यह समझना होगा कि पिछले कुछ दशकों में व्यापार और विकास को सहारा देने वाले सिद्धांत शायद अब जिंदा न रह पाएं।