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नए किस्म के पर्यावरणवाद की आवश्यकता, क्यों टिकाऊ विकास की शुरुआत समावेशिता से होनी चाहिए?

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हर वर्ष 5 जून को मनाया जाने वाला विश्व पर्यावरण दिवस हमें यह सोचने का अवसर देता है कि हम कहां खड़े हैं और हमें किस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए

Last Updated- June 10, 2026 | 11:51 PM IST
Climate Change
प्रतीकात्मक तस्वीर

हर वर्ष 5 जून को मनाया जाने वाला विश्व पर्यावरण दिवस हमें यह सोचने का अवसर देता है कि हम कहां खड़े हैं और हमें किस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। इस वर्ष जब मैं यह आलेख लिख रही हूं मेरा शहर दिल्ली जल रहा है। यह एक जीवित अग्निकुंड बन चुका है। हम सभी जानते हैं कि बढ़ते तापमान का कारण जलवायु परिवर्तन है। यह अब निर्विवाद है। लेकिन हमारे शहरों के निर्माण के तौर तरीके भी इसके लिए जिम्मेदार हैं।

उदाहरण के लिए कंक्रीट का बढ़ता उपयोग, सड़कों पर वाहनों से निकलने वाली गर्मी और कमरों में एयर कंडीशनर से निकलने वाली गर्मी भी तापमान बढ़ाने की वजह है। हम बिना इन्सुलेशन, वेंटिलेशन या तेज धूप से बचाने वाले शेडिंग के निर्माण कर रहे हैं। इन सबके साथ-साथ पेड़ों और जलस्रोतों द्वारा मिलने वाली प्राकृतिक ठंडक का अभाव भी गर्मी को बहुत भीषण बना देता है। प्राकृतिक ठंडक के खत्म होने में निर्माण गतिविधियों में तेजी भी एक वजह है।

अब समय आ गया है कि हम पर्यावरण बनाम विकास की निरर्थक बहस को किनारे रखें। हमें पता है कि मनुष्यों ने ही जलवायु परिवर्तन को आज की इस महाविपत्ति में बदला है और हमने यह सब विकास के नाम पर किया है। ऊर्जा के लिए जीवाश्म ईंधन के उपयोग से होने वाला उत्सर्जन जो आर्थिक वृद्धि, आजीविका और कल्याण के लिए आवश्यक है, तापमान में इजाफा कर रहा है और मौसम प्रणालियों को अनियंत्रित कर रहा है।

यही विकास का मॉडल आज सवालों के घेरे में है। इसने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है जहां हमारे पास पीने के लिए स्वच्छ पानी नहीं है और सांस लेने के लिए स्वच्छ हवा नहीं है। इसलिए चुनौती यह है कि हम विकास के तरीके को बदलें न कि बहस को एक निरर्थक विकास विरोधी के स्वरूप में सीमित कर दें। जब यह स्पष्ट हो जाए तब हम अगले मुद्दे पर जा सकते हैं कि देश किस तरह स्थानीय प्रदूषण समस्याओं को दूर करने के बावजूद वैश्विक पर्यावरणीय चुनौतियों में योगदान करते रहते हैं।

जलवायु परिवर्तन इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। जैसे कि भारी मात्रा में उत्पन्न होने वाला कचरा और पर्यावरण के अनुकूल बदलाव के लिए नए खनिजों की बढ़ती मांग। इसलिए पर्यावरण प्रबंधन अनसुलझा ही रहता है भले ही आकाश नीला हो और पानी साफ नजर आए। यह हमें बताता है कि हर देश को पर्यावरणवाद के लिए एक नए दृष्टिकोण की आवश्यकता है और पुराने तरीके अब कारगर नहीं हैं और उनके लिए बहुत देर हो चुकी है।

दशकों के काम ने हमें कुछ अहम सबक सिखाए हैं। पहला, टिकाऊ विकास तब तक संभव नहीं है जब तक विकास समावेशी और सुलभ न हो। भारत की बात करें तो हम जानते हैं कि जब तक हम सभी को आवागमन की सुविधा नहीं देंगे तब तक हमारे पास स्वच्छ हवा नहीं होगी, जब तक सभी के लिए स्वच्छता नहीं होगी तब तक हमारी नदियां प्रदूषणमुक्त नहीं होंगी और ऐसी ही कुछ अन्य चीजें। हमें यह भी पता है कि केवल तकनीकी दृष्टिकोण समस्या का समाधान नहीं करेंगे। पर्यावरण तभी सुधरेगा जब विकास सभी के लिए काम करेगा। जिसमें गरीब भी शामिल हों।

दूसरा, हम जानते हैं कि पर्यावरण प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ा है। हम उन्हें कैसे निकालते हैं और उनसे अर्थव्यवस्था कैसे बनाते हैं। यह पुराने कोयला-गैस अर्थतंत्र पर भी उतना ही लागू होता है जितना कि नए हरित अर्थतंत्र पर जिसमें सौर पैनल और बैटरियां शामिल हैं और जिसके लिए महत्त्वपूर्ण खनिजों का उत्खनन आवश्यक है। यह नए आर्टिफिशल इंटेलिजेंस अर्थतंत्र पर भी लागू होता है जिसे पानी और ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

पिछले दशकों में हमने इन प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक उपयोग किया है। हमने कुछ हद तक सीखा है कि मत्स्य पालन, खनन या वन प्रबंधन को अधिक टिकाऊ कैसे बनाया जाए लेकिन प्रगति सीमित रही है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हम अभी तक पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं कि इन संसाधनों के मालिक समुदायों के साथ लाभ कैसे साझा किया जाए। हम बस उनके संसाधन ले लेते हैं और उन्हें और गरीब बना देते हैं। आने वाले दशक में इस शक्ति असंतुलन को ठीक करना होगा ताकि स्थायित्व हासिल की जा सके।

तीसरा, पर्यावरणवाद का संबंध संस्थाओं से भी है जो अल्पकालिक और दीर्घकालिक उद्देश्यों के बीच और उद्योग या कृषि की जरूरतों तथा समुदायों के अधिकारों के बीच इस संतुलन को ला सकती हैं। यह निर्णय लेने की प्रक्रिया के बारे में है जो उपलब्ध सर्वोत्तम विज्ञान से प्रेरित हो। यह जवाबदेह और पारदर्शी संरचनाओं के बारे में है जो हमें विकास की लागत समझने की अनुमति दें। लेकिन यहीं पर हम वास्तव में गलत रास्ते पर चले गए हैं।

हमने शासन, नियमन और निगरानी की संस्थाओं को कमजोर कर दिया है और यही कारण है कि हम आज इस स्थिति में हैं। अब पर्यावरणीय चुनौती हर उस चीज पर मंडरा रही है जिसे हम महत्त्व देते हैं। कृषि को उत्पादक बनाना होगा लेकिन साथ ही टिकाऊ भी और किसानों के हाथों में पैसा पहुंचाना होगा। गरीबों की अर्थव्यवस्था बनानी होगी ताकि वे पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षक बन सकें। जल सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी चाहे सूखा हो या जलवायु संबंधी तनाव। हमें ऐसे विकास मार्ग भी खोजने होंगे जो प्रदूषण के बिना विकास को नए सिरे से तय कर सकें और दुनिया को जलवायु परिवर्तन से लड़ने में मदद कर सकें।

अच्छी खबर यह है कि आज हम पहले के किसी भी विश्व पर्यावरण दिवस की तुलना में अधिक जानते हैं कि हमें क्या अलग करने की आवश्यकता है। यही कारण है कि इस साल एक नई शुरुआत होनी चाहिए। पर्यावरणवाद की नई प्रथा की शुरुआत, जो समावेशी और सुलभ विकास की राजनीति में निहित हो और तभी यह टिकाऊ होगा।


(लेखिका सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट से संबद्ध हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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First Published - June 10, 2026 | 11:51 PM IST

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